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ब्लॉग

कितना विरोधाभासी है भारत का विकास

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी शासन के तीन सालों में अत्यंत लोकप्रिय नेता के रूप में उभरे हैं. जनता से उनके सीधे संवाद के कारण उम्मीदें भी जगी हैं, लेकिन वे कहां तक पूरी हुई हैं? कुलदीप कुमार बहुत सारी समस्यायें देखते हैं.

जहां पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह देश की जनता को कभी-कभार ही संबोधित करते थे, वहीं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जनता के साथ लगातार संवाद करना पसंद करते हैं. आकाशवाणी पर रेडियो के माध्यम से उनकी ‘मन की बात' नियमित रूप से प्रसारित की जाती है. जनसभाओं में भी उनका अपने समर्थकों से सीधा संवाद होता है जिसका भारी असर पड़ता है. किसी भी लोकप्रिय नेता की तरह मोदी भी नित नए नारे गढ़ने में माहिर हैं. चुनाव प्रचार के दौरान उन्होंने ‘अच्छे दिन' लाने, हर साल दो करोड़ नए रोजगार पैदा करने और विदेशों में जमा काले धन को वापस लाने का वादा किया था तो सत्ता में आने के बाद उन्होंने ‘स्वच्छ भारत' और बुलेट ट्रेन का सपना दिखाया. अब उन्होंने ‘न्यू इंडिया' का नारा दिया है. गौर करने की बात है कि यह ‘नया भारत' का नारा नहीं, ‘न्यू इंडिया' का नारा है जिससे स्पष्ट है कि इसे देश के युवा को ध्यान में रखकर गढ़ा गया है. न्यू इंडिया का नारा आर्थिक और तकनीकी प्रगति पर सबसे अधिक जोर देता है. लेकिन प्रश्न यह है कि इस लक्ष्य को हासिल करने के लिए भारत के पास आवश्यक क्षमता है या नहीं.

इस समय पूरे देश में देशभक्ति के नाम पर ध्रुवीकरण जारी है. सेना का महिमामंडन इस देशभक्ति की प्राथमिक अनिवार्यता है और सेना के बारे में किसी भी तरह का सवाल करना देशद्रोह की निशानी माना जा रहा है. यूं तो हर देशभक्त को स्वाभाविक रूप से देश की सेना से प्यार और उसके प्रति सम्मान होता है, लेकिन सेना भी देश के संविधान के तहत काम करने वाली संस्था है. पड़ोसी देश पाकिस्तान, बांग्लादेश और म्यांमार के उदाहरण बताते हैं कि सेना के अतिशय महिमामंडन के कारण सार्वजनिक और राजनीतिक जीवन में उसकी भूमिका बढ़ने के कैसे दुष्परिणाम निकल सकते हैं. गौरक्षा के नाम पर अनेक गुंडवाहिनियां निःशंक भाव से निर्दोष लोगों की हत्या कर रही हैं और सांप्रदायिक दंगों की स्थिति पैदा कर रही हैं. ऊंची जातियों और दलितों के बीच संघर्ष भी बढ़ता जा रहा है.

सरकार और सत्तारूढ़ दल वैज्ञानिक सोच को बढ़ावा देने के संविधान के निर्देश की खुलेआम अवहेलना करके वैदिक विज्ञान, गौमूत्र के लाभ, पंचगव्य की विशेषताएं जैसे विषयों पर शोध कराने का आह्वान कर रही हैं. स्वयं प्रधानमंत्री प्राचीन भारत में अंग प्रत्यारोपण तकनीक, प्लास्टिक सर्जरी और आसानी से एक ग्रह से दूसरे ग्रह तक जा सक्ने वाले अन्तरिक्ष यान होने की बात कर चुके हैं. मिथकों को इतिहास की तरह पेश किया जा रहा है और इतिहास की पुस्तकों में इस तरह का फेरबदल करने की कोशिश की जा रही है ताकि हल्दीघाटी के मैदान में हुई लड़ाई में अकबर की सेनाओं की जगह महाराणा प्रताप को विजयी सिद्ध किया जा सके. सड़कों के नामों से मुस्लिम शासकों के नाम हटाने का अभियान चल रहा है.

यही नहीं, उच्च शिक्षा और स्तरीय शोध के विरुद्ध फंड कटौती से लेकर शोधार्थियों की संख्या कम करने तक की कोशिश हो रही हैं. साहित्य अकादेमी समेत सभी अकादमियों और सरकारी वित्तीय सहायता से चलने अन्य सांस्कृतिक संस्थाओं को कहा जा रहा है कि वे अपने खर्च का एक-तिहाई हिस्सा स्वयं कमाएं. सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवाओं पर भी वित्तीय आवंटन में कटौती हो रही है.

ऐसे में यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या न्यू इंडिया की नींव पुराने ही नहीं, बल्कि अति पुरातन और प्राचीन इंडिया पर रखी जा सकती है? क्या वेद, उपनिषद, रामायण और महाभारत से हमें उस वैज्ञानिक, तकनीकी और आर्थिक नवाचार के लिए प्रेरणा मिलेगी जिसकी बात ‘न्यू इंडिया' का नारा करता है? क्या इस न्यू इंडिया का सरोकार सिर्फ जीडीपी यानि सकल घरेलू उत्पाद की विकास दर से ही होगा? और क्या उस लक्षित विकास दर को भी प्राप्त किया जा सकेगा अगर देश के विभिन्न भागों और विभिन्न समुदायों में इतनी उथलपुथल और अशांति मची हो?

अभी तक नोटबंदी के प्रभावों के बारे में कोई भी विश्वसनीय अध्ययन सामने नहीं आया है और यह कह सकना कठिन है कि इस के कारण ‘न्यू इंडिया' का लक्ष्य पास आया है या और भी दूर हो गया है. मोदी सरकार के पास सिर्फ दो साल बचे हैं. बुलेट ट्रेन का तो कहीं अता-पता नहीं और पुरानी ट्रेनें या तो विलंब से चल रही हैं या लगातार दुर्घटनाओं का शिकार हो रही हैं और उनमें यात्रियों को मिलने वाली सुविधाएं भी कम हो गई हैं, स्वच्छ भारत केवल नारे में ही सिमट कर रह गया है, काले धन की तो अब कोई बात भी नहीं करता. अब ‘न्यू इंडिया' के शगूफे का क्या असर होगा, अगले दो साल बताएंगे.

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