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मनोरंजन

काम जाने का डर है पाक पेंटरों को

बेहाल और बदरंग ट्रकों और लॉरियों को अपने ब्रश से आकर्षक रंगीन हुलिया देने वाले पाकिस्तानी कलाकार परेशान हैं. उन्हें डर है कि 2014 के आखिर में अफगानिस्तान से नाटो सेना के हट जाने से उनके कारोबार को भी धक्का लगेगा.

पाकिस्तान की सड़कों पर दिखाई देने वाले ट्रक भले ही अंदर से कितने ही कमजोर और पुराने क्यों न हों लेकिन उनका रंग रोगन और उनकी चमक दमक ध्यान खींचने वाली होती है. पिछले कुछ समय से अफगानिस्तान में नाटो सेना के ट्रकों और लॉरियों पर भी ऐसे ही रंग दिखाई देते रहे हैं, लेकिन कलाकारों को डर है कि सेना के चले जाने के बाद उनका काम कम हो जाएगा.

कभी मशहूर अभिनेता और अभिनेत्रियों के चेहरे तो कभी कुछ और रंगीन डिजाइन, आकर्षक लिखाई, जगह जगह लटकती बत्तियां और शीशे की सजावट हैदर अली जैसे कलाकारों का कमाल है. कराची में खुले आसमान के नीचे अपनी दुकान के बाहर बैठे अली एक नाव की आकृति बनाने की कोशिश कर रहे हैं. कुछ अन्य चित्रों में घोड़े, चीता, गायक अताउल्लाह खान और कुछ में तो पूर्व प्रधानमंत्री बेनजीर भुट्टो का चेहरा भी बनाया गया है. अली स्कूल की पढ़ाई छोड़ कर बचपन में ही दुकान पर पिता का हाथ बंटाने लग गए थे. उन्होंने बताया, "डिजाइन कैसा बनना है यह ट्रक के मालिक पर निर्भर करता है. हर कोई अपना ट्रक औरों से अलग चाहता है."

कारोबार को धक्का

पिछले एक दशक से पाकिस्तान के ये कलाकार पड़ोसी देश अफगानिस्तान में नाटो सेना के ट्रकों को भी पेंट कर रहे हैं. इस काम में मिल रहे मुनाफे से अंदाजा लगाया जा सकता है कि सेना को भी ट्रकों को सजाने में पैसे खर्च करने से कोई दिक्कत नहीं.

कलाकारों को डर है कि 2014 में अफगानिस्तान से नाटो सेना के चले जाने के साथ ही उनका अच्छा समय भी जाता रहेगा. अली ने बताया, "नाटो के ट्रकों के रहते हमारे काम की काफी मांग रही और हर कोई काम पाने की कोशिश कर रहा था. लेकिन अब कारोबार में कमी अभी से दिखाई देने लगी है."

नूर हसन पिछले 65 सालों से रावलपिंडी में ट्रक पेंट करने का काम कर रहे हैं. उनको डर है कि ट्रकों की संख्या कम होने से कई लोगों की नौकरियां चली जाएंगी. उन्होंने कहा, "उनके पास जितनी कम लॉरियां होंगी हमारे पास सजाने के लिए भी उतना ही कम काम होगा."

कराची के ही एक और कलाकार मुमताज अहमद का मानना है कि इस कारोबार को पूर्व सैन्य शासक परवेज मुशर्रफ के कार्यकाल में फायदा मिला जिन्होंने अफगानिस्तान में अमेरिकी सेना के हस्तक्षेप का समर्थन किया था.

नहीं मानते कला

पिछले कुछ सालों में इस कला ने निर्यात के क्षेत्र में अपने लिए खास जगह बनाई है. हालांकि खुद पाकिस्तान में इन कलाकारों के काम की इतनी कद्र नहीं है. अली ने बताया, "समाज के ऊंचे तबके के लोग इसे कला नहीं मानते. उनकी नजर में यह हुनर हो सकता है लेकिन कला किसी हाल नहीं."

आप इसे कुछ भी कहिए लेकिन इन लोगों के लिए यह आमदनी का बड़ा जरिया है. ट्रक मालिक इस काम के लिए उन्हें हजारों रुपये देते हैं. एक ट्रक को सजाने में दर्जन भर लोग साथ मिलकर करीब छह हफ्तों तक काम करते हैं.

अमेरिका की पेन स्टेट यूनिवर्सिटी के ट्रक आर्ट विशेषज्ञ जमाल इल्यास मानते हैं कि यह पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था में कला के बड़े क्षेत्र को दर्शाता है. उन्होंने कहा, "आप आर्ट गैलरी या टेक्सटाइल डिजाइन उद्योग के इतने विस्तार की कल्पना भी नहीं कर सकते हैं. लेकिन पाकिस्तान में इन्हें कभी असली कलाकारों के तौर पर नहीं देखा जाने वाला क्योंकि समाज का ढांचा ही कुछ ऐसा है."

एसएफ/एमजे (एएफपी)

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