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मनोरंजन

करियर के तार बिठाने में लगी मोनिका

अभिनेत्री मोनिका बेदी ने अपने पूरे करियर के दौरान पॉजीटिव किरदार ही निभाए हैं. लेकिन अजीब पटकथाओं वाली फिल्मों के बढ़ते प्रस्तावों के कारण वह अब निगेटिव किरदार निभाने के लिए भी तैयार हैं.

अभिनय की बजाय मोनिका ने गैंगस्टर अबू सलेम के साथ अपनी नजदीकियों और जेल यात्रा की वजह से ज्यादा सुर्खियां बटोरी हैं. लेकिन अब अतीत को पीछे छोड़ कर वह करियर में नया मुकाम हासिल करने की दिशा में आगे बढ़ रही हैं. इसके लिए उनको मजबूत किरदार-प्रधान फिल्मों की तलाश है. एक निजी कार्यक्रम के सिलसिले में कोलकाता पहुंची इस अभिनेत्री ने अपने बचपन, करियर, अबू सलेम के साथ दोस्ती और भविष्य की योजनाओं के बारे में डॉयचे वेले से बातचीत की. पेश है उस बातचीत के मुख्य अंश:

आपने अपने लंबे करियर में अच्छा और बुरा दोनों दौर देखा है. नब्बे के दशक के मुकाबले अब हिंदी फिल्मोद्योग की क्या स्थिति है?

हिंदी फिल्मोद्योग अब बेहतरी की ओर बढ़ रहा है. पहले के मुकाबले बेहतर फिल्में बन रही हैं और तकनीकी पक्ष भी काफी मजबूत हुआ है.

वर्षों जेल में गुजारने के बाद क्या कभी फिल्मों में वापसी के बारे में सोचा था?

सच कहूं तो एक दौर ऐसा भी था जब मैंने इसकी उम्मीद छोड़ दी थी. लेकिन मन के किसी कोने में यह विश्वास था कि देर-सबेर मुझे न्याय जरूर मिलेगा. लंबा अरसा जेल में गुजारने के बाद सुप्रीम कोर्ट ने मेरी सजा कम कर दी. लेकिन सजा तो मैं काट ही चुकी थी. क्या कोई उन वर्षों को लौटा सकता है.

जेल से छूटने के बाद फिल्मों में वापसी कैसे हुई?

वर्ष 2007 में जमानत पर रिहा होने के बाद बिग बॉस 2 में काम मिला और अच्छे पैसे भी मिले. तब लोगों ने असली मोनिका को जाना और समझा. उसके बाद रियल्टी शो देसी गर्ल और झलक दिखला जा में काम करने के मौके मिले. उसी दौरान संजय लीला भंसाली ने टीवी शो सरस्वतीचंद्र में काम करने का प्रस्ताव दिया. उस शो में मेरे निगेटिव किरदार ने मुझे कई अवार्ड दिलाए. उससे मेरी पहचान भी बनी.

अभिनय के क्षेत्र में उतरने का फैसला कैसे किया?

मैं जब एक साल की थी तब मेरा परिवार पंजाब के होशियारपुर से नार्वे चला गया था. मेरे पिता ने वहां कपड़े की एक दुकान खोली थी. हमलोग हर साल भारत आते थे. वर्ष 1995 की गर्मियों में मनोज कुमार जी ने मुझे एक फिल्म में काम करने का आफर दिया. वह फिल्म तो नहीं बन सकी. लेकिन बाद में कई फिल्मों में काम करने के प्रस्ताव मिलने लगे. मैंने भी उस दौर में बिना सोचे-समझे एक साथ कई फिल्में साइन कर लीं. वर्ष 1995 से 2001 के बीच के उस दौर में मैंने गुजराती, बांग्ला और दक्षिण भारतीय फिल्मों में भी काम किया.

अबू सलेम के साथ संबंधों ने आपके करियर को कितना नुकसान पहुंचाया?

इससे मुझे काफी नुकसान हुआ. लोग हाल तक मुझे फिल्मों या टीवी शो में लेने से डरते थे. निर्माता मुझसे सबसे पहला सवाल यही करते थे कि कहीं से (सलेम की ओर से) कोई हस्तक्षेप तो नहीं होगा. लेकिन अब धीरे-धीरे उस स्थिति से उबर रही हूं.

अबू सलेम से दोस्ती कैसे हुई?

दुबई में एक शो के दौरान अबू से मुलाकात हुई थी. तब उसने अपना परिचय एक व्यापारी के तौर पर किसी और नाम से दिया था. मुंबई आने के बाद फोन पर हमारे बीच बातचीत होती रही और हम दोस्त बन गए. लगभग नौ महीने तक यह सब चलने के बाद मैं दोबारा उससे मिलने दुबई गई. उसी समय मुझे पता चला कि उसका असली नाम अबू सलेम है. धीरे-धीरे उसके कारनामों का भी पता चलने लगा. वह मुझे फिल्मों में लौटने नहीं दे रहा था. इस डर से कि कहीं उसके ठिकाने का पता नहीं चल जाए.

क्या फिल्मों में भी निगेटिव किरदार करने का इरादा है?

मैंने अब तक तमाम फिल्मों में पॉजीटिव किरदार निभाए हैं. लेकिन सरस्वतीचंद्र के किरदार ने मुझे पहचान दी है. इसलिए अब फिल्मों में भी निगेटिव किरदार निभाना चाहती हूं.

आगे क्या योजना है?

फिल्मों के ऑफर तो ढेरों मिल रहे हैं. लेकिन उनकी पटकथाएं अजीब होती हैं. मैं मजबूत और चरित्र-प्रधान किरदार निभाना चाहती हूं. मुझे ऐसे किरदारों की तलाश है जिनसे मैं खुद को बेहतर अभिनेत्री के तौर पर स्थापित कर सकूं.

इंटरव्यू: प्रभाकर, कोलकाता

संपादन: महेश झा

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