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ब्लॉग

"कानून तोड़ कर कानून बने"

राजनीति को बदलने की हर दिन नई इबारत गढ़ रही आम आदमी पार्टी की सरकार अब अपने कार्यकलापों से मुहावरे भी बदल रही है. अब तक कानून हाथ में लेना नकारात्मक भाव वाला मुहावरा माना जाता था. लेकिन दिल्ली में इसका उलटा हो रहा है.

दिल्ली की सरकार भ्रष्टाचार के खिलाफ सख्त बनाने के लिए कानून हाथ में लेने को आमादा है. मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल भ्रष्टाचार के खिलाफ सख्त लोकपाल कानून बनाने के लिए स्थापित कानूनी प्रक्रिया को अपनी राह का सबसे बड़ा रोड़ा मान रहे हैं. लिहाजा वह इस प्रक्रिया को दरकिनार कर मौजूदा व्यवस्था में ही राज्यों, खास कर केंद्र शासित राज्यों पर, केन्द्र सरकार की गैरजरूरी दासता से मुक्ति का बिगुल फूंक चुके हैं.

लोकपाल के मुद्दे पर केंद्र बनाम केजरीवाल की नूराकुश्ती में छिड़ी बहस हर दिन नए आयामों को छू रही है. कानून के लिए छिड़ी इस सियासी जंग में महज एक नियम केंद्र और कानूनविदों के अखाड़े का चरखा दांव साबित हो रहा है. राजनीति और कानून के मंझे हुए खिलाड़ी इस अखाड़े में हर दिन नए पैंतरे पेश कर रहे हैं लेकिन तथ्यों की कसौटी पर खरे उतर रहे केजरीवाल के दांव की काट फिलहाल सियासी सूरमाओं के तरकश से दूर ही दिख रही है.

दिल्ली की मुश्किल

मौजूदा स्थिति के मुताबिक दिल्ली सहित सभी केंद्र शासित राज्यों को पूर्णराज्य न होने के कारण केंद्रीय नियंत्रण में माना जाता है. खास कर दिल्ली की स्थिति इस मामले में बिल्कुल भिन्न है. दिल्ली में विधानसभा और मुख्यमंत्री की अगुवाई वाली राज्य सरकार होने के बावजूद इस सिटी स्टेट में केंद्रीय प्रतिनिधि के तौर पर राज्यपाल के बजाय उप राज्यपाल होता है. अन्य केंद्र शासित राज्यों की तरह दिल्ली में भी प्रशासनिक शक्तियों का केंद्र उप राज्यपाल है. ऐसे में केजरीवाल सरकार ने इन विरोधाभाषों को राजनीतिक हथियार बनाकर दिल्ली को कानूनी तौर पर शक्ति सम्पन्न करने की सियासी मुहिम को अंजाम तक पहुचाने की फूलप्रूफ योजना बना ली है. जबकि बीते 20 साल से इन विरोधाभाषों को अन्य दल ढाल बनाकर अपनी राजनीतिक रोटियां सेंक रहे रहे थे.

Arvind Kejriwal und Manish Sisodia

मनीष सिसोदिया के साथ केजरीवाल

कानून के इस पेंच को समझने के लिए दिल्ली की कानूनी स्थिति को समझना जरूरी है. दिल्ली में 79वें संविधान संशोधन के जरिए विधानसभा पुनर्जीवित कर दिल्ली को राज्य का दर्जा दिया गया. संविधान में अनुच्छेद 239 एए जोड़कर इसे विधायी शक्तियां दी गईं. साथ ही राजकाज चलाने के लिए राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली अधिनियम 1992 लागू किया गया और सदन की कार्यवाही के संचालनार्थ प्रक्रियागत नियम के रूप में ट्रांजैक्शन ऑफ बिजनेस रूल्स भी लागू कर दिए गए. वर्ष 2002 में केंद्रीय गृह मंत्रालय के एक आदेश पर इन नियमों में नियम 55 ए जोड़ कर विधानसभा में किसी भी कानून को पेश करने से पहले उप राज्यपाल के मार्फत केंद्र की मंजूरी लेने को अनिवार्य कर दिया गया.

