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ब्लॉग

कितना कारगर मुफ्त इलाज का फैसला

पश्चिम बंगाल सरकार ने ब्लॉक से लेकर जिला स्तर के तमाम सरकारी अस्पतालों में मुफ्त इलाज का एलान किया है. मुख्यमंत्री ममता बनर्जी का कहना है कि इससे गरीब तबके के लोगों को इलाज की सुविधा मिलेगी, पर इस राह में कई बाधाएं हैं.

सरकार इन अस्पतालों में इलाज कराने वालों को पहले ही मुफ्त दवा देने का एलान कर चुकी है. लेकिन ममता के इस एलान पर सवाल खड़े होने लगे हैं. स्वास्थ्य सेवाओं के मामले में बंगाल पहले से ही बदहाल है. सरकारी अस्पतालों में डाक्टरों और नर्सों की भारी कमी तो है ही आधारभूत ढांचे का भी अभाव है. वाममोर्चा सरकार के जमाने से ही यह स्थिति बनी हुई है. स्वास्थ्य सेवाओं को सुधारने के लिए ही ममता बनर्जी ने यह मंत्रालय अपने जिम्मे रखा है. लेकिन उसके बावजूद हालत जस की तस है. खासकर जिला और ग्रामीण अस्पतालों की स्थिति तो काफी खराब है.

वहां से छोटे-मोटे मर्ज के लिए भी मरीजों को कोलकाता के सरकारी मेडिकल कॉलेजों में भेज दिया जाता है. अस्पतालों में क्षमता से कई गुनी ज्यादा भीड़ होने की वजह से ही अक्सर नवजात शिशुओं की मौत खबरें सामने आती रहती हैं. मालदा मेडिकल कालेज अस्पताल में पिछले तीन दिनों के दौरान 11 नवजातों की मौत हो चुकी है. सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, राज्य की लगभग 80 फीसदी आबादी इलाज के लिए सरकारी अस्पतालों और स्वास्थ्य केंद्रों पर निर्भर है. ममता बनर्जी की दलील है कि इलाज को आम लोगों की पहुंच के भीतर करने के लिए ही इसे मुफ्त करने का फैसला किया गया है.

सरकार के ताजा फैसले के मुताबिक, जिला स्तर तक के तमाम अस्पतालों में अब मरीजों को मुफ्त बेड मिलेंगे. पहले कुछ बेड फ्री थे और कुछ के लिए पैसे देने होते थे. लेकिन अब जनरल बेड के अलावा केबिन और क्रिटिकल केयर यूनिट (सीसीयू) में भी बेड मुफ्त मिलेंगे. यही नहीं, मरीजों का ऑपरेशन भी मुफ्त होगा और उनको तमाम तरह की जांच या दवाओं के लिए भी अपनी जेब से एक पाई खर्च नहीं करनी होगी. लेकिन यहीं कई सवाल भी उठने लगे हैं.

खुद स्वास्थ्य मंत्रालय के अधिकारी भी ममता के फैसले से हैरान-परेशान हैं. उनका सवाल है कि तमाम इलाज मुफ्त कर देने से आखिर स्वास्थ्य सेवाओं के सुचारू संचालन के लिए पैसे किस मद से मिलेंगे? इससे पहले सरकार ने पिछले साल जनवरी में ही मरीजों को मुफ्त दवाएं देने का एलान किया था. उसके बाद इस मद में सरकारी बजट में आवंटित 80 करोड़ की रकम को बढ़ा कर चार सौ करोड़ करना पड़ा. अब ताजा फैसले से यह खर्च कई गुना बढ़ने का अंदेशा है. वैसे, स्वास्थ्य अधिकारियों के एक वर्ग का कहना है कि राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन के तहत केंद्र से और ज्यादा अनुदान पाने के लिए ही सरकार ने यह फैसला किया है. इस वर्ग की दलील है कि केंद्रीय अनुदान बढ़ने की वजह से राज्य सरकार पर ज्यादा आर्थिक बोझ नहीं पड़ेगा.

लेकिन इसके अलावा कई अन्य मुद्दे भी हैं. सरकार ने विभिन्न जिला अस्पतालों में निजी-सार्वजनिक भागीदारी (पीपीपी) मॉडल के आधार पर क्लीनिकल जांच केंद्र स्थापित किए हैं. वहां बाजार दर के मुकाबले कम पैसों में ही मरीजों की जांच की जाती है. अब अगर सरकार सबकुछ मुफ्त में देगी तो उन निजी कंपनियों को पैसे कहां से मिलेंगे? इन केंद्रों से निजी कंपनियों को हर महीने जो आय होती थी उसकी भरपाई तो सरकार को ही करनी होगी. इसके अलावा कुछ अस्पतालों में मरीज कल्याण समिति की स्थापना की गई है. वह केबिन के किराए के तौर पर मिलने वाली रकम से ही अस्पताल में आधारभूत सुविधाओं की देख-रेख और बेहतरी का काम करती थी. अब उसका क्या होगा?

सरकारी अधिकारियों का सवाल है कि जो लोग इलाज का खर्च उठाने में सक्षम हैं उनको भी मुफ्त इलाज की सुविधा क्यों दी जानी चाहिए? ममता सरकार ने सत्ता में आने के बाद तमाम अस्पतालों में उचित मूल्य की दवा की दुकानें खोली थीं जहां मुद्रित मूल्य (एमआरपी) पर 60 फीसदी तक की छूट मिलती थी. सवाल यह भी है कि अगर मरीजों को दवा भी मुफ्त में ही मिलेगी तो इन दुकानों को ग्राहक कहां से मिलेंगे और इनका औचित्य क्या रह जाएगा. अभी ऐसे कई सवालों का जवाब मिलना बाकी है.

कोलकाता और मालदा के सरकारी शिशु अस्पतालों से नवजात शिशुओं की मौतों की खबरें अक्सर सुर्खियां बटोरती हैं. क्या सरकार के ताजा फैसले से इन मौतों पर कोई रोक लगेगी? इस सवाल पर स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि पहले भी उन अस्पतालों में कोई ज्यादा पैसे नहीं लगते थे. मूल सवाल पैसों नहीं, बल्कि आधारभूत सुविधाओं, डाक्टरों और दूसरे प्रशिक्षित कर्मचारियों की कमी का है. सरकार की तमाम कोशिशों के बावजूद ग्रामीण इलाकों में डाक्टरों के ज्यादातर पद खाली पड़े हैं. ज्यादातर प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों में तो नर्स या कंपाउंडर ही डाक्टर का काम कर रहे हैं. ऐसे में सरकार के इस फैसले से हालत में किसी आमूलचूल बदलाव की उम्मीद नहीं की जानी चाहिए.

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