काबुल हमले से राहतकर्मी पस्त | दुनिया | DW | 20.01.2014
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दुनिया

काबुल हमले से राहतकर्मी पस्त

लेबनानी खाने के शौकीन लोगों के लिए वह शुक्रवार भी वैसा ही था. काबुल के मशहूर तवेरना दू लिबान में मजेदार खाना और फुर्सत के कुछ पल. लेकिन तालिबानी हमले ने सब बदल गया. 21 लोगों की मौत, ज्यादातर विदेशी. राहतकर्मी परेशान हैं.

लगभग एक दशक में विदेशियों पर अफगानिस्तान में यह सबसे बुरा हमला रहा. देश में अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष के प्रमुख, एक वरिष्ठ संयुक्त राष्ट्र अधिकारी, अमेरिकी नागरिक और यूरोपीय संघ के कार्यकर्ता, सब मारे गए. अफगानिस्तान में रह रहे विदेशी लोगों के लिए यह हमला एक सदमे की तरह आया.

यह संदेश भी आया कि अब वहां विदेशी लोग सुरक्षित नहीं हैं. अब तक विदेशी नागरिकों को ज्यादा परेशानी नहीं होती थी. वे बाजारों में घूमते देखे जाते थे, अफगान लोगों के साथ बैठ कर चाय नाश्ता करते थे. वहां काम कर रहे एक ब्रिटिश राहतकर्मी ने कहा, "यहां खतरा बढ़ता जा रहा है. शुक्रवार को हुए हमले के बाद आप अपना घर छोड़ने से पहले दस बार सोचेंगे. और यह तो काबुल है, बहुत ज्यादा सुरक्षा वाली जगह."

नया तरीका

राजनीतिक विश्लेषक केट क्लार्क का कहना है, "आम तौर पर युद्ध में निशाना बनाने से पहले सैनिकों और नागरिकों के बीच भेद किया जाता है. लेकिन शुक्रवार का हमला अजीब था. वहां लोगों को सिर्फ इसलिए निशाना बनाया गया कि वे विदेशी थे. तालिबान ने इसको लेकर कोई सफाई भी नहीं दी. वे नागरिकों और सेना के बीच कोई भेद करने में भी दिलचस्पी नहीं रखते. वे सिर्फ यह कह रहे हैं कि हर कोई घुसपैठिया है. यह नई बात सामने आई है." क्लार्क कहती हैं, "मुझे तो एक तरह से ताज्जुब ही हो रहा है कि उन्होंने पहले ऐसा नहीं किया था. यह तो बहुत आसान तरीका है."

Bundeswehr Afghanistan Helfer

हमले के बाद खौफ में विदेशी नागरिक

आंकड़ों के मुताबिक 2013 में राहतकर्मियों पर 283 हमले किए गए, जिसमें 38 लोग मारे गए. जबकि एक साल पहले इस तरह की 175 घटनाएं हुई थीं और उस दौरान 11 लोगों की मौत हो गई थी.

बदल गए तरीके

तवेरना जैसे रेस्त्रां को बेहद सुरक्षित जगह माना जाता है, जहां तक पहुंचने से पहले स्टील के दो बुलेटप्रूफ दरवाजों पर सुरक्षा जांच की जाती है. क्लार्क का कहना है, "वैसी जगहें कम होती जा रही हैं, जहां विदेशी और अफगान लोग मिल कर बातचीत कर सकें." उनका कहना है कि ऐसे हमलों से तालिबान अफगानिस्तान सरकार पर दबाव बनाने की भी कोशिश कर सकता है. वह कहते हैं कि अगर सिर्फ विदेशी होने की वजह से लोगों की हत्या की जाने लगी, "तो खेल के नियम ही बदल जाएंगे". उनका कहना है कि इसके बाद विदेशी संस्थाएं अफगानिस्तान में काम करने के तरीके पर दोबारा विचार करेंगी.

एक गैरसरकारी संगठन के सुरक्षा मैनेजर का कहना है कि इस तरह के और हमले हो सकते हैं. अफगानिस्तान में काम कर रहे इस शख्स ने अपना नाम सामने नहीं लाने की गुजारिश की, "इस घटना के बाद पूरी सुरक्षा व्यवस्था को दोबारा देखना होगा. हो सकता है कि सुरक्षा के मापदंड और कड़े कर दिए जाएं. हमने अपने कर्मचारियों को कहा है कि वे लो प्रोफाइल बन कर रहें. रेस्त्रां जाने की बात तो वे फिलहाल सोचे भी नहीं."

एजेए/आईबी (डीपीए)

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