कश्मीरी औरतों की चोटी कौन काट रहा है? | दुनिया | DW | 24.10.2017
  1. Inhalt
  2. Navigation
  3. Weitere Inhalte
  4. Metanavigation
  5. Suche
  6. Choose from 30 Languages

दुनिया

कश्मीरी औरतों की चोटी कौन काट रहा है?

हाथों में चाकू, क्रिकेट का बैट और लोहे की छड़ लेकर सैकड़ों लोग कश्मीर की गलियो में घूम रहे हैं. ये लोग उन नकाबपोशों की खोज में हैं जो औरतों की चोटी काट कर भाग जाते हैं.

पिछले एक महीने में 100 से ज्यादा ऐसे पुलिस केस दर्ज हुए हैं जिनमें महिलाओं ने आरोप लगाया कि नकाबपोश हमलावर उनकी चोटी काट कर ले गये. ये घटनाएं आमतौर तब हुईं जब महिलाएं अपने घर में ही थीं. शुरूआत में तो पुलिस ने इसे महिलाओं का वहम बताया लेकिन जब महिला आयोग ने इसकी शिकायत की तो मामले दर्ज होने शुरू हुए.

राज्य की मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती ने भी इस बारे में हाल ही में ट्वीट किया कि चोटी काटना, राज्य की महिलाओं की गरिमा को नुकसान पहुंचाने और उनमें भय कायम करने की कोशिश है." इतने पर भी पुलिस अभी तक किसी संदिग्ध या सुराग तक नहीं पहुंच पायी है. पुलिस तो यह भी नहीं समझ सकी है कि इस तरह के हमलों का मकसद क्या है.

40 साल की तसलीमा बिलाल की चोटी भी पिछले हफ्ते तब काट ली गयी जब वो श्रीनगर में अपने घर में थीं. उनका कहना है कि उन्होंने हमलावर का नकाब उतारने की कोशिश की लेकिन "वह बहुत ताकतवर था किसी कमांडों के जैसा. उसने तो जैसे मेरा गला ही काट दिया". हमलावर भागने से पहले उनके बाल भी वहीं छोड गया. इससे कुछ दिन पहले ही बिलाल की 16 साल की भतीजी पर भी किसी ने ईंट से हमला किया. बाद में जब वह अस्पताल में होश में आयी तो उसके बाल भी गायब थे. एक दूसरी महिला को एक केमिकल स्प्रे के जरिये बेहोश कर दिया गया. अधिकारी अब तक यह भी पता नहीं लगा पाये हैं कि वह रसायन क्या था.

महिलाओँ की चोटी काटने वाले इन रहस्यमयी चोरों ने सुरक्षाबलों की भारी मौजूदगी वाले इस इलाके में डर और खलबली मचा दी है. यहां अलगाववादी आतंकवादियों और भारतीय सैनिकों की आये दिन होने वाली मुठभेड़ से वैसे ही डर बना रहता है. इसमें एक और मामला जुड़ गया है. हालांकि इस तरह की घटनाएं भारत के दूसरे इलाकों में भी सामने आयी हैं. इनमें हरियाणा और उत्तर प्रदेश भी शामिल हैं लेकिन इनसे जो डर का माहौल कश्मीर में बना वैसा और कहीं नहीं है. कश्मीर की मुस्लिम औरतें आमतौर पर अपने लंबे बालों को भी स्कार्फ से ढंक कर रखती हैं.

उधर अलगाववादी नेता पुलिस की शुरुआती प्रतिक्रिया पर काफी नाराज हुए. उनका कहना है कि ये हमले "भारतीय एजेंसियों की कारस्तानी" जो कश्मीर की विद्रोही जनता को कमजोर करना चाहती है. आमलोगों में से भी कुछ लोग भारत के सुरक्षा बलों पर उंगली उठा रहे हैं. उनका कहना है कि या तो सुरक्षा बल खुद ही ये हमले करवा रहे हैं या फिर हमला करने वालों को बचा रहे हैं. तसलीमा बिलाल ने कहा, "हम जानना चाहते हैं कि दोषी कौन है, पुलिस, सेना या फिर आम लोग?"

पुलिस महानिदेशक मुनीर अहमद खान का कहना है कि यह आरोप बेतुका है कि प्रशासन इसमें शामिल है. पुलिस ने इसके बारे में जानकारी देने वाले के लिए तीन लाख रुपये के इनाम का भी एलान किया है. मुनीर खान ने कहा, "किसने किया, से पहले इस तरह की हरकत के पीछे के मकसद को जानना जरूरी है. अगर मकसद का पता चल गया तो इस तरह के मामलों को हल करना आसान हो जाएगा."

इस तरह की घटनाएं कश्मीर में पहली बार नहीं हो रही हैं. 1990 के दशक में जब भारत विरोधी प्रदर्शन तेज हुए थे तो भूत प्रेतों की कहानियां अचानक उभरने लगीं. बाद में बहुत से लोगों ने भारतीय सुरक्षा बलों पर भूत के वेश में घूमने और हमले करने का आरोप लगाया, ताकि लोगों को डराया जा सके.

चोटी काटने की घटना सबसे पहले जुलाई में उत्तर भारत के कई इलाकों में सामने आयी. अधिकारियों ने मनोचिकित्सकों को भी जांच में शामिल किया ताकि ये पता चल सके कि कहीं पीड़ित महिलाएं किसी मानसिक रोग की तो शिकार नहीं. कश्मीर में हमले शुरू होने के बाद यह संदेह और पक्का हुआ क्योंकि यहां क्षेत्रीय संघर्ष के कारण महिलाओं में मानसिक समस्याएं होने की ज्यादा आशंका रहती है. 1989 से पहले कश्मीर में मानसिक रोगियों की तादाद साल में 1700 के आसपास रहती थी लेकिन आंदोलन तेज होने के बाद यह संख्या बढ़ कर एक लाख सालाना तक पहुंच गयी. इस मामले में डॉक्टरों ने इस बात से तो इनकार किया है कि यह सिर्फ वहम है लेकिन वैज्ञानिक तौर पर इसकी पुष्टि होनी अभी बाकी है. श्रीनगर के सरकारी मेडिकल कॉलेज में मनोचिकित्सा विभाग के प्रमुख डॉ मोहम्मद मकबूल कहते हैं, "इस तरह की घटनाएं यहां पहले से ही मौजूद मानसिक रोगों को और ज्यादा जटिल बना देंगी." मानसिक रोगों को एक और विशेषज्ञ ने कहा कि यह मानने में बहुत दिक्कत नहीं है कि महिलाओं के शरीर को निशाना बनाया जा रहा है.

रहस्य अभी कायम है और ऐसे में कश्मीरी लोग घर से बाहर निकलने में डर रह हैं खासतौर से शाम होने के बाद और इसका असर स्थानीय कारोबार पर पड़ा है. संदेह के आधार पर ही कई बेकसूर लोगों की पिटाई भी हो गयी. 70 साल के एक आदमी की तो इसी तरह की पिटाई में मौत भी हो गयी. कई सैनिकों और पुलिसकर्मियों को भी शहर में घूम रहे स्थानीय पहरेदारों से बदसलूकी का सामना करना पड़ा है. पुलिस ने अब तक करीब दो दर्जन लोगों को अफवाह फैलाने के आरोप में गिरफ्तार भी किया है.

एनआर/एके (रॉयटर्स)

DW.COM

संबंधित सामग्री