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दुनिया

कलंक और अन्याय की 20वीं बरसी

अयोध्या में बाबरी मस्जिद का विध्वंस भारतीय इतिहास पर एक कलंक है. कट्टरपंथियों ने मिट्टी पत्थर की बनी मस्जिद पर जितने वार किये वो सब भारत की धर्मनिरपेक्ष, सहनशील और सहिष्णु भावना पर लगे.

छह दिसंबर, 1992 में हिंदू कट्टरपंथियों ने अयोध्या में बाबरी मस्जिद गिरा दी. इसके बाद पूरे देश में दंगे भड़के. भारत के लिए यह बहुत ही मुश्किल, कठिन और डरावना वक्त रहा. मस्जिद गिराए जाने के बाद देश भर में हिंदू मुस्लिम दंगे हुए और 2,000 से ज्यादा लोग मारे गए. मृतकों में ज्यादातर मुसलमान थे.

1947 में भारत पाकिस्तान विभाजन के वक्त महात्मा गांधी और जवाहरलाल नेहरू जैसी महान हस्तियों ने जिस सर्व धर्म संस्कार के लिए जान झोंक दी, उसे पांच दशक बाद अयोध्या ने मटियामेट कर दिया. 50 हजार आबादी वाला छोटा सा शहर अयोध्या कट्टरपंथ और नफरत का केंद्र बन गया. हृदय के भीतर इंसानियत के मंदिर को कुचल कर, सभी मर्यादाओं को रौंद कर कट्टरपंथी हिंदू यहां मर्यादा पुरुषोत्तम का मंदिर बनाना चाहते थे. इतिहास गवाह है कि अब अयोध्या में एक घृणा का म्यूजियम खड़ा है.

हालांकि समाज विज्ञानी पुष्पेश पंत नहीं मानते कि इससे भारत की धर्मनिरपेक्ष देश की छवि पर असर पड़ा है. वह कहते हैं, "जो इस हादसे से भंग हुआ, वह यह कल्पना है कि भारत में कानून का राज है." पंत आलोचना करते हैं कि हिंसा भड़काने के बाद किसी भी राजनीतिक पार्टी ने बहुत सख्ती से काबू करने के लिए कुछ नहीं किया.

Indien Lal Krishna Advani

आडवाणी अब अफसोस जताते हैं लेकिन जिम्मेदारी नहीं लेते.

बीजेपी नेता लालकृष्ण आडवाणी ने बाबरी मस्जिद को गिराने का माहौल रथ यात्रा से तैयार किया. बीजेपी को राम मंदिर मुद्दे का फायदा कुछ समय के लिए मिला. वो लोगों के धार्मिक जज्बात से खेली लेकिन अब वह राम का नाम लेने में घबराती है.

वरिष्ठ पत्रकार दिबांग अयोध्या मामले को भारत के लिए एक सीख मानते हैं, "बहुत दिलचस्प है, अगर हम राजनीतिक रुझानों को देखते हैं तो अब यह बहुत जहीन हो गया है. इस उकसाने वाली कार्रवाई के साथ आप कम समय के लिए सफल रह सकते हैं. आज जब भारत में ज्यादातर आबादी जवान है, इस तरह से चुनाव नहीं जीते जा सकते हैं."

अयोध्या हिंदुओं के लिए पवित्र स्थान है. उनकी मान्यताओं के मुताबिक वहां राम का जन्म हुआ. मंदिर की मांग करने वाले का तर्क है कि 16वीं सदी में वहां राम मंदिर तोड़कर मस्जिद बनाई गई. पुरातत्वशास्त्री हों, धर्मशास्त्री हों या इतिहासकार, वे सभी दशकों से उभरे इस सवाल को सुलझाने की कोशिश में आज भी जुटे हैं. लेकिन सही उत्तर अब तक नहीं मिला है. फिलहाल यह इलाका सुरक्षित जगह घोषित है.

सितंबर 2010 में इलाहाबाद हाई कोर्ट ने अयोध्या विवाद पर ऐतिहासिक फैसला सुनाया. अदालत ने विवादित जमीन को तीन हिस्सों में बांटा दिया. एक हिस्सा हिंदुओं को, दूसरा मुसलमानों को तीसरा एक हिंदू के ट्रस्ट को दे दिया. लेकिन फैसला सबको संतुष्ट न कर सका. सुप्रीम कोर्ट ने इस पर रोक लगा दी. तब से सर्वोच्च न्यायालय में इसकी सुनवाई चल रही है. दिबांग मानते हैं कि इस पूरे विवाद का एक अंतिम समाधान खोजना किसी के फायदे में नहीं है. भारत में जिस तरह से न्याय मिलता है, वह बहुत धीरज का काम है. देश की अलग अलग अदालतों में 30,000 मामले दर्ज हैं. दिबांग कहते हैं, "इस मामले में शामिल सभी लोगों के लिए असहजता की स्थिति है. यह एक बहुत ही मुश्किल केस है. इसलिए नेता कह देते हैं कि एक अदालत इसका हल खोजें और हम फैसला मान लेंगे. लेकिन मेरे ख्याल से यह बहाना है क्योंकि वे फैसला लेने से डरते हैं."

पुष्पेश पंत का मानना है कि अयोध्या के जख्म भर गए हैं, "एक निशान हमेशा रहता है. लेकिन इसके असर से हम उबर चुके हैं. भारत और भारतीय अयोध्या से आगे बढ़ चुके हैं."

रिपोर्ट: प्रिया एसेलबॉर्न

संपादन: ओंकार सिंह जनौटी

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