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ब्लॉग

कसौटी पर भारतीय कूटनीति

लचर नीतियों की वजह से बीते कुछ सालों में लाचारी भारत सरकार की नियति बनती दिख रही है. बात घरेलू मोर्चे की हो या अंतरराष्ट्रीय मंच, भारत सरकार हर कहीं कमजोरी और असमंजस का परिचय दे रही है.

ताजा मामला इटली के दो नौसैनिकों के खिलाफ भारतीय मछुआरों की हत्या के मामले में कानूनी कार्रवाई से जुड़ा है. मामला दो साल से लटका है और भारत सरकार तय नहीं कर पाई है कि इटली के नौसैनिकों के खिलाफ क्या धारा लगे. इस मामले में सरकार के सामने दोहरा संकट है. एक तो राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय कानून के बीच टकराव के कारण सरकार को अदालत में फजीहत झेलनी पड़ रही है. दूसरे उसे कूटनीतिक मोर्चे पर अंतरराष्ट्रीय दबाव का भी सामना करना पड़ रहा है.

क्या है मामला

15 फरवरी 2012 को केरल के समुद्र तट पर दो भारतीय मछुआरों की हत्या का मामला सामने आया. घटना के चार दिन बाद केरल पुलिस ने दो इतालवी नौसैनिकों को गिरफ्तार कर जांच शुरू की. इटली सरकार का कहना है कि वारदात अंतरराष्ट्रीय जल क्षेत्र में हुई इसलिए मामले की जांच भारतीय कानून के बजाय अंतरराष्ट्रीय कानून के तहत हो. इतना ही नहीं इटली सरकार ने इसके लिए अपने स्तर पर समांतर जांच भी शुरू कर दी.

भारतीय कानून के तहत ही मामले की जांच कराने पर डटी भारत सरकार ने शुरुआती सख्ती दिखाते हुए दोनों इतालवी सैनिकों मेसिमिलियानो लातोरे और साल्वातोर गिरोने का प्रत्यर्पण करने से इनकार कर दिया. सरकार के इस रुख से लगा कि वह पुख्ता सबूतों के आधार पर काम कर रही है. लेकिन वह एक महीने भी अपने रुख पर कायम नहीं रह पाई. उसने अदालत में स्वीकार कर लिया कि वारदात भारतीय जल क्षेत्र के बजाय अंतरराष्ट्रीय इलाके में हुई.

इधर सुप्रीम कोर्ट ने जून 2013 में केरल पुलिस से जांच छीन कर केन्द्रीय एजेंसी से जांच का आदेश दिया. इस पर सरकार ने मामले की जांच राष्ट्रीय जांच एजेंसी को सौंप दी और अंतरराष्ट्रीय संधियों के तहत बने समुद्री नौवहन गैरकानूनी गतिविधि दमन कानून यानि सुआ एक्ट के तहत जांच कराने का फैसला किया. इटली ने सरकार के इस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देते हुए सुआ एक्ट के तहत जांच का विरोध किया.

इटली की दलीलें

इटली सरकार की पैरवी कर रहे वकील मुकुल रोहतगी की दलील है कि युद्धपोत और युद्धाभ्यास में शामिल नौकाओं जैसी गैरव्यावसायिक गतिविधियां सुआ एक्ट के दायरे से बाहर हैं. दूसरा इस कानून के तहत हत्या के किसी मामले में मौत की सजा का प्रावधान है. इसलिए विदेशी सैनिकों के खिलाफ इस एक्ट के तहत मामला चलाना संयुक्त राष्ट्र चार्टर का उल्लंघन होगा. जबकि भारत की दलील है कि सुआ एक्ट के तहत समुद्री नौवहन के दौरान हत्या या घायल करने जैसे मामलों की जांच की जा सकती है. भारत की मजबूत दलील यह भी है कि इटली की पहल पर ही मार्च 1988 में हुई बहुपक्षीय संधि के तहत बना सुआ एक्ट मार्च 1992 में वजूद में आया. भारत सहित 161 देश इस संधि पर हस्ताक्षर कर चुके हैं. ऐसे में इटली अपने ही सैनिकों के खिलाफ इसे लागू करने का विरोध नहीं कर सकता है.

हालांकि इस मामले में भारत की भी कुछ कमजोर नब्ज हैं. दरअसल भारतीय संसद ने वर्ष 2002 में सुआ एक्ट को लागू करने की मंजूरी दे दी थी. लेकिन केन्द्र सरकार की अधिसूचना के तहत अभी इसके कुछ प्रावधान लागू होने बाकी हैं. इसके तहत समुद्री सुरक्षा के लिए उत्पन्न खतरों से निपटने, किसी जहाज पर जबरन कब्जा करने, नौवहन के दौरान हत्या या घातक हमले और जहाज में मादक पदार्थों के रखने या इस्तेमाल रोकने संबंधी प्रावधान अभी लागू नहीं हुए हैं. इसके कारण सरकार को सुप्रीम कोर्ट में 24 फरवरी को इतालवी सैनिकों के खिलाफ सुआ एक्ट से छूट देनी पड़ी.

अब क्या होगा

फिलहाल इटली भारतीय सरकार पर दबाव बनाने में कामयाब रहा है. इसके लिए इटली ने यूरोपीय संघ और संयुक्त राष्ट्र को अपने पक्ष में दबाव बनाने के लिए कूटनीतिक पहल से गुरेज नहीं किया. जबकि भारत सरकार ने दक्षिण एशिया में बाहुबली देशों की लगातार बढ़ती सैन्य और असैन्य गतिविधियों के हवाले से पड़ोसी मुल्कों या दक्षेस जैसे संगठनों को इस तरह के खतरों से अवगत कराने की जहमत तक नहीं उठाई. सरकार फिलहाल राजनीति और कूटनीति के अखाड़े में काठियावाड़ी घोड़ों की तरह टापों से मिट्टी खोदती नजर आ रही है.

ब्लॉग: निर्मल यादव

संपादन: महेश झा

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