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विज्ञान

कार पूछेगी, क्यों हॉर्न बजाया

गाड़ी में हॉर्न खतरे का संकेत देने के लिए लगाया जाता है. लेकिन भारत में हॉर्न बजाना गाड़ी चलाने के साथ एक जरूरत बन गई है. मुंबई में ऐसे तरीकों पर काम हो रहा है कि ड्राइवर अगली बार हॉर्न पर हाथ रखने से पहले जरूर सोचे.

भारत के ज्यादातर शहरों की तरह मुंबई में भी लगातार हॉर्न बजाना एक रिवायत ही है. सड़क पर सिर्फ एक सवारी निकलने की जगह है और इसी में साइकिल, रिक्शा, ऑटो, कार, बस सबको पार पहुंचना होता है. इस जंग की जीत में सबसे बड़ा हथियार हॉर्न ही होता है.

क्यों बजाया हॉर्न

शहर की दो टीमों ने दो अलग अलग उपकरण बनाए हैं, जो हॉर्न पर काबू लगा सकते हैं. पहला तरीका है कि अगर किसी ने ज्यादा हॉर्न बजाया, तो फौरन जुर्माने की पर्ची कट जाएगी और दूसरा थोड़ा जज्बाती है, जो ड्राइवर को बताएगा कि "भई, क्यों फालतू हॉर्न बजा रहे हो".

जयराज सालगांवकर ने स्थानीय इंजीनियरों के साथ मिल कर 'ओरेन हॉर्न यूसेज मीटर' तैयार किया है. यह मीटर एक सीमित मौके तक हॉर्न बजाने की इजाजत देता है. इसके बाद कार की पिछली लाइटें ब्लिंक करने लगती हैं, जिससे ट्रैफिक पुलिस वाला उसे रोक सकता है और चालान काट सकता है. इसमें ड्राइवर को पहले चेतावनी मिलेगी. ट्रैफिक लाइट की तरह हरे, पीले और लाल रंग की बत्तियां होंगी, जो हॉर्न बजाने के साथ जलती चली जाएंगी.

टॉप अप भी होगा

सालगांवकर के पास आइडिया है कि प्री पेड टेलीफोन कार्ड की तरह लोग इस मीटर को भी टॉप अप कर सकते हैं. वह चाहते हैं कि मुंबई की सभी कारों में यह मीटर लगे, "मैंने इसमें पैसा, वक्त और अपनी भावनाएं लगाई हैं. लोग हॉर्न बजाने में शान समझते हैं. दिखाना चाहते हैं कि उनके पास कार है. जब तक उन्हें पैसे न देने पड़ें, उनकी यह आदत नहीं बदलने वाली है."

दूसरा तरीका जरा मानवीय है. 'प्रोजेक्ट बीप' के तहत डैशबोर्ड पर एक लाल बटन होगा, जो मुंह चिढ़ाता नजर आएगा. जैसे ही कोई हॉर्न बजाएगा, यह जल उठेगा. इसे तैयार करने वाले मयूर ताकचंदानी का कहना है, "यह आदत बन गई है. कई बार ड्राइवर को पता भी नहीं होता कि वह हॉर्न बजा रहा है." ताकचंदानी ने मुंबई में पिछले छह महीने में 30 ड्राइवरों पर इस उपकरण का प्रयोग किया है और पाया है कि इसके बाद ड्राइवर 60 फीसदी कम हॉर्न बजा रहे हैं. उनका कहना है, "इससे सड़क पर दूसरे लोगों को फायदा है."

Indien Verkehr Mumbai

ध्वनि प्रदूषण का शिकार भारत के शहर

सेहत से जुड़ा हॉर्न

ट्रकों के पीछे "ब्लो हॉर्न" लिखा होता है और शायद इस पर कोई ध्यान भी नहीं देता कि हॉर्न बजाने से सेहत पर भी खराब असर पड़ सकता है. आम तौर पर भारत में ओवरटेक करते हुए हॉर्न बजाना "अच्छा" माना जाता है. मुंबई जैसे शहरों में लगातार गाड़ियों की संख्या बढ़ती जा रही है और इसके साथ ही हॉर्न बजाना भी. शहर में करीब नौ लाख कारें, 10,000 बसें और 20 लाख दोपहिया वाहन हैं.

ध्वनि प्रदूषण के खिलाफ आंदोलन चला रही आवाज फाउंडेशन की सुमैरा अब्दुलअली का कहना है, "मैं अस्पताल में ऐसे लोगों को जानती हूं, जो ध्वनि प्रदूषण के शिकार हुए हैं और यह हॉर्न से हुआ है." उनका कहना है कि मुंबई के व्यस्त इलाकों में ध्वनि प्रदूषण का स्तर 85 डेसिबल से ऊपर रहता है, जो सेहतमंद वातावरण से बहुत ज्यादा है. इससे हाई ब्लड प्रेशर, हार्ट अटैक और बहरेपन का अंदेशा रहता है.

लगातार अभियान

इससे पहले दिल्ली में भी हॉर्न बजाने के खिलाफ अभियान चल चुका है और वहां की गाड़ियों पर "डू नॉट हॉन्क" के स्टिकर दिखते हैं.

पिछले साल बैंगलोर में कुछ लोगों ने क्रिकेटर राहुल द्रविड़ के नेतृत्व में हॉर्न नहीं बजाने का अभियान शुरू किया. इन्होंने तय किया कि जब तक बहुत जरूरी नहीं होगा, हॉर्न नहीं बजाएंगे. लेकिन आदत को देखते हुए लगता है कि जब तक अंकुश न लगे, लोग हॉर्न बजाना बंद नहीं करेंगे.

हॉर्न बजाने की प्रवृत्ति पर काम करने वाले गैरसरकारी संगठन फाइनल माइल के राम प्रसाद कहते हैं, "ज्यादातर लोगों को लगता है कि दूसरे हॉर्न बजा रहे हैं." वह चेतावनी देते हैं कि अगर ट्रैफिक पुलिस को चालान का प्रावधान दिया गया, तो इससे रिश्वतखोरी ही बढ़ेगी.

एजेए/एएम (एएफपी)

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