1. Inhalt
  2. Navigation
  3. Weitere Inhalte
  4. Metanavigation
  5. Suche
  6. Choose from 30 Languages

मनोरंजन

करियर नहीं संगीत से शिकायत

किशोर कुमार के पुत्र अमित कुमार को प्रतिभा होने के बावजूद हिंदी फिल्मों वह जगह नहीं मिली जिसके वह हकदार थे लेकिन उन्हें इसका कोई अफसोस नहीं हां आज कल के गीतों और संगीत से जरूर शिकायत है.

मौजूदा दौर में हाल यह है कि सुपर हिट होने वाला कोई गाना अगले दिन ही गुमनामी के अंधेरे में खो जाता है. अमित याद दिलाते हैं कि उनके पिता के दौर के गीत लोग अब भी गुनगुनाते हैं. अमित अब खुद को गीतकार से ज्यादा संगीतकार मानते हैं. किशोर कुमार की जयंती के मौके पर कोलकाता आए अमित ने अपने करियर, बचपन की यादों और हिंदी फिल्मों में गीतों की हालत पर डीडब्ल्यू के सवालों के जवाब दिए.

डीडब्ल्यूः आपका बचपन कैसे गुजरा?

किशोर कुमारः बचपन के पहले सात साल तक तो सबकुछ ठीक-ठाक था. मेरे पिता काफी व्यस्त थे. मां रूमा गांगुली भी गायिका था लेकिन सात की उम्र में माता-पिता में तलाक होने की वजह से मैं मां के साथ मुंबई से कोलकाता आ गया. वैसे, उन दोनों में भले ही मतभेद थे, वह मुझे इसका अहसास नहीं होने देते थे. पिता मुझसे मिलने यहां आ जाते या मैं मुंबई चला जाता था. तीसरी कक्षा में उन्होंने मुझे हजारीबाग के एक बोर्डिंग स्कूल में दाखिल कर दिया लेकिन साल भर बाद ही दादी के जोर देने पर मुझे वहां से फिर घर बुला लिया गया.

आपने गाने की शुरूआत कैसे की?

मैंने पहली बार जब फिल्म दूर का राही के लिए मैं एक पंछी मतवाला गीत जब गाया था तब मेरी उम्र महज 13 साल थी. मुझे गाना पसंद नहीं था.पिता जी के कहने पर उसे गाया था. उन्होंने ही वह गाना लिखा और उसकी धुन तैयार की थी. जिस दिन उस गीत की रिकार्डिंग हुई, मुझे तेज बुखार था.

तो गायकी को करियर बनाने का फैसला कैसे किया ?

वर्ष 1968-69 के दौरान मैं अपने पिता के साथ उनके कई लाइव शोज में गया था. उनकी लोकप्रियता देख कर मैं दंग रह गया. उसके बाद कोलकाता में कुछ दोस्तों के साथ मिल कर मैंने भी लाइव शोज करना शुरू किया. उनमें मैं अपने पिता के गीत ही गाता था. मेरी मां इसके सख्त खिलाफ थी. लेकिन पिता ने मुझे पूरा समर्थन दिया और मुंबई में पिता-पुत्र का एक साझा शो भी आयोजित कराया. पिता की वजह से ही मैंने गायन को करियर बनाने का फैसला किया तो ज्यादा सही होगा. हजारीबाग के उस बोर्डिंग स्कूल में रहा होता तो गायक की जगह शायद डाक्टर या इंजीनियर बन गया होता.

प्रतिभा होने के बावजूद आपको हिंदी फिल्मोद्योग ने कभी वह जगह नहीं दी. क्या आपको इसका अफसोस है?

मुझे इसका कोई अफसोस नहीं है. बॉलीवुड के प्रति मेरे मन में कोई नफरत भी नहीं है. उससे मेरा मोहभंग हो गया. वहां भारी राजनीति है. मैंने खुद ही इस चूहा दौड़ से बाहर रहने का फैसला किया. मेरे पिता कहा करते थे कि यहां अपना वजूद बनाए रखने के लिए तुमको चेहरे पर एक मास्क पहनना होगा लेकिन मैंने वैसा नहीं किया. मुझे अब इस बात का कोई शिकवा नहीं है. मैं अपने शोज से खुश हूं.

क्या पिता की छाया से नहीं निकल पाना ही आपके करियर की राह में सबसे बड़ा रोड़ा साबित हुआ?

नहीं, ऐसा नहीं है. शुरूआती दौर में मैं जहां भी जाता लोग मुझसे अपने पिता के गीतों को गाने का अनुरोध करते थे. इस तरह हर जगह मैं उन गीतों को गाने लगा. लोगों को लगता था कि मैं उन गानों को सबसे बेहतर गा सकता हूं. अब भी उन गीतों को सुन कर लोग उस स्वर्णिम दौर में लौट जाते हैं.

आप किशोर कुमार के उस दौर के गवाह रहे हैं. कैसा था वह दौर ?

वह दौर गजब का था. सचिव देव बर्मन और उसके बाद पंचम दा यानी राहुल देव बर्मन के साथ मेरे पिता की ऐसे ट्यूनिंग थी कि वह लोग फिल्म देखते-देखते भी गानों की धुन और बोल तैयार कर लेते थे. उस दौर में इन लोगों ने ऐसे कई हिट गीत दिए जो अब भी लोगों के सिर चढ़ कर बोल रहे हैं. किशोर कुमार का जादू अब भी बरकरार है.

फिल्म उद्योग में संघर्ष करने वाले कलाकारों की हालत में क्या सुधार आया है. आपका अनुभव कैसा है ?

यहां संघर्ष करने वाले कलाकारों की स्थिति में कोई सुधार नहीं आया है. उनसे बेहद खराब व्यवहार किया जाता है. उनको बार-बार अपमानित किया जाता है. मुझे यह देख कर बहुत बुरा लगता है. आखिर अपनी प्रतिभा के बल पर काम मांगने वाले कलाकार अपनी आत्मा तो नहीं बेचते. उनके साथ ऐसा सलूक नहीं होना चाहिए. लेकिन पहले भी ऐसा था और अब भी यही स्थिति है.

आप अब गाने के अलावा धुनें भी तैयार करने लगे हैं. आगे क्या योजना है ?

सच कहूं तो मैं खुद को गायक से ज्यादा संगीतकार मानता हूं. मुझे धुनें बनाना पसंद है. आगे अगर मौका मिला तो किसी फिल्म में संगीत का निर्देशन करने की इच्छा है.

बालीवुड में संगीत की मौजूदा दशा-दिशा पर आप क्या सोचते हैं ?

अब पहले जैसे गाने लिखे या गाए नहीं जाते. यही वजह है कि किसी सुपरहिट फिल्म का गीत भी कुछ दिनों बाद लोग भूल जाते हैं. लेकिन मेरे पिता के दिनों के गीत दशकों बाद अब भी लोगों की जुबान पर हैं. वह हिंदी फिल्मों का स्वर्णिम दौर था. अब तकनीक बेहतर हुई है. लेकिन गानों का स्तर गिरा है. पहले जहां सार्थक और संदेश देने वाले गीत लिखे जाते थै, अब कहीं से कुछ जोड़ कर एक गीत बन जाता है.

इंटरव्यूः प्रभाकर, कोलकाता

संपादनः निखिल रंजन

DW.COM

संबंधित सामग्री