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डीडब्ल्यू अड्डा

कारोबारी लाभ है ओबामा दौरे का उद्देश्य

अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा के भारत दौरे से पहले जर्मन अखबारों का कहना है कि ओबामा के पहले भारत दौरे का लक्ष्य रणनैतिक सहयोग से ज्यादा आर्थिक सहयोग है.

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फ्रैंकफुर्ट से प्रकाशित दैनिक फ्रैंकफुर्टर अलगेमाइने त्साइटुंग ने लिखा है कि एशिया के महत्वपूर्ण देशों के दौरे से वहां बड़ी और छोटी उम्मीदें पैदा हुई हैं.

भारत में उन्हें संशय को दूर करना होगा. जब से जॉर्ज बुश राष्ट्रपति नहीं हैं, अमेरिकी भारत रोमांस समाप्त हुआ समझा जा रहा है. राजनीतिक दिल्ली में ओबामा के पूर्वगामी का सम्मान होता है, क्योंकि वे एक राजनीतिक दूरदर्शिता दिखा रहे थे जिसके केंद्र में भारत था.उसकी अभिव्यक्ति भारत अमेरिकी परमाणु समझौता है, जिसे बुश ने आधी दुनिया के विरोध के बावजूद मनवा लिया था.उन्होंने भारत को मान्यता प्राप्त परमाणु सत्ता बनने दिया और इसके साथ ही उसे साथ अंतरराष्ट्रीय राजनीति की पहली कतार में ला दिया.

वित्तीय दैनिक फाइनैंशियल टाइम्स डॉयचलांड का कहना है कि एशिया दौरे पर ओबामा भारत के साथ संबंधों को गहरा बनाना चाहते हैं.

जॉर्ज बुश के शासनकाल में पारस्पिरक संबंधों के रिकॉर्ड ऊंचाई पर पहुंचने के बाद भारत पिछले दिनों अपने आपको उपेक्षित महसूस कर रहा था. वाशिंगटन का ध्यान बहुत ज्यादा चीन पर केंद्रित हो गया था और भारत के चिर प्रतिद्वंद्वी पाकिस्तान पर जो आतंकवाद विरोधी संघर्ष में अमेरिका का साथी है.

जर्मनी के साप्ताहिक दैनिक डी त्साइट का कहना है कि भारत के गरीबों की ओबामा से कोई उम्मीद नहीं है बल्कि सत्तावानों की है.

वे लेकिन बहुत कुछ मांग रहे हैं. वे संयुक्त राष्ट्र में स्थायी सीट के लिए अमेरिकी समर्थन मांग रहे हैं. वे पाकिस्तान को हथियारों की आपूर्ति रोकने के लिए दबाव डाल रहे हैं. वे अमेरिका से वही ध्यान चाहते हैं जो चीन को दिया जा रहा है वे अमेरिकी कंपनियों के लिए कॉल सेंटर चाहते हैं, अपने छात्रों के लिए अधिक वीजा और अधिक सैनिक तकनीकी.

नौए ज्यूरिषर त्साइटुंग ने ओबामा के दौरे को कारोबारी दौरा बताते हुए लिखा है कि राजनीतिक और रणनैतिक क्षेत्र में नई दिल्ली और वाशिंगटन के नजदीक आने की रफ्तार कम हुई है.

भारत को वाशिंगटन उभरती सत्ता चीन के संतुलन के रूप में देखता है और दौरे से पहले अमेरिकी राजनयिकों ने कई बार कहा है कि भारत को एशिया में और सक्रिय भूमिका निभानी चाहिए. हालांकि दोनों देश सहमत हैं कि मजबूत संबंध दोनों देशों के हित में हैं, लेकिन इस सहयोग का फोकस क्या हो, इस पर दोनों के विचारों में बहुत अंतर है.

अखबार लिखता है कि भारत सरकार इस बात पर भी नाराज है कि अमेरिका ने आतंकवादी डेविड हेडली के मामले में भारत को कोई सूचना नहीं दी.

