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ब्लॉग

कितना कामयाब रहेगा मोदी का दौरा

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बांग्लादेश दौरे से पारस्परिक संबंधों में नई उम्मीद जगी है. लेकिन घरेलू विरोध के कारण तीस्ता नदी के पानी के बंटवारे पर संधि का नहीं हो पाना संबंधों की राह में बड़ा रोड़ा साबित हो सकता है.

मोदी ऐसे समय में बांग्लादेश के दौरे पर जा रहे हैं जब वहां अभिव्यक्ति की आजादी खतरे में है. पिछले कुछ दिनों में वहां तीन ब्लॉगरों की हत्या हो चुकी है और कई ब्लॉगरों और बुद्धिजीवियों को लगातार धमकियां मिल रही हैं. इस दौरे का सबसे अहम एजेंडा चार दशक पुराने जमीन सीमा करार पर औपचारिक हस्ताक्षर करना है. इसके तहत भारत और बांग्लादेश में स्थित एक-दूसरे के भूखंडों में रहने वालों को अपना वतन मिल जाएगा. देश के विभाजन के समय सर रेडक्लिफ ने जो गलतियां की थीं उनको इस समझौते के जरिए अब सुधारा जा रहा है. विभाजन के समय दोनों देशों में कई ऐसे भूखंड बच गए थे जिन पर पड़ोसी देश का मालिकाना हक था. नतीजतन वहां रहने वाले मौलिक और संवैधानिक सुविधाओं से वंचित थे. अब आजादी के कोई सात दशक बाद उन लोगों को सही मायने में आजादी मिलेगी.

मोदी के दौरे के दौरान बांग्लादेश से घुसपैठ का मुद्दा भी सामने आएगा. पश्चिम बंगाल और असम समेत देश के कई राज्य घुसपैठ की समस्या से जूझ रहे हैं. पूर्वी पाकिस्तान और बाद में आजाद होकर बांग्लादेश के गठन के बाद से ही यह समस्या जस की तस है. भाजपा इनको अवैध घुसपैठिया मानती है. बीते लोकसभा चुनावों में नरेंद्र मोदी ने बंगाल में अपनी एक चुनावी सभा के दौरान घुसपैठ का मुद्दा भी उठाया था. लेकिन अब देखना यह है कि बांग्लादेश जाकर प्रधानमंत्री शेख हसीना के साथ बातचीत में वे इस मुद्दे को कितनी गंभीरता से उठाते हैं.

यह बात अलग है कि उनके साथ बांग्लादेश जाने वाली पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी बांग्लादेश से आने वालों को घुसपैठिया नहीं बल्कि शरणार्थी मानती हैं. उनसे पहले लेफ्ट फ्रंट की सरकार ने भी यही नजरिया अपनाया था और बांग्लादेश से आने वालों को पहचान पत्र और जमीन मुहैया करा कर यहां बसने में सहायता की थी. दरअसल, वोट बैंक की राजनीति इस मामले में अहम भूमिका निभाती रही है. मोदी के दौरे में बांग्लादेश में हिंदुओं पर होने वाले अत्याचारों और उनके धार्मिक स्थलों पर तोड़-फोड़ का मुद्दा भी उठने की संभावना है. हाल के दिनों में जिन दो ब्लॉगरों की सरेराह हत्या कर दी गई उनमें से दो हिंदू थे. इसके अलावा सीमा पार से तस्करी का मुद्दा भी अहम है.

बीते साल मोदी के सत्ता में आने के बाद बांग्लादेश की राजनीतिक पार्टियां कुछ आशंकित थीं. लेकिन अब उनकी यह आशंका काफी हद तक दूर हो गई है. यह इसी से साफ है कि प्रमुख विपक्षी पार्टी बांग्लादेश नेशनल पार्टी (बीएनपी) ने भी मोदी के इस दौरे का स्वागत किया है. लेकिन भारत सरकार को इस मामले में फूंक-फूंक कर कदम बढ़ाना होगा क्योंकि बीएनपी और कट्टरपंथी संगठन जमाते इस्लामी के संबंध जगजाहिर हैं.

जमीन सीमा समझौते के अलावा इस दौरान कोलकाता-ढाका-अगरतला बस सेवा का औपचारिक उद्घाटन भी होगा. भारत-बांग्लादेश और खासकर बंगाल और बांग्लादेश के संबंध ऐतिहासिक हैं. बंगाल और बांग्लादेश की संस्कृति, भाषा और खान-पान में काफी समानता है. ऐसे में इस बस सेवा के जरिए यह संबंध और मजबूत होंगे. इस दौरान घुसपैठ के अलावा सीमा पार से आंतकवाद को प्रश्रय नहीं देने के मुद्दे पर भी चर्चा होगी. खासकर बर्दवान विस्फोट के बाद बंगाल में जिस तरह बांग्लादेशी संगठन के व्यापक नेटवर्क का खुलासा हुआ था, उसे ध्यान में रखते हुए यह मुद्दा प्रासंगिक है.

दोनों देशों के बीच व्यापार घाटे को संतुलित करने और वीजा की प्रक्रिया को आसान करने समेत कई अन्य द्विपक्षीय मुद्दों पर विचार-विमर्श होने की भी संभावना है. लेकिन आपसी संबंधों की राह में अब भी तीस्ता जल बंटवारा समझौता सबसे बड़ा रोड़ा है. तीस्ता के पानी पर भले ही समझौता नहीं हो रहा हो, लेकिन मोदी और हसीना के बीच बातचीत में यह मुद्दा उठेगा जरूर. मोदी इस मुद्दे पर ममता के साथ होने वाली बातचीत से हसीना को अवगत करा सकते हैं. ममता शनिवार को ही बांग्लादेश जाएंगी और रविवार को जमीन सीमा समझौते पर हस्ताक्षर के बाद वापस लौट आएंगी. वे तीस्ता के पानी में बंगाल के लिए ज्यादा हिस्सा चाहती हैं ताकि किसानों को दिक्कत नहीं हो. उनको मनाने के लिए ही केंद्र ने साफ कर दिया है कि इस दौरे पर तीस्ता के पानी पर कोई बातचीत नहीं होगी. लेकिन दूसरी ओर, बांग्लादेश के लिए यही मुद्दा सबसे अहम है. यह देखने वाली बात होगी कि मोदी इस मुद्दे पर कैसा रवैया अपनाते हैं.

तीस्ता समझौते की वजह से मोदी के इस दौरे की चमक कुछ फीकी जरूर रहेगी, लेकिन बावजूद इसके इससे दोनों देशों के आपसी संबंधों में एक नए अध्याय की शुरूआत होने की उम्मीद है.

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