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मनोरंजन

कामयाबी के लिए धैर्य जरूरी: कीर्ति

छोटे परदे के विज्ञापनों और रंगमंच के जरिए हिंदी फिल्मों में प्रवेश करने वाली कीर्ति कुल्हारी ने मनचाही कामयाबी नहीं मिलने की वजह से फिल्मों से छोटा-सा ब्रेक ले लिया था. अब पिछले हफ्ते उनकी नई फिल्म जाल रिलीज हुई है.

कीर्ति कुल्हारी कहती हैं कि हिंदी फिल्मोद्योग ने उनको धैर्य रखना सिखा दिया है. अपनी नई फिल्म के प्रोमोशन के लिए कोलकाता पहुंची कीर्ति ने डॉयचे वेले से अपने करियर और भावी सफर के बारे में बातचीत की. पेश हैं उसके मुख्य अंश:

आपकी पहली फिल्म का श्रेय शैतान को दिया जाता है?

दरअसल, मेरी पहली फिल्म खिचड़ी थी. लेकिन एक तो उसमें मैं आखिरी मौके पर आई थी और दूसरे मेरे मुकाबले सभी नामचीन लोग थे. इसलिए किसी ने मुझे नोटिस नहीं किया. इस तरह लोग शैतान को ही मेरी पहली फिल्म कहते हैं. लेकिन यह सही नहीं है.

कई फिल्म समारोहों में शामिल होने की वजह से जाल को कला फिल्म कहा जा रहा है?

ऐसा कहना सही नहीं है. जाल कोई कला फिल्म नहीं है. यह एक भ्रम है कि समारोहों में जाने वाली फिल्मों को व्यावसायिक स्तर पर कामयाबी नहीं मिलती. इस फिल्म के रिलीज में कुछ देरी जरूर हुई. लेकिन यह पूरी तरह बॉलीवुड मसाला फिल्म है. यह मौजूदा समय में भी प्रासंगिक है.

आपकी छवि एक शहरी युवती की रही है. लेकिन आपने जाल में देहाती युवती का किरदार निभाने का फैसला क्यों किया?

मैं किसी एक छवि में नहीं बंधना चाहती. लोग मुझे शहरी युवती के तौर पर देखते थे और मैं उस छवि तो तोड़ना चाहती थी. इसलिए मैंने देहाती युवती का किरदार निभाने का फैसला किया. मुझमे प्रतिभा भी है और आत्मविश्वास भी. लेकिन अफसोस कि अब तक इसे परखने वाले ज्यादा निर्देशक नहीं मिले.

शहरी से देहाती युवती के किरदार में खुद को ढालने में दिक्कत नहीं हुई?

मैं बचपन में गर्मी की छुट्टियों के दौरान राजस्थान के पिलानी स्थित अपने दादा-दादी के घर रहती थी. वहां गाय, भैंस, बकरी और ऊंट थे. हम ट्यूबवेल से पानी पीते थे और मिट्टी के बने घर में रहते थे. इसलिए जाल की शूटिंग ने मुझे अपने बचपन की याद दिला दी और यह किरदार कठिन नहीं लगा.

दो-तीन फिल्में करने के बाद आप लंबे अरसे तक नजर नहीं आईं?

मनचाही कामयाबी और सही फिल्में नहीं मिलने की वजह से मैंने एक ब्रेक लेने का फैसला किया था. उसके बाद जाल जैसी फिल्म मिली. इसमें अपने काम से मैं बेहद संतुष्ट हूं.

अपने करियर के दौरान कभी हताशाजनक स्थिति का सामना करना पड़ा?

नहीं, जब फिल्मों में काम नहीं था तो मैंने दूसरे तरीकों से खुद को व्यस्त रखा. मैंने मराठी माध्यम के स्कूलों में बच्चों को हिंदी और अंग्रेजी पढ़ाई. उस काम में बहुत मजा आता था. आदमी को वही करना चाहिए जो उसे अच्छा लगे. अगर मुझे कभी लगा कि अभिनय में मजा नहीं आ रहा है तो मैं फिल्मों को अलविदा कह दूंगी.

हिंदी फिल्मोद्योग से आपने क्या सीखा है?

सबसे बड़ी सीख तो यह मिली है कि कभी धैर्य का दामन नहीं छोड़ना चाहिए. इस क्षेत्र में धैर्य के बिना कामयाबी मुश्किल है. हर कोई रातोंरात स्टार नहीं बन जाता. शैतान में मिली सराहना के बाद मुझे लगा था कि अब हालात बदल जाएंगे और मुझे धड़ाधड़ फिल्में मिलने लगेंगी. लेकिन वैसा कुछ नहीं हुआ. उसके बाद आई दो फिल्में भी फ्लॉप रहीं. लेकिन मैंने धैर्य नहीं छोड़ा. इस उद्योग में आंख मूंद कर किसी पर भरोसा नहीं करना चाहिए.

भावी योजना क्या है?

फिलहाल एक फिल्म की शूटिंग चल रही है. यह संगीत पर आधारित एक प्रेम कहानी है. छोटे कैनवास पर बनने वाली यह एक अच्छी फिल्म है.

इंटरव्यू: प्रभाकर, कोलकाता

संपादन: महेश झा

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