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ब्लॉग

कश्मीर में हालात बिगड़ने का खतरा

जम्मू कश्मीर में नई सरकार बनने के बाद पहला फिदायीन हमला हुआ है. आरोप लगाए जा रहे हैं कि सुरक्षा बल घुसपैठ के रास्तों को सील करने में विफल रहे हैं. प्रांत में असंतोष भड़कने का खतरा.

शुक्रवार की सुबह जम्मू के कठुआ जिले में एक पुलिस स्टेशन पर आतंकवादियों द्वारा किए गए फिदायीन हमले ने उस आशंकाओं को सही सिद्ध कर दिया है जिन्हें पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी और भारतीय जनता पार्टी की गठबंधन सरकार के सत्ता में आने के बाद से ही सुरक्षा विशेषज्ञ और राजनीतिक विश्लेषक व्यक्त कर रहे थे. पूर्व मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने कहा है कि पहले भी नियंत्रण रेखा के पार से आतंकवादी कठुआ में इसी रास्ते से ही घुसपैठ करते रहे हैं. वे रात में आए होंगे और जो पहला पुलिस स्टेशन उन्हें दिखायी दिया, उसी पर उन्होंने हमला बोल दिया. उमर अब्दुल्ला ने कहा कि इससे पता चलता है कि घुसपैठ के रास्तों को सील करने में सुरक्षा बल विफल रहे हैं.

पिछले साल हुए विधानसभा चुनाव के नतीजे सभी के लिए हैरतअंगेज थे. जहां जम्मू में हिंदुत्ववादी भारतीय जनता पार्टी ने 25 सीटें हासिल करके अपना वर्चस्व साबित कर दिया वहीं कश्मीर घाटी में पीडीपी ने 28 सीटें हासिल कीं. यानि ये दोनों पार्टियां राज्य के दो अलग-अलग क्षेत्रों का प्रतिनिधित्व करती हैं, पूरे राज्य का नहीं. दोनों की विचारधारा एक-दूसरे के बिलकुल विपरीत है. इसीलिए दोनों के बीच समझौता होने में काफी समय लग गया और दोनों ने सरकार चलाने के लिए एक एजेंडा तैयार किया. यह स्पष्ट है कि यदि इस सरकार को छह साल तक चलना है तो दोनों पार्टियों को ऐसा कोई कदम उठाने से बचना होगा जिससे सहयोगी पार्टी की बुनियादी विचारधारा को आघात पहुंचता हो. लेकिन ऐसा हो नहीं रहा.

दरअसल मुख्यमंत्री मुफ्ती मुहम्मद सईद और उनकी पार्टी को उग्रवादियों और अलगाववादियों के प्रति नर्म माना जाता है. सत्ता की बागडोर संभालते ही नए मुख्यमंत्री ने चुनावों के शांतिपूर्ण ढंग से सम्पन्न होने के लिए भारत के निर्वाचन आयोग या राज्य की जनता को धन्यवाद देने के बजाय पाकिस्तान, अलगाववादी हुर्रियत कॉन्फ्रेंस और उग्रवादियों को धन्यवाद दिया. इसके कुछ ही दिन के बाद राज्य सरकार ने तहरीक-ए-हुर्रियत नेता सैयद अली शाह गिलानी के निकट सहयोगी और कट्टर अलगाववादी मसर्रत आलम को रिहा कर दिया.

भारत के पूर्व राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार एम के नारायणन ने आशंका व्यक्त की है कि मसर्रत आलम की रिहाई के कारण कश्मीर घाटी में असंतोष की नयी लहर पैदा हो सकती है और भारतविरोधी तत्वों का मनोबल बढ़ा सकती है. आलम पर अनेक हिंसक आतंकवादी कार्रवाइयों में शामिल होने का आरोप है. लोग यह भी नहीं भूले हैं कि 1989 के बाद कश्मीर घाटी में एक दशक तक आतंकवादी हिंसा का दौर रहा था जिसके मूल में उन आतंकवादियों की रिहाई थी जिन्हें उस समय केन्द्रीय गृह मंत्री के पद पर आसीन मुफ्ती मुहम्मद सईद की बड़ी बेटी रुबैया सईद के अपहरण के बाद छोड़ा गया था.

कठुआ में पुलिस स्टेशन पर हुए आत्मघाती हमले के पीछे की इस राजनीतिक पृष्ठभूमि को नजरंदाज नहीं किया जा सकता. मुफ्ती मुहम्मद सईद के रुख को देखते हुए यदि पाकिस्तान-स्थित आतंकवादी संगठनों को यह लगने लगा है कि जम्मू-कश्मीर में सक्रिय होने और अपनी उपस्थिति जताने का यह सुनहरी मौका है, तो इसमें बहुत आश्चर्य नहीं होना चाहिए. विडंबना यही है कि 1980 के दशक के बाद जम्मू-कश्मीर में इस समय उग्रवाद और उग्रवादी हिंसा सबसे कम है. ऐसे में यदि राज्य सरकार और केंद्र सरकार परस्परविरोधी रवैया अपनाएंगे तो स्थिति सुधरने की उम्मीद नहीं की जा सकती. सुरक्षा बलों और पुलिस के पास प्रशिक्षण या साजो-सामान की कमी नहीं है. कमी है तो आवश्यक राजनीतिक इच्छाशक्ति की, जिसके अभाव में स्थिति बिगड़ ही सकती है.

केंद्र सरकार की जिम्मेदारी है कि वह पाकिस्तान के साथ संवाद स्थापित करके उसे इस बात पर राजी करने की कोशिश करे कि जम्मू-कश्मीर में हस्तक्षेप करते रहना उसके हित में नहीं है. उधर राज्य सरकार को जनता की समस्याओं को हल करने के लिए ऐसे कदम उठाने होंगे ताकि जनता के बीच शेष देश या केंद्र सरकार से अलगवाव की भावना न पनपने पाये. कोई भी ऐसा कदम जो राज्य में उग्रवाद को बढ़ावा दे, ऐसी स्थिति में घातक सिद्ध होगा. इस समय यह भी नहीं भूलना चाहिए कि पाकिस्तान में एक बार फिर सेना का पलड़ा भारी होता नजर आ रहा है. वहां का वर्तमान सैन्य नेतृत्व भारत और जम्मू-कश्मीर के प्रति क्या नीति अपनाता है, इसका भी राज्य के हालात पर गहरा असर पड़ेगा.

ब्लॉग: कुलदीप कुमार

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