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विज्ञान

कश्मीर में घटे कांगड़ी कैंसर

कश्मीर में कांगड़ी कैंसर के मामलों में अब कमी आ रही है. ऐसा लोगों में आई जागरुकता की वजह से हो रहा है. अब लोग समझने लगे हैं कि कांगड़ी की गर्मी उन्हें किस कदर बीमार बना सकती है. वे आधुनिक उपकरणों का इस्तेमाल कर रहे हैं.

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कश्मीर में ठंड से बचने के लिए कांगड़ी का खूब इस्तेमाल होता रहा है. यह असल में एक मिट्टी का बर्तन है जिसमें कोयला डाल लिया जाता है. उसके बाद लोग उसे अपने चोगे के अंदर रख लेते हैं. इससे जीरो से भी नीचे गए तापमान में उनके शरीर को गर्मी मिलती है.

यह तरीका पता नहीं कब से इस्तेमाल किया जा रहा है. लेकिन इसकी वजह से कैंसर के सैकड़ों मामले सामने आ चुके हैं. लेकिन अब लोगों में आई जागरुकता के चलते कैंसर के मामलों में कमी आई है. शेर ए कश्मीर इंस्टिट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज (स्किम्स) में रेडिएशन ओंकोलॉजी विभाग के अध्यक्ष डॉ. एम मकबूल लोन कहते हैं, "कांगड़ी कश्मीर घाटी के जीवन से जुड़ी चीज है. लेकिन यह त्वचा के कैंसर का बड़ा खतरा है. एक दशक पहले तक कैंसर के 50 फीसदी मामलों की वजह यही कांगड़ी थी. लेकिन अब इन मामलों में कमी आ रही है."

कांगड़ी कैंसर ज्यादातर जांघों, पेट के निचले हिस्से या उन शरीर के उन अंगों पर हमला करता है जो कांगड़ी की गर्मी के प्रभाव में रहते हैं. और अगर इसे वक्त पर न संभाला जाए तो यह शरीर के दूसरे हिस्सों तक भी फैल सकता है.

लेकिन डॉक्टरों का मानना है कि अब लोग कांगड़ी का इस्तेमाल कम कर रहे हैं. हालांकि गरीब घरों में अब भी यही इस्तेमाल होती है. लोन कहते हैं, "दूर दराज के इलाकों में रहने वाले गरीब लोगों को तो हम नहीं कह सकते कि कांगड़ी प्रयोग न करें क्योंकि वे इलेक्ट्रॉनिक उपकरण का खर्च नहीं उठा सकते. हम उन्हें इसका इस्तेमाल कम करने को ही कहते हैं."

इसके बावजूद कैंसर के मामले अब सैकड़ों से घटकर सालाना के हिसाब से 20-25 तक आ गए हैं. कांगड़ी के बिक्री में भी कमी आई है. बीते कुछ ही सालों में इसकी बिक्री 30 से 40 फीसदी तक घटी है.

रिपोर्टः एजेंसियां/वी कुमार

संपादनः उज्ज्वल भट्टाचार्य

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