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विज्ञान

कितना लड़े एड्स से

एड्स के खिलाफ 30 साल की जंग पूरी करने के बाद मेडिकल साइंस मंगलवार को अब तक का खोया पाया दुनिया के सामने पेश कर रहा है. फ्रांसीसी रिसर्चरों ने सबसे पहले इस बीमारी के बारे में बताया था.

वैज्ञानिक एड्स के खिलाफ अब तक की कामयाबियों और गिनी चुनी दवाइयों के बारे में जानकारी देंगे. हालांकि 30 साल बाद भी एड्स की कोई कारगर दवा सामने नहीं आ पाई है.

सोमवार को पेरिस में "इमेजिन द फ्यूचर" सम्मेलन शुरू हुआ, जिसमें एड्स और एचआईवी के खतरों पर चर्चा चल रही है. अमेरिका की राष्ट्रीय एलर्जी और संक्रामक रोग संस्था (एनआईएआईडी) के एंथनी फौची का कहना है, "1983 में एचआईवी वायरस का पता लगना और अगले साल 1984 में पहली बार खून की जांच के बाद इस बारे में गहराई से पता लगने के बाद इसके खिलाफ एंटीरेट्रोवाइरल दवा बनाने की पक्की रिसर्च शुरू हुई."

कई सालों की रिसर्च के बाद 1996 में एंटीरेट्रोवाइरल दवा मिलनी शुरू हुई, जिससे कहा जाता है कि एचआईवी पीड़ित कई लोगों की जान बचाई जा सकी है. बरसों की रिसर्च के बाद मेडिकल साइंस ऐसी जगह पहुंच गया है, जहां एंटीरेट्रोवाइरल दवा की मदद से एचआईवी पीड़ित महिला के अजन्मे बच्चे को इस बीमारी से अलग रखा जा सकता है. लेकिन अब तक एड्स या एचआईवी का टीका नहीं निकल पाया है.

मुश्किल है रिसर्च

अमेरिका में इस दिशा में 2009 में एक अच्छी रिसर्च शुरू हुई लेकिन साइड एफेक्ट देखने के बाद इसे पिछले महीने रोक दिया गया. इसमें वैज्ञानिक इंफेक्शन रोकने में नाकाम रहे. आसानी से शरीर में घुल मिल जाने वाले वायरस पर काबू पाना भूसे की ढेर में सुई खोजने के बराबर है.

क्वालालंपुर में मलाया यूनिवर्सिटी की अदीबा कमरुलजमां का कहना है, "टीके पर रिसर्च का काम बहुत प्रभावित हो रहा है, लेकिन अगर हमें सच में एड्स खत्म करना है, तो टीका खोजना ही होगा."

2008 में नोबेल पुरस्कार जीतने वाले फ्रांसोआ बार-सिनोसी ने तीन साल पहले एक खास रणनीति तैयार की, जिसके तहत एचआईवी के "शरणगाहों" पर हमला किया जाना था. इसके तहत अगर खास कोशिकाओं पर एंटीरेट्रोवाइरल दवा का हमला किया जाए, तो रोग काबू में रहता है लेकिन दवा रोकते ही यह फिर उभरने लगता है.

कैसे मारें वायरस

ऑस्ट्रेलिया के मेलबर्न में मोनाश यूनिवर्सिटी के शैरॉन लेविन का कहना है, "सबसे बड़ी चुनौती उन जगहों का पता लगाना है, जहां ये वायरस छिपते हैं. ये छिपे रहने में कैसे सफल रहते हैं और इन्हें वहां से बाहर कैसे निकाला जा सकता है. पिछले कुछ सालों में हमने इस बारे में काफी कुछ जाना है."

लेविन उस टीम के साथ काम कर रहे हैं, जो कैंसर से निपटने की एक दवा पर रिसर्च कर रही है. इसके तहत उस वायरस की पहचान करनी है, जो मनुष्य की प्रतिरोध क्षमता खत्म कर देता है और जिसकी वजह से मनुष्यों को टीबी, न्यूमोनिया और दूसरी बीमारियों का खतरा होता है. बीस लोगों पर परीक्षण चल रहे हैं, जिनमें से 90 फीसदी पर इसका सकारात्मक असर देखा गया. अंतिम लक्ष्य है कि बिना कोशिका को नुकसान पहुंचाए इसमें छिपने वाले वायरस को खत्म कर दिया जाए.

लेविन ने कहा, "हमारे पास ऐसी दवाइयां आ गई हैं, जो वायरसों की पहचान कर लेती हैं लेकिन यह सिर्फ पहली सीढ़ी है." इसके अलावा दो और रिसर्च चल रहे हैं, जिनमें शुरुआती चरण में एंटीरेट्रोवाइरल दवा के उपयोग से काफी फायदा हो सकता है. पिछले दिनों अमेरिका में ऐसा पहला मामला सामने आया, जब एक नवजात बच्चे को जन्म के 30 घंटे के अंदर एंटीरेट्रोवाइरल दवा दी गई और कुछ दिनों में उसका एचआईवी संक्रमण खत्म हो गया.

फौची का कहना है, "यह निश्चित तौर पर एक अच्छी खोज है लेकिन यह इकलौता मामला है और इस मामले में कुछ पक्के तौर पर कहने से पहले और रिसर्च की जरूरत है." इसके अलावा फ्रांस में भी 14 एचआईवी मरीजों पर की गई रिसर्च में उत्साहवर्धक परिणाम दिखे हैं.

एड्स ने अब तक तीन करोड़ लोगों की जान ली है. अनुमान है कि दुनिया भर में साढ़े तीन करोड़ लोग एचआईवी से पीड़ित हैं और हर साल 18 लाख लोग इससे मरते हैं.

एजेए/एमजे (एएफपी)

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