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खेल

कितना अलग है अफ्रीका का फुटबॉल

पहली बार किसी अफ़्रीकी देश में फ़ुटबॉल विश्व कप हो रहा है और दुनिया की नज़र अब अफ़्रीकी महाद्वीप में फ़ुटबॉल खेल की ओर है. कहा जाता है कि लातिन अमेरिका में फ़ुटबॉल यूरोप से बिल्कुल अलग है. क्या अफ़्रीका में भी ऐसा है?

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जर्मन शहरों की आम तस्वीर में फ़ुटबॉल नदारद रहता है. वह मौजूद है तो स्टेडियमों में, घरों में टेलीविज़न के पर्दे पर, या पबों में सड़कछाप विशेषज्ञों की बहस में. जर्मनी में आपको बहुत कुछ देखने को मिलेगा, लेकिन सड़कों पर फुटबॉल नहीं देखा जा सकता. अफ़्रीका में ऐसी बात नहीं है, फ़ुटबॉल हर कहीं है. घाना की राष्ट्रीय टीम के खिलाड़ी आबिदे पेले कहते हैं, यह हमारा हिस्सा है. हम घरों के पिछवाड़ों में खेलते हैं, सड़कों पर खेलते हैं, जहां कहीं भी थोड़ी सी जगह मिल जाती है, हम वहां खेलते हैं.

Süd-Afrika Schulkinder beim Fußball

अफ़्रीका में फ़ुटबॉल सादा है, ख़ूबसूरत है. इसके लिए न तो पैसे की ज़रूरत होती है, न महंगी जर्सी की. बस कुछ नौजवान लड़के चाहिए. यूरोप में तो लड़कियां भी फ़ुटबॉल में थोड़ी बहुत दिलचस्पी लेने लगी हैं, ख़ासकर जर्मन लड़कियां. विश्व चैंपियन होने के बाद. लेकिन अफ़्रीकी लड़कियों को फ़ुटबॉल से कोई लगाव नहीं. यह खेल निखट छोरों का मामला है. क़ायदे का फ़ुटबॉल भी ज़रूरी नहीं है, प्लास्टिक वास्टिक से कोई गोल मोल सी चीज़ बन जाती है. शॉट लगाने के लिए पैरों में टायरों के बने चप्पल काफ़ी हैं. और गोलकीपर के लिए दस्ताने? क्या उससे चप्पल से लगाए गए शॉट बेहतर रोके जा सकते हैं? सभी खिलाड़ियों में प्रतिभा नहीं होती है. अफ़्रीका में भी नहीं, लेकिन जिस तरीके से वे फ़ुटबॉल खेलने के मौके ढूंढ़ निकालते हैं, उसमें बेशक प्रतिभा है. मसलन गोलपोस्ट तैयार करने में.

और झुग्गी झोपड़ियों में खेलने वाले इन किशोरों में से प्रतिभाएं उभर रही हैं. जिन पर यूरोप के क्लबों की भी तीखी नज़र है. वहां से उन्हें ले आया जाता है, अकादमियों में यूरोपीय क़ायदे का फ़ुटबॉल सिखाया जाता है.

Flash-Galerie Fussball WM Südafrika 2010

ऊंची क़ीमत पर क्लबों की टीम में शामिल किया जाता है. कामयाब रहने पर आगे चलकर उनकी नीलामी होती है, अपने क्लबों के लिए वे गोल दागते हैं. उन्हें अपने देश की टीम में शामिल होने का मौक़ा मिलता है. कैमरून के खिलाड़ी सैमुएल एटोओ कहते हैं, "फ़ुटबॉल खेलना मेरे लिए जुनून सा है. पर मुझे अपने आपको बदलना पड़ेगा. अफ़्रीका में मैं मज़े के लिए खेलता हूं; यूरोप में जीतने के लिए."

फ़्रांस बेकेनबावर भी इसे मानते हैं. वे कहते हैं कि हो सकता है कि अफ़्रीका में पेशेवर फ़ुटबॉल बहुत विकसित नहीं है. बहुत से प्रतिभाशाली खिलाड़ी पैसे कमाने के लिए यूरोप आ रहे हैं. यहां आकर वे देखते हैं कि फ़ुटबॉल यहां अपनी जान खो बैठा है. एक खेल के तौर पर उसकी पहचान नहीं रह गई है. बेकेनबाउअर कुछ उदासी के साथ कहते हैं, "सच कहता हूं, तकलीफ़ होती है."

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