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मनोरंजन

कहां सिलवाते हैं भगवान अपने कपड़े?

भगवान तो सर्वव्यापी है, सार्वभौमिक है, सर्वेसर्वा है, तो उन्हें क्या जरुरत पड़ी है कपड़े सिलवाने की? सवाल सही है, पर यदि उत्तर चाहिए तो चले आइये कृष्ण नगरी वृंदावन की कुंज गलियों में जहां भगवान की पोशाकें बनाई जाती हैं.

अपने कपड़े सिलवाने के लिए भगवान को भी या तो अपनी तस्वीर भिजवानी पड़ती है या फिर किसी कारीगर के जरिये अपनी मूर्ति का नाप भिजवाना होता है, ताकि भक्तों को रिझाने लायक पोशाक बनवाई जा सके. वृंदावन के लोई बाजार से भगवान की विभिन्न तरह की पोशाकें खरीदी जा सकती हैं.

कृष्णा से यीशु तक

वृंदावन में कमोबेश हर भगवान के विग्रह की पोशाक तैयार की जाती है. इनमें श्री कृष्ण, श्री राम, भगवान शंकर, गणेश जी, प्रभु लक्ष्मी नारायण के अलावा कुछ जोड़ियां जैसे राधा-कृष्ण, राम-सीता ,शंकर-पार्वती और दुर्गा, सरस्वती, लक्ष्मी जैसी देवियां भी शामिल हैं.

दुनिया भर से लोग इन्हें खरीदनें के लिए वृंदावन पहुंचते हैं. इनमें बहुत बड़ी तादाद उन विदेशियों की है जो हिंदू संस्कृति को अपना चुके हैं. कुछ विदेशी वे भी हैं जो गिरिजाघरों में स्थापित भगवान यीशु और मदर मैरी की पोशाकें सिलवाने के लिए यहां आते हैं. और अब तो अरब, इस्राइल और कुवैत के लोग भी अपने अपने मंदिरों की पोशाकों के लिए यहां पहुंचने लगे हैं. इस्कॉन के दुनिया भर में स्थापित कृष्ण मंदिरों के लिए वृंदावन में ही पोशाकें बनाई जाती हैं.

तीस लाख की पोशाक

धर्म नगरी वृंदावन में सैकड़ों की संख्या में ठाकुर जी की पोशाक सिलने वाली दुकानें मौजूद है जहां आप अपने भगवान के लिए तीन हजार से लेकर तीस लाख रुपये तक की पोशाक आसानी से सिलवा सकते हैं. शहर भर में रेजाना लगभग 30-40 लाख रुपये तक की एक हजार से ज्यादा पोशाकों की बिक्री होती है.

औसतन एक फीट के विग्रह के लिए साधारण सी पोशाक चार हजार रुपये में खरीदी जा सकती है. अब यह आप पर निर्भर है कि आप अपने भगवान की ड्रेस पर कितने रत्न-जवाहरात जडवाना चाहते हैं. जितने रत्न-जवाहरात, उतनी ही महंगी पोशाक. जानकार बतातें हैं कि यह एक ऐसा व्यवसाय है जो शुरू होते ही लाभ देने लग जाता है.

भगवान के फैशन डिजाइनर

इस रोजगार से लगभग चार हजार लोग जुड़े हुए है, जो पीढ़ियों से यही काम कर रहे हैं. काम करने वालों में अधिकांश पुरुष हैं लेकिन कुछ स्थानों पर महिलाएं भी इस से अपरोक्ष रूप से जुड़ी हुईं हैं. शहर के कोने कोने में भगवान के फैशन डिजाइनर फैले हुए हैं, जो पोशाक के साथ साथ आभूषण, मुकुट, अस्त्र-शस्त्र, छत्र, खडाऊं और भगवान के आगे तथा पीछे लगाया जाने वाला पर्दा तैयार करतें हैं.

वृंदावन में ऐसी ही एक दुकान चलने वाले मोहित अग्रवाल बताते हैं कि उनके परदादा ने यह व्यवसाय शुरू किया था जो निरंतर बढ़ता ही जा रहा है. वह बताते है कि भारत में वृंदावन और कुछ हद तक राजधानी दिल्ली में ही यह काम होता है. इन पोशाकों के लिए ज्यादातर बैंगलोर सिल्क कपड़े का इस्तेमाल किया जाता है.

