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विज्ञान

कलम भगाए डर का भूत

कहा जाता है कि चिंता चिता समान होती है. हमेशा से यह भी सुनते आए हैं कि बांटने से दुख या तनाव हल्का हो जाता है. शायद डायरी लिखने की आदत के पीछे उद्देश्य यह भी होता है. विज्ञान भी इसकी पुष्टि कर रहा है.

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अमेरिका में यूनिवर्सिटी ऑफ शिकागो के एक अध्ययन से कलम से सहारे तनाव कम करने की बात एक हद तक साबित होती लग रही है. स्कूल और कॉलेज के छात्रों पर किए गए एक परीक्षण में यह पाया गया है कि परीक्षा शुरू होने से ठीक पहले अगर छात्र परीक्षा के बारे में अपनी चिंता और डर की बात काग़ज़ पर या कंप्यूटर के पर्दे पर उतार दें, तो वे परीक्षा में अधिक खरे उतर सकते हैं, अपनी योग्यता का बेहतर प्रदर्शन कर सकते हैं.

अध्ययन की वरिष्ठ लेखिका एसोसिएट प्रोफेसर सियान बायलॉक का कहना है कि हालांकि लोग अक्सर अपनी क्षमता का अधिक से अधिक अच्छा प्रदर्शन करने के लिए प्रेरित होते हैं, हो सकता है कि किसी महत्वपूर्ण टेस्ट, दफ़्तर में होने वाली किसी व्यावसायिक बैठक या फिर किसी खेल के मैच जैसे तनाव वाली हालात में घबराहट की चपेट में आकर लोग अपनी योग्यता की तुलना में कम सफल हों.

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मन की बात लिखना दिमाग की क्षमता बढ़ता है

ऐसा क्या था, जिसने इन अध्ययनकर्ताओं को छात्रों पर यह परीक्षण करने की प्रेरणा दी ?

बायलॉक बताती हैं, "चिकित्सा मनोविज्ञान में ऐसे परीक्षण किए जा चुके हैं, जिनसे प्रदर्शित होता है कि अवसाद यानी डिप्रैशन के रोगी को अगर डायरी लिखने पर प्रेरित किया जाए या उससे अपने जीवन के भावनात्मक या गहरे आघात वाले अनुभवों के बारे में लिखवाया जाए, तो इससे चिंता करने या सोचते रहने की उनकी आदत कम की जा सकती है. और हमारी प्रयोगशाला में काफ़ी ऐसा काम किया गया है, जिससे यह तथ्य सामने आता है कि परीक्षा या टेस्ट से पहले छात्र अक्सर उसे लेकर चिंता में घिर जाते हैं. ऐसी स्थिति में वे परीक्षा के लिए ज़रूरी जानकारी पर एकाग्र होने की या उसे याद करने की क्षमता गंवा सकते हैं. तो हमने सोचा कि अगर छात्र परीक्षा देने से पहले उसके बारे में अपने विचार और भावनाएं लिखें, तो शायद उससे उन्हें उनमें से कुछ चिंताओं से निपटने का तरीक़ा हासिल हो जाए. यानी वास्तव में परीक्षा देते समय उनके तनावग्रस्त होने की आशंका कम हो जाए."

मन की लिखें, कमाएं नंबर

प्रोफेसर बायलॉक ने पाया कि परीक्षा के बारे में परेशानहाल छात्रों को जब अपने डर को लेकर लिखने के लिए दस मिनट का समय दिया गया, तो उनके टेस्ट के नंबरों में अच्छी खासी बढ़ोतरी हुई. लिखने से छात्रों को परीक्षा से पहले अपना डर उतार फेंकने का अवसर मिला. नतीजे में उनकी मस्तिष्क की क्षमता खुलकर सामने आई और ये छात्र टेस्ट सफलता के साथ पूरा कर सके.

