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ब्लॉग

कश्मीर-भारत का एक 'सैन्य उपनिवेश'

उन पहाड़ों में एक नशा है. उन वादियों में एक कशिश है. पर आहिस्ता से कान लगाकर सुनिये तो घाटी के दिल से उठती कराह भी सुनाई पड़ती है.

फिरदौस ने कहा था कश्मीर धरती का स्वर्ग है (है तो आज भी), लेकिन अब ये स्वर्ग सहमा सहमा सा है. फौज के बूटों के तले इस जन्नत की आत्मा रो रही है. जम्मू से आगे चलने पर जैसे-जैसे कश्मीर घाटी नजदीक आती है बंदूकों का पहरा बढ़ता जाता है. हर 200 मीटर के बाद सेना या सीआरपीएफ के जवान मुस्तैदी से खड़े नजर आते हैं. कई बार तो ऊब होने लगती है -पता नहीं किन किन जगहों पर मिसाइल का पहरा है, कहां कहां बारूंदी सुरंगे हैं. उफ्फ ये भी कोई जन्नत है!

राजधानी श्रीनगर का चप्पा चप्पा सेना की निगाहों के नीचे सांस लेता है. शहर के बीचों बीच बंकर. सड़क के सामने, होटल की बॉलकनी पर, स्कूल की छतों पर, फ्लाईओवर के नीचे, पुल के ऊपर, हर जगह सेना. गांव के मुहाने पर, पोखर-तालाब के घाटों पर, सेव के बगीचों में, चिनार पेड़ों की ओट में, हर जगह चौकस हरी वर्दियां नजर आती हैं. जाने कब, कहां और किधर से आने वाली गोली आपका सीना भेद देगी- पता नहीं.

यहां लोग मौत को सिर पर रखकर जिंदगी की चाल चलते हैं.

लगता ही नहीं कि आप इसी मुल्क में है. फिर सरकार हमें ये क्यों समझाती है कि ये सब “मुल्क” की हिफाजत के लिए किया जा रहा है?  वो कौन सा देश है जिसे सेना और गुप्तचर एजेंसियां चलाती हैं. देश तो मन मिलने से बनता है. जब मन ही न मिले तो फिर देश कैसा?

राष्ट्रवाद, आतंकवाद, सेना और पाकिस्तान का ये खेल पिछले कई दशकों से खेला जा रहा है. इसके बीच में फंसकर मरने वाला वो आम कश्मीरी है जिसकी अधिकतम इच्छा ‘आजादी' और न्यूनतम इच्छा चैन से दो जून की रोटी खाना है.

लोग बताते हैं कि 1989 के बाद से तबाही इस खेल में करीब एक लाख लोग मारे जा चुके हैं. जाने कितने घर उजड़ गए, कितनी महिलाएं विधवा हो गईं, कितने बच्चे यतीम हो गए. इसका सही सही आंकड़ा किसी के पास नहीं है.

कुननपोशवारा में करीब 32 महिलाओं के साथ 2 दिन तक बलात्कार होता रहा. आरोप सेना के जवानों पर है. पर ‘देशभक्ति' के खेल में तो सब जायज है. उन 2370 कब्रों में किसकी लाशें दफ्न हैं - जिन्हें बाद में मानवाधिकार वालों ने खोलकर निकाला था, कोई नहीं जानता.

सेना, एसटीएफ, पुलिस के जवान कभी भी किसी को पूछताछ के लिए उठा सकते हैं. उनके पास एएफएसपीए (आर्मड फोर्सेस स्पेशल पॉवर ऐक्ट) का लाइसेंस है. ‘आतंकी की खोज' में किसी भी घर में कभी भी रात बिरात, सुबह शाम तलाशी ले सकते हैं. ‘देश की हिफाजत' के नाम पर कभी भी किसी की इज्जत के साथ खिलवाड़ कर सकते हैं. कभी भी किसी को पूछताछ के लिए रोका जा सकता है.

लोग सिर झुकाकर चलते हैं और बुदबुदाकर कहते हैं, “हम भी भारत का हिस्सा हैं.” इस अपमान, बेइज्जती और जिल्लत भरी जिंदगी का हिसाब किसी दस्तावेज में दर्ज नहीं है. कोई आंकड़ा नहीं है जो इस दमन और बर्बरता को बयान कर सके.

हम दिल्ली में बैठकर मुट्टियां भींचते हैं. हमारा खून खौलता है. हम कहते हैं, “खीर मांगोगे दूध देंगे, कश्मीर मांगोगे चीर देंगे.” हम किसको चीर रहे हैं?  काश कि हम देख पाते कि इस उम्माद ने हमें कितना जख्म जख्म कर दिया है.

नतीजा...

सरकार का रक्षा बजट हर साल बढ़ रहा है. और तोपें खरीदी जा रही हैं. साल दर साल लड़ाकू विमानों की खेप बढ़ाई जा रही है. परमाणु हथियारों का जखीरा बढ़ता जा रहा है. और ये सब हो रहा है कश्मीर में शांति के लिए. देश की सुरक्षा के लिए. देश वासियों की हिफाजत के लिए.

हमें नहीं चाहिए ऐसी सुरक्षा. हमें तो बस हमारी नदी में पानी चाहिए. बगीचों में आम चाहिए. खेतों में फसल चाहिए. और चाहिए उस बच्ची के होठों पर एक अदद प्यारी सी मुस्कान जो अपनी मां के साथ डल झील पर चप्पू चला रही थी. हमें चाहिए हमारी संप्रभुता. हमें उन सभी अस्मिताओं की आजादी चाहिए जो ‘भारत भाग्य विधाता' के अहसानों के तले दबे कुचले हैं.

ब्लॉगः विश्वदीपक

(यह लेखक के निजी विचार हैं. डॉयचे वेले इनकी जिम्मेदारी नहीं लेता.)

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