भारतीय मीडिया में इस बात पर भारी नाराजगी है कि हेडली की दो बीवियों ने अधिकारियों को चेतावनी दी थी कि उनका पति एक आतंकी गुट के लिए काम करता है और हमले की योजना बना रहा है. इस चेतावनी के बावजूद हेडली बिना किसी रोकटोक के अमेरिका से पाकिस्तान और भारत का दौरा करता रहा. वाशिंगटन में आज इसके बारे में कहा जा रहा है कि विदेश मंत्रालय और एफबीआई ने आरोपों की जांच की और किसी आतंकी गुट से संपर्क का संकेत नहीं पाया. भारत के लिए यह अतीत की एक त्रासद घटना पर कार्रवाई करना ही नहीं है. हेडली के बयानों ने नई दिल्ली की आशंका की पुष्टि की है कि इस्लामी कट्टरपंथी और हमलों की योजना बना रहे हैं और पाकिस्तानी अधिकारी उसमें बाधा नहीं डाल रहे हैं.

भारत के 20 प्रदेशों से होकर सितंबर के महीने से एक विरोध काफिला गुजरा है. राष्ट्रीय सामाजिक बदलाव अभियान के पांच बस 31 अक्टूबर को राजधानी नई दिल्ली पहुंचे. इस विरोध रैली में भाग ले रहे लोग समाज के निम्नतर स्तर के लोग थे, जो अभी भी हाथ से मलमूत्र की सफाई करते हैं. बर्लिन से प्रकाशित वामपंथी दैनिक नौएस डॉयचलांड इस बदलाव रैली के बारे में लिखता है

देश के 160 जिलों से होकर निकली इस रैली का लक्ष्य था कि शौचालयों की सफाई करने वाले भेदभाव की जंजीर को तोड़ डाले और सम्मानजनक जीवन की शुरुआत करें. उनकी मांग थी कि इस अमानवीय पेशे को पूरी तरह से बंद कर दिया जाना चाहिए. 250 रुपए की मासिक तनख्वाह यू भी जीने के लिए काफी नहीं है. टॉयलेट और नालियों की सफाई करने वालों को कोई सुरक्षा पोशाक या तकनीकी उपकरण नहीं दिया जाता. वे स्थायी बीमारी के शिकार हो जाते हैं और उनके बच्चों के साथ भी स्कूलों में भेदभाव होता है.

भारत के बाद अब पाकिस्तान.

फ्रैंकफुर्ट से प्रकाशित दैनिक फ्रांकफुर्टर अलगेमाइने त्साइटुंग का कहना है कि पाकिस्तान में आई भयानक बाढ़ के तीन महीने बाद भी मुल्क अव्यवस्था से जूझ रहा है.

जुलाई के अंत में युद्ध में फंसे एक देश का सामना आपदा से हुआ. विभिन्न आकलनों के अनुसार पाकिस्तान में तालिबान विरोधी संघर्ष में मरने वाले लोगों की संख्या अफगानिस्तान से ज्यादा है. पाकिस्तानी हिस्से में खैबर पख्तूनख्वा प्रांत खासतौर पर युद्ध से प्रभावित है. वहां राजधानी पेशावर में जुलाई में 333 मिलीमीटर बारिश हुई. आर्थिक स्थित बुरी है. सरकारी कर्ज का ब्याज चुकाने के लिए पाकिस्तान ने 2008 में अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष से कर्ज लिया. मुद्रा कोष ने जून 2010 में दी जाने वाली किस्त को अभी भी रोक रखा है. पाकिस्तान से पहले वैट लागू करने की मांग की जा रही है. बाढ़ से निबटने के लिए पाकिस्तान नए कर्ज ले रहा है. अमेरिका ने पाकिस्तानी सेना को 2 अरब डॉलर देने का आश्वासन दिया है. उसके तुरंत बाद पाकिस्तान ने आतंकवाद विरोधी संघर्ष में सख्ती लाने का भरोसा दिलाया है. बाढ़ के सौ दिन बाद भी युद्ध जारी है.

संकलन: महेश झा

संपादन: एन रंजन

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