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दुनिया

कसाब को मौत की सज़ा

मुंबई की विशेष अदालत के जज एमएल तहलियानी की अदालत ने 2008 में शहर पर हुए आतंकी हमलों के एकमात्र ज़िंदा बचे हमलावर पाकिस्तानी नागरिक मोहम्मद अमीर कसाब को मौत की सज़ा सुनाई है.

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जज तहलियानी ने कसाब को चार विभिन्न आरोपों में मौत की सज़ा दी है. इन आरोपों में हत्या और भारत के ख़िलाफ़ युद्ध छेड़ने के अलावा हमले की साज़िश रचने तथा आतंकवाद संबंधी आरोप शामिल हैं. सज़ा की घोषणा करते हुए जज ने कहा, "उसे तबतक फांसी पर लटकाया जाए जब तक उसकी मौत नहीं हो जाती."

मुक़दमे के दौरान सरकारी वकील उज्जवल निकम ने 22 वर्षीय कसाब को किलिमंग मशीन और क्रूरता का अवतार बताया था. सोमवार को तहलियानी की अदालत ने कसाब को हत्या और भारत के ख़िलाफ़ युद्ध छेड़ने का दोषी पाया था. सज़ा को लेकर हुई बहस में सरकारी वकील उज्ज्वल निकम ने क्रूरतम अपराधों के लिए कसाब को मौत की सज़ा देने की मांग की थी.

बचाव पक्ष के वकील केपी पवार ने कसाब को मौत की सज़ा न देने की मांग करते हुए कहा था कि हमले के समय कसाब युवा था और वह उग्रपंथी संगठन लश्करे तैयबा के बहकावे में आ गया था. बचाव पक्ष का कहना है कि उसकी पूरी ज़िंदगी पड़ी है और वह अच्छा इंसान भी बन सकता है.

कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि मोहम्मद कसाब को फांसी की सज़ा सुनाए जाने के बाद उच्च अदालतों में अपील का लम्बा अंतहीन सिलसिला शुरू हो सकता है. भारत सरकार औपचारिक रूप से उन मामलों में मौत की सज़ा का समर्थन करती है जिसे सर्वोच्च न्यायालय ने दुर्लभ में दुर्लभतम बताया है. 2004 से मौत की किसी सज़ा को कार्यांवित नहीं किया गया है जबकि 1998 के बाद से सिर्फ़ दो लोगों को फांसी दी गई है.

26 नवंबर 2008 को शुरू हुए और तीन दिनों तक चले हमले के पहले ही दिन कसाब को गिरफ़्तार किया गया था. पकड़े जाने से पहले उसने अपने एक साथी के साथ सीएसटी स्टेशन पर अंधाधुंध फायरिंग कर 52 लोगों को मार डाला था. वहां से निकलने के बाद कसाब और उसके साथियों ने सड़क के आस पास घूम रहे लोगों की हत्या की, जिनमें मुंबई पुलिस की एंटी टेरेरिस्ट स्क्वॉड के प्रमुख अधिकारी भी शामिल थे.

कसाब को गोरेगांव के पास पुलिस नाकेबंदी में गिरफ़्तार किया गया. मौक़े पर हुई गोलीबारी में उसका साथी मारा गया जबकि वह गंभीर रूप से घायल हो गया था. हमले के दौरान विदेशी नागरिकों सहित 166 लोग मारे गए थे.

रिपोर्ट: एजेंसियां/महेश झा

संपादन: राम यादव

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