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दुनिया

काफी नहीं है यूरोप की डील

यूरोपीय संघ के नेता महीनों की वार्ता के बाद 2030 तक पर्यावरण सुरक्षा के नए लक्ष्यों पर सहमत हुए हैं. इसका मकसद इस साल के अंत में होने वाली पर्यावरण वार्ता के लिए यूरोपीय रवैया तय करना है. ग्रैहम लूकस की समीक्षा.

हमें ग्लोबल वार्मिंग के बारे में सालों से पता है. हिमालय में गलते ग्लेशियर, उत्तरी तथा दक्षिणी ध्रुव पर बर्फ पिघलने, बांग्लादेश जैसे देशों के लिए समुद्र स्तर के बढ़ने के खतरों की रिपोर्टें हम नियमित रूप से पढ़ते हैं. इसके अलावा कार्बन डायोक्साइड से समुद्रों के बढ़ते अम्लीकरण का खतरा है. सालों के विवाद के बाद अब सब मान गए हैं कि तापमान बढ़ने की वजह ग्रीन हाउस गैसों का बढ़ना है जो मानवीय गतिविधियों से पैदा होती हैं.

यह भी साफ है कि यह समस्या अपने आप समाप्त नहीं होगी. इस पृष्ठभूमि में यह अपेक्षा करना उचित ही है कि हमारे नेता और अंतरराष्ट्रीय समुदाय इस समस्या के निबटारे के लिए फौरी कदम उठाएंगे. अब तक उठाए गए कदम बढ़ते तापमान की गति को रोकने में नाकाम रहे हैं. हम नियमित रूप से अपने ही द्वारा तय लक्ष्यों को पूरा करने में विफल रहे हैं, इसलिए भी कि पश्चिमी देशों के लोग अपने जीवनस्तर को कम करने के लिए तैयार नहीं हैं, जिसमें ऊर्जा की ज्यादा खपत को स्वीकार किया जाता है. लेकिन कदम उठाने की जरूरत है क्योंकि मानवजाति का भविष्य दांव पर है. कदम उठाने का मतलब होगा प्राकृतिक ईंधन से मिलने वाली उर्जा की खपत में कमी और अक्षय ऊर्जा के उत्पादन में वृद्धि. दुनिया की बहुमत जनता इस दलील को समझेगी यदि उन्हें यह समझाया जाएगा.

लेकिन सबसे बड़ी समस्या है सहमत होना कि किन कदमों की जरूरत है और उन्हें कितनी जल्दी उठाया जाना चाहिए. यूरोपीय संघ द्वारा तय डील में 2030 तक कार्बन डायोक्साइड के उत्सर्जन में 1990 के स्तर से 40 प्रतिशत की कमी पर सहमति हुई है. यह बहुत प्रभावी आंकड़ा है. लेकिन मेरे नजरिए से यह काफी नहीं है. यूरोपीय देश अभी भी खनिज ऊर्जा पर बहुत अधिक निर्भर हैं. हालांकि ग्रीन तकनीक लाने की दिशा में काफी प्रगति हुई है, लेकिन वह तेज नहीं है. यह सच है कि जर्मनी ने इस क्षेत्र में दूसरे देशों से ज्यादा काम किया है. चांसलर अंगेला मैर्केल 2010 तक 10 लाख इलेक्ट्रिक गाड़ियां रास्ते पर लाना चाहती हैं, जबकि दूसरी ओर जर्मनी परमाणु ऊर्जा संयंत्रों को क्रमिक रूप से बंद करने की योजना बना रहा है. साथ ही मैर्केल बहुत से नए कोयला चालित बिजली घर बनाना चाहती हैं. ज्यादा कोयला जलाना जर्मनी के कोयला उद्योग को बचा सकता है लेकिन ग्लोबल वार्मिंग का जवाब नहीं हो सकता.

यह भी साफ नहीं है कि यूरोप 2030 तक ऊर्जा की खपत में 27 फीसदी कटौती का लक्ष्य कैसे पूरा करेगा. पहले और ज्यादा कटौती की योजना थी लेकिन फिर नेताओं को याद आया कि इससे अंतरराष्ट्रीय बाजार में यूरोपीय देशों की प्रतिस्पर्धी क्षमता घटेगी. यह दिखाता है कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर समझौते पर पहुंचना कितना मुश्किल होगा. यदि पश्चिम और एशिया के सभी प्रमुख देश अपने हितों के बारे में सोचेंगे, तो कोई समझौता नहीं होगा. खतरा बहुत बड़ा है कि गरीब देशों की कीमत पर ग्लोबल वार्मिंग जारी रहेगी. अंत में यह मानवजाति की कीमत पर होगी. यूरोप में हुई डील सही दिशा में एक छोटा कदम है, लेकिन वह किसी भी तरह काफी नहीं है.

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