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दुनिया

कहां गया पहाड़ी आलू

आलू के बिना खाने की थाली अधूरी रहती है. गोश्त में मिलाना हो या सब्जी में, चिप्स हो या फिंगर फ्राई और गरीबों के लिए आलू न हो तो भूखे ही रह जाएं. इतना जरूरी होने पर भी आलू की कुछ अच्छी किस्में गायब हो रही हैं.

बेहद बारीक छिलके वाला सबसे स्वादिष्ट पहाड़ी आलू देखते ही देखते बाजार से गायब हो गया. कड़ाके की सर्दियां खत्म होने पर सुहानी फरवरी में पहाड़ी आलू की आमद से बसंत में चाव भर जाता था. पर अब पहाड़ पर भी पहाड़ी आलू नदारद है. नैनीताल और रानीखेत के ज्यादातर बाजारों में पहाड़ी आलू कम और चिपसोना ज्यादा बिक रहा है. पहाड़ के लोग इसके पीछे शहरीकरण को एक बड़ा कारण मानते हैं जो हाल ही में आई विपदा की भी बहुत बड़ी वजह बताई जा रही है.

नैनीताल से रानीखेत के रास्ते में पड़ने वाली तहसील गरम पानी के नीचे की तरफ खैरना और बगल में मजेड़ा गांव कभी खेत वाले इलाके के रूप में जाने जाते थे. पिछले एक दशक में खेत कम और मकान ज्यादा हो गए. लोगों ने खेती छोड़ दी है और पर्यटकों की सुविधा के साधन तलाशने में ज्यादा रुचि लेने लगे हैं. शायद यही वजह है कि करीब एक करोड़ की आबादी वाले उत्तराखंड में पर्यटकों की संख्या सीजन में डेढ़ करोड़ तक पहुंच जाती है. एक दशक पहले बने इस राज्य की प्रति व्यक्ति वार्षिक आय 68 हजार रुपए है और साक्षरता 65 फीसदी से ज्यादा जो राष्ट्रीय औसत से पांच फीसदी ही कम है.

रानी खेत के तो नाम में ही खेत जुड़ा है पर अब यहां भी खेत कम ही रह गए. मजेड़ा के किसान नारायण सिंह कहते हैं कि अब पहाड़ पर लोग पैदल चलना ही नहीं चाहते. जहां कभी पैदल जाना दूभर था और खच्चर ही एकमात्र सहारा था वहां अब सड़कें बन गईं और गाड़ियां धड़ल्ले से आ जा रही हैं. नारायण बताते हैं कि अधिकांश सड़कें नहरों पर बनाईं गईं इससे सिंचाई के प्राकृतिक संसाधन खत्म हो गए. पहाड़ पर खेती के विनाश का बीज इन्हीं सड़कों से पड़ा. हल्द्धानी से नैनीताल के बीच जौलीकोट में भी चिपसोना ही बिक रहा है. यहां 20 वर्षों से सब्जी बेच रहे राम निहोर कहते हैं कि चिपसोना काफी दिनों तक चलता है क्योंकि इसका छिलका मोटा होता है. हमको इसमें फायदा है, पहाड़ी आलू नहीं बिका तो नुकसान झेलना पड़ता है.

सब्जी की आढ़त चलाने वाले लखनऊ के वकील अहमद इसका दूसरा पहलू बताते हैं कि हाइब्रिड आने के बाद पहाड़ी आलू उगाना बंद कर दिया गया. पहाड़ी आलू एक बीघा में 15-20 बोरे निकलता था जबकि हाइब्रिड से एक बीघा में 50 बोरे तक आलू पैदा होता है. बताते हैं कि सर्दियों में लखनऊ के आस पास के इलाकों में पहले पहाड़ी आलू खूब पैदा किया जाता था. उनके मुताबिक चिपसोना की पैदावार फर्रुखाबाद, कन्नौज, इटावा, भोगांव में बहुत होती है. ये सस्ता पड़ता है मीठा भी होता है. इसके बोरों पर कोल्ड स्टोरेज में एक गैस प्रवाहित की जाती है जिससे इसकी मिठास खत्म हो जाती है और इसे शुगर फ्री के नाम से भी बेचा जाता है.

साठा आलू भी जल्दी सड़ता है तो बहुत कम पैदा किया जाता है. जीफोर, चंद्रमुखी, ज्योति जैसे आलू की नस्लें भी खत्म हो गईं. अंदर से लाल निकलने वाला कटुई भी खत्म हो गया. बचा तो चिपसोना क्योंकि कोल्ड स्टोरेज में साल भर से ऊपर तक चल जाता है जबकि पहाड़ी पांच छह महीने ही चल पाता था. वकील बताते हैं कि आजकल इंदौर के आस पास उच्च श्रेणी का लॉकर आलू बहुत पैदा हो रहा है और फ्रांस, अमेरिका, ब्रिटेन की बड़ी एमएनसी चिप्स के लिए इसका निर्यात भी खूब कर रही हैं.(कहां से आया फ्राइड पोटैटो)

आलू बिरयानी

प्रेमचंद ने कफन में घीसू माधव का आलू भुन कर खाते दिखाकर गरीबों के लए इसकी अहमियत बताई लेकिन स्वाद के मुरीदों के लिए भी आलू कम जरूरी नहीं. स्वाद की बात करें तो कोलकाता में अभी भी आलू बिरयानी मिलती है. इसका चलन पड़ा 1857 के बाद जब लखनऊ के नवाब वाजिद अली शाह को अंग्रेज हुक्मरानों ने कोलकाता के मटिया बुर्ज जबरदस्ती भेज दिया था. चूंकि वाजिद बली शाह नवाब थे और अपनी शानो शौकत के लिए जाने जाते थे. बिरयानी के बिना खाना उनकी तौहीन थी तो जब बुरा वक्त आया तो गरीबी में उनके मुसाहिबों ने गोश्त की जगह आलू की बिरयानी पकवा कर उनके दस्तरख्वान पर पेश की. मटिया बुर्ज से आलू बिरयानी की रेसिपी निकल कर देश के कई स्थानों में फैल गई. समय के साथ आलू के नए प्रयोग तो बढ़ रहे हैं लेकिन किस्में गायब हो रही हैं.

रिपोर्ट: सुहेल वहीद, लखनऊ

संपादन: निखिल रंजन

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