कानून की राजनीति

दरअसल इसके पीछे तत्कालीन दिल्ली सरकार की पहल पर विधानसभा द्वारा दिल्ली को पूर्ण राज्य का दर्जा देने की पहल करने वाला वह प्रस्ताव था जिसे सदन ने पारित कर केन्द्र सरकार को भेजा था. उस समय केन्द्र में एनडीए की और दिल्ली में कांग्रेस की सरकार थी. श्रेय लेने की ओछी राजनीति के कारण केंद्र ने उक्त प्रस्ताव तो ठंडे बस्ते में डाल दिया मगर साथ ही ऐसी रजनीति भविष्य में किसी और मुद्दे पर न हो, इसके लिए नियम 55 ए बना दिया. बीते 12 सालों से इस नियम की संवैधानिकता को चुनौती दिए बिना कांग्रेस और भाजपा इस नियम की ही आड़ में अपनी सियासत चमकाने में लगे रहे.

दिल्ली में कांग्रेस के 15 साल के शासन का अंत करने वाली आप ने जनलोकपाल के अपने वादे को कानूनी अमलीजामा पहनाने की पहल करते हुए संविधान के सहारे नियम 55 को भी निशाने पर लिया है. केजरीवाल के लिए संविधानविद सोली सोराबजी इस पहल में मार्गदर्शक साबित हुए. दरअसल केजरीवाल सरकार किसी भी कीमत पर विधानसभा से विधेयक को पारित कराना चाहती है. मगर प्रक्रियागत नियमों से जकड़ी कांग्रेस और बीजेपी नियम 55 के उल्लंघन को ढाल बनाकर विधेयक पर केंद्र की पूर्व मंजूरी लेने के लिए आप सरकार को मजबूर करन चाहते हैं. जिससे संसद द्वारा पिछले साल पारित किए गए लोकपाल कानून के साथ दिल्ली के प्रस्तावित कानून में विसंगतियों का हवाला देकर केंद्र सरकार इसे या तो पॉकेट वीटो कर ले या सदन में पेश करने की मंजूरी देने से इनकार कर दे.

सोराबजी का साथ

इससे बचने के लिए केजरीवाल ने संविधान को अपनी ढाल बनाया है. सोराबजी से ली गई कानूनी सलाह के मुताबिक संविधान का अनुच्छेद 239 एए दिल्ली विधानसभा को अन्य राज्यों की ही तरह राज्यसूची में वर्णित विषयों पर कानून बनाने का अधिकार देता है. जबकि दिल्ली अधिनियम की धारा 22 ऐसे किसी विधेयक को पेश करने से पूर्व या पारित करने के बाद केन्द्र की मंजूरी को अनिवार्य बनाता है जो किसी केंद्रीय कानून का विरोधाभाषी हो.

सोराबजी सहित अन्य कानूनविदों की दलील है कि उप राज्यपाल के मार्फत केन्द्र की पूर्व मंजूरी को अनिवार्य बनाने वाला नियम 55 संविधान और राज्य कानून के इन प्रावधानों के खिलाफ है. लिहाजा उनकी राय में इसे असंवैधानिक माना जाना चाहिए.

इस मशविरे के तुरंत बाद केजरीवाल ने केंद्रीय गृह मंत्रालय को पत्र लिखकर इस नियम को प्रभावी बनाने वाला 2002 का उसका आदेश वापस लेने की मांग कर दी. कानून की हकीकत सामने आते ही वक्त की नजाकत को भांपते हुए केंद्र ने भी केजरीवाल के अनुरोध को ठुकराने के बजाय विचारार्थ स्वीकार कर लिया है. अंतिम कानूनी सलाह के लिए गेंद अब विधि मंत्रालय के पाले में डाल दी गई है.

महज एक नियम की वजह से केन्द्र की बंधक बना दी गई दिल्ली के लिए अगले एक दो दिन महत्वपूर्ण साबित होंगे. साथ ही इस मामले में दिल्ली से निकला संदेश अन्य राज्यों के लिए भी आंख खोलने वाला साबित होगा.

ब्लॉग: निर्मल यादव

संपादन: अनवर जे अशरफ

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