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ब्लॉग

'कानूनों की व्याख्या में हो महिलाओं की भागीदारी'

सुप्रीम कोर्ट की वकील करुणा नंदी कहती हैं कि ट्रिपल तलाक जैसे कानूनों में सुधार लाने के लिए महिला मुस्लिम नेताओं, प्रख्यात मुस्लिम न्यायविदों और धर्मशास्त्रियों को भी चर्चा में शामिल करने की जरुरत है.

डीडब्ल्यू: भारत में ट्रिपल तलाक के बारे में कानून क्या कहता है?

करुणा नंदी: ट्रिपल तलाक के कायदे 1937 के एक अधिनियम के अलावा सुप्रीम कोर्ट के कई फैसलों से चलता है जिनमें अदालतों को ही इन मामलों में अंतिम पैरोकार माना जाता है. इसकी कोई ठोस वजह होनी चाहिए और इसके पहले सुलह के भरपूर प्रयास किए जाने चाहिए. इसीलिए मुझे लगता है कि यह ट्विटर वगैरह पर तलाक दे देना, इन सभी तर्कसंगत तरीकों को फेल कर देता है. चूंकि इसके पहले सुहल के प्रयाप्त प्रयास भी नहीं होतेे ऐसे में इसकी अनुमति भी नहीं होनी चाहिए. समस्या तब होती है जब इसके बावजूद कोई जाकर तलाक ले लेता है और समुदाय भी उसे मान्यता दे देता है, तब सारा भार महिला पर पड़ जाता है कि वह जाकर कोर्ट में उसके खिलाफ कार्यवाई करे.

कानून के दो पहलू हैं. पहला वह जो कि कोर्ट का निर्णय हो. दूसरा वह कि असलियत में क्या हो रहा है. अक्सर यह दोनों एक ही जैसे होते हैं लेकिन ऐसे भी कुछ मामले में जब इन दोनों बातों में बहुत अंतर होता है. मिसाल के तौर पर, अगर कोई फतवा है जिनमें ससुर अपनी बहू का बलात्कार करे तो यह तो पूरी तरह से अनुचित हुआ. अगर कुछ दबंग लोग इसे मनवाना जाहें तो फिर इसका दारोमदार भी पीड़िता पर ही आ जाता है कि वह अदालत का दरवाजा खटखटाए. अंतत: हमें इस हाल में आना होगा कि तलाक जैसे मामले दोनों में से किसी भी पक्ष की ओर से आए तो वे तर्कसंगत हों. तभी इसमें आपसी सहमति का आधार बन सकेगा.

इस प्रथा के दुरुपयोग को रोकने के लिए कैसे कदम उठाए जाने चाहिए?

जहां तक सुधारों की बात है, दो चीजें करने की जरूरत है. सबसे पहले तो जाकिया सोमानी जैसी महिला मुस्लिम नेताओं, प्रख्यात मुस्लिम न्यायविदों और धर्मशास्त्रियों को भी इन कानूनों की व्याख्या में सुधार लाने के लिए चर्चा में शामिल करना चाहिए. ऐसे सुधार जो कि कुरान, संविधान और महिलाओं के खिलाफ भेदभाव के सभी रूपों के उन्मूलन पर सम्मेलन (सिडौ) के अनुरूप हो. हम कमाल फारूकी, दिल्ली के शाही इमाम और देवबंदी जैसे लोगों को कुछ ज्यादा ही तवज्जो देते हैं.

ऐसे कई तरीके हैं जिनसे हम ट्रिपल तलाक को कुरान का पालन करते हुए भी संविधान में वर्णित अधिकार के स्वर्णिम त्रिकोण माने जाने वाली धाराओं 14, 19 और 21 की प्रक्रिया के अनुरूप बना सकते हैं. ट्रिपल तलाक के लिए बताए गए सभी आधारों का पालन हो तब ही वह उचित है, जैसे पत्नी की सहमति से या पति को छोड़ देना वगैरह.

ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सलन लॉ बोर्ड जैसी कई इस्लामिक संस्थाएं कहती हैं कि वे इस प्रथा को हतोत्साहित तो कर रही हैं लेकिन इसे नाजायज करार नहीं करवाना चाहतीं. क्या समस्याओं से निपटने के लिए इतना काफी है?

वे सिर्फ कह रहे हैं कि हम ट्विटर और एसएमएस के माध्यम से तलाक को पसंद नहीं करते और इसे हतोत्साहित करने के लिए हम अपने समुदाय के साथ काम करेंगे. लेकिन और कुछ नहीं करेंगे. ऐसे दूरी बनाने से नहीं चलेगा. आखिर समुदाय के अन्य लोग भी भारत के नागरिक हैं और उनके पास भी संवैधानिक अधिकार हैं. उनमें से कई लोग इस्लामी कानून भी मानने में रुचि रखते हैं. उन्हें भारतीय मुस्लिम महिला आंदोलन (BMMA) जैसे संगठनों और अदालतों की मदद से नेतृत्व करने का मौका देना चाहिए.

आपकी राय में अधिकतर मुस्लिम संगठन इस प्रथा को रोके जाने का इतना विरोध क्यों करते हैं?

पितृसत्तात्मक और सुरक्षात्मक सोच. एक अल्पसंख्यक समुदाय में अपनी परंपराओं की आड़ में सुरक्षित महसूस करने की प्रवृति होती है और इसमें कोई भी ज्यादा बदलाव नहीं चाहता. इसे छद्म धर्मनिरपेक्षता से भी बल मिलता है, जिसमें कई नेता लोगों की समस्याओं को सुलझाने से अधिक अपने वोट पक्के करने की कोशिश करते हैं.

क्या यूनीफॉर्म सिविल कोड (समान नागरिक संहिता) इसका उपाय है?

यह बात कई लोगों को बड़ी आकर्षक लगती है. लेकिन इसमें काफी समस्या है और मेरा मानना है कि इस बारे में कई अल्पसंख्यक समुदायों की चिंताएं पूरी तरह गलत भी नहीं हैं. आजकल के राजनीतिक माहौल में अगर समान नागरिक संहिता हो भी तो बड़ी संभावना है कि वह सवर्ण पितृसत्तात्मक हिंदू मूल्यों के हिसाब से चलाई जाएगी, इसीलिए लोग इसके खिलाफ हैं.

सुप्रीम कोर्ट में वकील करुणा नंदी मानवाधिकार और वाणिज्यिक विवाद समाधान से जुड़े मामलों की विशेषज्ञ हैं.

इंटरव्यू: आशुतोष पांडेय

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