सियान बायलॉक कहती हैं, "यह प्रदर्शित होता है कि जब छात्रों ने टेस्ट के संबंध में अपनी भावनाओं के बारे में नहीं लिखा, या फिर इतनी मामूली घटना के बारे में भी कि वे एक दिन पहले क्या कर रहे थे, तो तनाव से उनकी सांस रुकने लगी. कुल मिलाकर तनाव की अपनी सोच के कारण उनका प्रदर्शन बिगड़ गया. कोई 10 से 15 प्रतिशत तक, जो काफ़ी ठोस मात्रा है. लेकिन जिन छात्रों को तनाव के इस परीक्षण में खुलकर अपने मन की बात लिखने का अवसर दिया गया, हमने पाया कि वे घबराए नहीं, बल्कि दरअसल, वे परीक्षा में अपनी योग्यता का कुछ बेहतर प्रदर्शन कर पाए."

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धीरे धीरे खुल रहे हैं दिमाग के रहस्य

क्या मन की बात लिखने से मतलब यह हुआ कि इन छात्रों को केवल अपने डर या चिंता के ही बारे में नहीं, बल्कि कुछ भी यानी कुल सोच के संबंध में लिखने को प्रेरित किया गया?

सियान बायलॉक ने बताया, "हमने छात्रों से, आने वाले टेस्ट के बारे में अपने विचारों और भावनाओं के संबंध में लिखने को कहा. छात्रों की प्रवृत्ति परीक्षा के बारे में अपनी चिंताओं के बारे में लिखने की थी. लेकिन लिखते हुए उनकी प्रवृत्ति स्थिति का फिर से मूल्यांकन करने की भी थी, नए सिरे से यह सोचने की कि वे टेस्ट कैसे अंजाम देंगे. उनके सोचने ने शायद बेहतर प्रदर्शन करने की उनकी क्षमता पर नई रोशनी डाली. और हमने यह प्रदर्शित किया कि चिंताओं के साथ-साथ स्थिति के नए सिरे से मूल्यांकन से इन छात्रों को ऐसे समय अपनी भरपूर योग्यता दिखाने का अवसर मिला, जब उन्हें उसकी सबसे अधिक ज़रूरत थी."

अध्ययनकर्ताओं ने अपने परीक्षण छात्रों के दो समुदायों पर किया, कॉलेज के कुछ विद्यार्थियों पर अपनी प्रयोगशाला में और हाई स्कूल के छात्रों पर उनकी कक्षा के कमरे में. टेस्ट के बारे में पहले छात्रों की चिंता को आंका गया और फिर कुछ छात्रों से पेशकश की गई कि वे अपनी आशंकाओं को लिखकर व्यक्त करें.

चिंता और कार्यक्षमता के बीच तगड़ी होड़

इन अध्ययनकर्ताओं का विचार है कि मस्तिष्क की कार्यशील या शार्ट टर्म मेमोरी यानी अल्पकालिक स्मृति प्रक्रिया में डर या चिंता और कार्यक्षमता के बीच बाक़ायदा मुक़ाबला होता है यानी चिंता कार्यक्षमता की जगह घेर सकती है.

बायलॉक का सोचना है कि उनका यह अध्ययन योग्यता या क्षमता के सभी प्रकार प्रदर्शन के अवसरों पर लागू होता है. चाहे चिंता कोई भाषण देने के संबंध में हो, खेल के मुक़ाबले के बारे में या फिर नौकरी के इंटरव्यू को लेकर हो.

यानी ऐसी किसी भी स्थिति में अगर घबराहट घेर ले, तो यह सोचना बहुत महत्वपूर्ण है कि यही घबराहट हमारी सफलता के रास्ते में रोड़े अटका रही है. अब जब यह बात हमारी समझ में आ जाए, तो भला घबराहट जैसे दुश्मन को हम अपने पर हावी क्यों होने दिया जाए.

रिपोर्ट: गुलशन मधुर, वॉशिंगटन

संपादन: ओ सिंह

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