जरदौजी और आरी-तारी का काम वृंदावन के कारीगरों की खासियत है. मोहित बताते है कि भगवान की पोशाक बनाने के लिए सबसे पहले उनके दर्शन जरूरी हैं क्योंकि हर मूरत अलग होती है और उसके दर्शन से ही कार्य करने की प्रेरणा प्राप्त होती है.

कभी नहीं धुलते कपड़े

यदि तस्वीर की सहायता से पोशाक बनवाई जानी है तो बेहद जरूरी है कि ऐसा चित्र भेजा जाए जिसमें सम्पूर्ण शरीर दिखे और खास तौर से आंखे बिलकुल साफ दिखाई दे. वह कहते है कि दर्शन के बाद पोशाक की डिजाइनिंग इस तरह से की जाती है कि वह दर्शन करने वालों में एकदम से श्रद्धा के भाव जागृत कर दे. डिजाइनिंग के बाद फ्रेम के ऊपर कपड़ा लगा कर उस का इम्प्रैशन लिया जाता है और फिर शुरू होती है कशीदाकारी.

780 से भी ज्यादा प्रकार के रंग भगवान की पोशाक बनाने के काम में लाए जाते हैं. मुकुट इत्यादि के लिए पीतल, गत्ते, कपड़े के अलावा हीरे जवाहरात का प्रयोग भी किया जाता है. मोहित बताते है कि भगवान की पोशाक के साथ साथ उन के श्रंघार की सामग्री पर भी विशेष ध्यान दिया जाता है. यह पोशाकें विश्व के अन्य देशों के अलावा जर्मनी के बर्लिन, कोलोन, हैम्बर्ग और हाईडलबर्ग में भी निर्यात की जाती हैं.

यह भगवान की सेवा करने वालों पर निर्भर करता है कि वे अपने भगवान की पोशाक कितनी बार बदलवाते हैं. त्यौहार और अवसर विशेष पर तो एक ही दिन में तीन चार बार विग्रहों की पोशाक और श्रंघार को बदला जाता है. आम तौर पर गौर पूर्णिमा अर्थात होली, कृष्ण जन्मोत्सव, राधाष्टमी और दीपावाली पर तो ठाकुर जी की पोशाक बदलवानी अनिवार्य है. ध्यान देने वाली बात है कि भगवान के कपड़ों को कभी धोया नहीं जाता और खराब हो जाने पर उन्हें पानी में विसर्जित कर दिया जाता है.

'खुदा की बंदगी, ऊपर वाले की इनायत'

मज़े की बात यह है कि वृंदावन में हिंदू भगवान की मूर्तियों को सजाने की पोशाकों को बनाने का ज्यादातर काम मुस्लिम कारीगरों द्वारा किया जाता है, जो बहुत ही श्रद्धा से इस काम को अंजाम देते हैं.

जरदोजी में निपुण मोहम्मद अकरम बताते हैं कि जब वे दस साल के थे तभी से अपने बड़े भाई से यह काम सीखने लगे. वह कहते हैं कि काम सीखते सीखते ही उन्हें चार साल लग गए थे. अपने पेशे को खुदा की बंदगी और ऊपर वाले की इनायत बताते हुए वे कहते है कि अकीदत के साथ यदि कोई काम किया जाये तो सब कुछ किया जा सकता है. मोहम्मद अकरम का कहना है कि अच्छा काम करने वाला कारीगर 500 से 600 रूपये तक की दिहाड़ी आसानी से कमा सकता है.

28 वर्षीय मोहम्मद मुत्तन पंद्रह बरस से यह काम कर रहे हैं और दुनिया भर के सैकड़ों मंदिरों के लिए पोशाकें बना चुकें हैं. वे बताते हैं कि जब उनकी बनाई पोशाक को धारण किये हुए ठाकुर जी को लोग सजदा करतें हैं तो उन्हें अपने काम पर फक्र महसूस होता है. नयी पीढ़ी द्वारा इस कार्य मे ज्यादा रूचि नहीं लिए जाने पर चिंता व्यक्त करते हुए मोहम्मद कहते हैं कि अगर यही हाल रहा तो दस पंद्रह साल में यह कारोबार खत्म हो जायेगा. उन्हें इस बात का भी मलाल है कि यदि यह काम कंप्यूटर ने करना शुरू कर दिया तो इसकी पाकीजगी ही खत्म हो जाएगी.

रिपोर्ट: जसविंदर सहगल, वृंदावन

संपादन: ईशा भाटिया

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