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मनोरंजन

कर्मचारियों की मांगों ने किया परेशान

कहीं लोग नौकरियों को तरस रहे हैं, तो कहीं कंपनियों को ही लोग नहीं मिल रहे हैं. जर्मनी उन देशों में से है जहां कुशल कामगारों की भारी कमी है. इससे निपटने के लिए कंपनियां नई तरकीबें निकाल रही हैं, जो बेहद महंगी पड़ रही हैं.

जर्मनी में इंजीनियर और आईटी से जुड़े लोगों की काफी कमी है. यही वजह है कि विदेशियों को यहां काम करने के लिए बुलाया जाता है. खास कर छोटी कंपनियों में कुशल कामगारों की भारी कमी है. जानकारों का मानना है कि आने वाले समय में हालात और भी खराब होंगे. जर्मनी की एसोसिएशन ऑफ चेम्बर्स ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्री के अध्यक्ष एरिक श्वाइत्सर का कहना है कि कंपनियों को लोगों को आकर्षित करने के लिए नई नीतियां तैयार करनी होंगी.

परिवार है जरूरी

श्वाइत्सर बताते हैं कि अब तक लोगों के लिए सबसे बड़ा मुद्दा आय का था. अगर कंपनी अच्छी तनख्वाह दे, तो लोग वहां काम करने को तैयार हो जाते थे. पर इस बीच लोगों का रुझान परिवार की ओर बढ़ा है. वे काम और परिवार के बीच एक संतुलन चाहते हैं और ऐसी ही कंपनियों की ओर खिंचते हैं जो इसे सुनिश्चित करती हैं. इसलिए जरूरी है कि कंपनियां काम करने के समय को ले कर लचीली हों. अगर लोग अपने हिसाब से काम का वक्त तय कर सकें, या फिर घर बैठे ही दफ्तर का काम निपटा सकें, तो वे ऐसी नौकरी में ज्यादा रुचि लेते हैं.

इसके अलावा बच्चों की देखभाल भी एक बड़ा मुद्दा है. हर कंपनी के लिए यह तो मुमकिन नहीं कि वे दफ्तर में ही अपने कर्मचारियों के बच्चों के लिए क्रेश खोल दें. लेकिन कम से कम वे उसका खर्च उठा सकती हैं, या आसपास के क्रेश से संपर्क कर वहां अपने कर्मचारियों के लिए सीटें पक्की कर सकती हैं. कुछ दफ्तरों में खास कमरे भी बनाए जाते हैं जहां माता पिता बच्चों के साथ रह कर भी काम कर सकते हैं. यहां सिर्फ मेज और कंप्यूटर ही नहीं होता, बल्कि बच्चों के खेलने की जगह भी बनी होती है. यहां ऐसे खिलौने भी हैं जिनसे बच्चे मसरूफ रहे और माता पिता को काम करते वक्त परेशान न करें.

काम के साथ सेहत भी

एक और चीज जो कर्मचारियों का ध्यान खींचती है, वह है काम की जगह पर मनोरंजन के साधन. कई घंटों तक लगातार काम करना काफी तनावपूर्ण होता है. ऐसे में अगर काम के बीच ब्रेक लेने के अच्छे मौके हों तो काम करने की क्षमता बढ़ती है. खास कर अगर दफ्तर में जिम हो या फिर बैडमिंटन और टेबल टेनिस खेलने की संभावना हो, तो लोगों को ऐसे दफ्तर पसंद आते हैं. ऐसे में काम के साथ साथ सेहत का भी ध्यान रखा जा सकता है.

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ब्लू कार्ड के फायदे

साथ ही अलग अलग तरह की ट्रेनिंग भी काम का हिस्सा हों, तो काम को लेकर दिलचस्पी बनी रहती है. और ट्रेनिंग विदेश में हो, तो सोने पर सुहागा. जर्मनी में कई कंपनियों ने इस तरह की तरकीब को अपनाना शुरू कर दिया है. जाहिर है कि कर्मचारियों को इतनी सुविधाएं देना महंगा पड़ता है. लेकिन कंपनियों के लिए यह मजबूरी बन गई है. उनके पास अब दो ही विकल्प बचे हैं, या तो इन सुविधाओं का खर्च उठाएं, या फिर कर्मचारियों के अभाव में कंपनी बंद होने की कगार पर पहुंच जाएं.

हाल ही में हुए एक सर्वे के अनुसार 38 फीसदी कंपनियों ने इस बात को माना है कि उन्हें डर है कि वे दीवालिया हो जाएंगी. 2010 में यह संख्या 16 प्रतिशत थी. 2025 तक जर्मनी में साठ लाख कुशल कामगारों की किल्लत होगी. ऐसे में कंपनियों को विदेशियों को रिझाने के लिए नए नए विकल्प खोजने होंगे.

आईबी/एमजी (डीपीए)

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