1. Inhalt
  2. Navigation
  3. Weitere Inhalte
  4. Metanavigation
  5. Suche
  6. Choose from 30 Languages

ब्लॉग

कितना बड़ा फेरबदल और कब

कुछ समय से दिल्ली में सत्ता के गलियारे कानाफूसी हो रही है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपनी मंत्रिपरिषद में फेरबदल के बारे में गंभीरता से सोच रहे हैं. कुलदीप कुमार के विचार में सवाल यह है कि बदलाव कितना बड़ा होगा.

अपना मंत्रालय अच्छे ढंग से चलाने में अक्षम सिद्ध होने या प्रधानमंत्री की कृपा से वंचित होने के कारण मंत्रियों का हटाया जाना या उनके विभागों में फेरबदल किया जाना एक स्वाभाविक प्रक्रिया है और हर प्रधानमंत्री अपने कार्यकाल के मध्य तक आते-आते मंत्रिपरिषद में बदलाव करता ही है. कई बार यह बदलाव बड़े पैमाने पर होता है तो कई बार छिटपुट परिवर्तन ही पर्याप्त समझे जाते हैं. इस समय सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या मोदी मंत्रिपरिषद में बड़े पैमाने पर बदलाव करेंगे या फिर उसकी नोंक-पलक सुधार कर ही संतुष्ट हो जाएंगे? दूसरा सवाल यह है कि मंत्रिपरिषद में फेरबदल कब किया जाएगा?

अधिक संभावना यह है कि यह फेरबदल ताश के पत्ते फेंटने जैसा ही होगा. नरेंद्र मोदी के सामने सबसे बड़ी समस्या यह है कि वह यशवंत सिन्हा और मुरली मनोहर जोशी जैसे वरिष्ठ और अनुभवी नेताओं को मंत्रिमंडल में जगह नहीं दे सकते क्योंकि पार्टी की अंदरूनी राजनीति के चलते लालकृष्ण आडवाणी समेत ये सभी वरिष्ठ नेता मार्गदर्शक मंडल के सदस्य बनाए जा चुके हैं और यह इन्हें सम्मानजनक ढंग से पार्टी और सरकार से दूर रखने की एक तरकीब थी. भारतीय जनता पार्टी में प्रतिभाओं का भारी अकाल है जिसका सबसे बड़ा उदाहरण केंद्र सरकार के सबसे शक्तिशाली मंत्री समझे जाने वाले अरुण जेटली हैं. उनके पास वित्त और सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय हैं. पत्रकारों से जेटली के घनिष्ठ संबंध रहे हैं और इस दृष्टि से उन्हें सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय के लिए उपयुक्त माना जा सकता है लेकिन आर्थिक मामलों की समझ के लिए उन्हें कभी नहीं जाना गया. फिर भी उनके पास वित्त मंत्रालय है.

मोदी सरकार को सत्ता में आए बीस महीने हो चुके हैं और इतने कम अरसे में ही जनता का उसके साथ मोहभंग शुरू हो गया है. दिल्ली और बिहार में भाजपा को मिली करारी हार ने भी यह सिद्ध कर दिया है कि मोदी का जादू फीका पड़ने लगा है क्योंकि वह अपने चुनावी वादों को पूरा करने में कोई रुचि नहीं ले रहे हैं. उधर उद्योग जगत और देशी-विदेशी निवेशक भी मायूस हैं. विश्व भर में मंदी है लेकिन भारत पर उसका कुछ ज्यादा ही असर दिख रहा है जबकि उसका दावा है कि उसकी अर्थव्यवस्था अभी भी सात प्रतिशत की दर से बढ़ रही है. जनता के साथ-साथ कारोबारियों, निवेशकों और उद्योगपतियों का भी मोदी सरकार से मोहभंग अब स्पष्ट हो चला है. अरुण जेटली अभी तक कोई भी महत्वपूर्ण वित्तीय विधेयक पारित नहीं करा सके हैं. न ही उन्होंने और न ही मोदी ने विपक्ष के साथ इसके लिए सार्थक संवाद करने की कोशिश की है.

तो क्या मोदी जेटली को वित्त मंत्रालय से हटा कर रक्षा मंत्रालय देंगे? कई राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इस बात की बहुत अधिक संभावना है लेकिन मुझे ऐसा नहीं लगता. स्मृति ईरानी भी मानव संसाधन विकास मंत्रालय जैसा भारी-भरकम मंत्रालय संभाले बैठी हैं और जैसा कि हैदराबाद विश्वविद्यालय में दलित छात्रों के उत्पीड़न और उसके परिणामस्वरूप एक दलित छात्र द्वारा आत्महत्या किए जाने की घटना के संदर्भ में स्पष्ट हो गया है, वह इसे चलाने में नितांत असफल रही हैं. लेकिन क्या मोदी उनकी जगह किसी और को यह मंत्रालय देंगे? मेरी राय में इसकी संभावना काफी कम है क्योंकि मोदी का स्वभाव अपनी गलती मानकर सुधार करने का नहीं है. उन्हें इसमें अपनी हेठी लगती है.

अधिक संभावना यह है कि बिहार के गिरिराज किशोर जैसे कुछ राजनीतिक रूप से हल्के मंत्रियों की जगह उत्तर प्रदेश के नेताओं को मंत्री बनाया जाएगा क्योंकि एक-सवा साल के अंदर उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव होने हैं. इनमें सफलता या विफलता मोदी के राजनीतिक भविष्य को तय करने में निर्णायक सिद्ध हो सकती है. 2014 में हुए लोकसभा चुनाव में भाजपा ने उत्तर प्रदेश में सभी पार्टियों को धूल चटा दी थी. यदि इस राज्य में उसे सफलता न मिली तो राज्यसभा में उसकी हालत पतली ही बनी रहेगी और वह विधेयकों को पारित कराने में मुश्किलों का सामना करती रहेगी. 2019 के लोकसभा चुनाव पर भी उत्तर प्रदेश की जीत-हार असर डालेगी. इसके अलावा भी मोदी कम कद्दावर मंत्रियों के विभागों में फेरबदल कर सकते हैं, लेकिन पांच सबसे महत्वपूर्ण मंत्रालयों, विदेश, रक्षा, वित्त, मानव संसाधन विकास एवं गृह में परिवर्तन की संभावना कम ही लगती है.

DW.COM

संबंधित सामग्री