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दुनिया

करजई के दफ्तर पहुंचाए सीआईए ने करोड़ों डॉलर

कभी सूटकेस, कभी बैग और कभी प्लास्टिक थैलियों में भर करोड़ों डॉलर अफगान राष्ट्रपति हामिद करजई के दफ्तर पहुंचाए गए. यह पैसा अमेरिकी खुफिया एजेंसी सीआईए ने अपना प्रभाव बढ़ाने के लिए दिया. न्यूयॉर्क टाइम्स की रिपोर्ट.

खलील रोमन 2002-05 तक अफगानिस्तान के राष्ट्रपति हामिद करजई के चीफ ऑफ स्टाफ थे; उन्होंने न्यूयॉर्क टाइम्स को बताया है, "हम इसे घोस्ट मनी कहते थे. यह गोपनीय रूप से आता और गुप्त रूप से रख दिया जाता." कथित "घोस्ट मनी" अमेरिकी खुफिया एजेंसी सीआई ने अफगानिस्तान में अपना प्रभाव बढ़ाने के लिए खर्च किया. हालांकि हुआ इसका उल्टा. खुद अमेरिकी अधिकारी मानते हैं कि इस पैसे ने देश में भ्रष्टाचार बढ़ाया, लड़ाकों को ताकत दी और अफगानिस्तान से अमेरिका के बाहर निकलने की योजना को कमजोर किया. एक अमेरिकी अधिकारी ने कहा है, "अफगानिस्तान में भ्रष्टाचार का सबसे बड़ा स्रोत अमेरिका था."

सीआईए ने इस रिपोर्ट पर प्रतिक्रिया देने से इनकार कर दिया है और अमेरिकी विदेश विभाग ने भी तुरंत इस बारे में कुछ नहीं कहा. न्यूयॉर्क टाइम्स ने हामिद करजई और उनके दफ्तर की तरफ से भी कोई प्रतिक्रिया नहीं छापी है.

अखबार के मुताबिक करीब एक दशक तक तकरीबन हर महीने पैसा अफगान राष्ट्रपति के दफ्तर तक पहुंचता रहा. जंग शुरू होने के बाद से ही सीआईए की तरफ से पैसा बांटा जाना, अहम कामों में शामिल था. इस तरह से जो पैसा आता था वह उस अमेरिका मदद का हिस्सा नहीं था जिस पर कड़े नियम कानून लागू थे और जिनकी पूरी निगरानी होती थी. न ही यह पैसा सीआईए की तरफ से मिलने वाले उस आधिकारिक मदद का हिस्सा था जो वह स्थानीय खुफिया एजेंसियों पर खर्च करती थी. न्यूयॉर्क टाइम्स ने यह भी कहा है कि यह अमेरिकी कानून के खिलाफ नहीं था.

अमेरिकी अधिकारियों के मुताबिक इस बात के कोई सबूत नहीं है कि करजई ने निजी रूप से इसमें से कोई पैसा लिया था या नहीं. इस पैसे का जिम्मा उनकी नेशनल सिक्योरिटी काउंसिल का था. इन पैसों के बारे में जानने वाले अमेरिकी और अफगान अधिकारियों का कहना है कि इस तरह से पैसे देने का मुख्य मकसद करजई और उनके करीबी लोगों तक पहुंच बनाना था जिससे कि राष्ट्रपति भवन में सीआईए का प्रभाव बनाए रखा जा सके. इस पैसे ने सीआईए को अफगानिस्तान के सरकारी हलके में भरपूर ताकत दी.

इनमें से ज्यादातर पैसा राजनेताओं और लड़ाकों को दिया गया. इनमें से कई नशीली दवाओं के कारोबार से जुड़े थे और कुछ के तो तालिबान से भी संबंध थे. न्यूयॉर्क टाइम्स ने अमेरिका अधिकारियों के हवाले से तो यहां तक लिखा है कि अमेरिकी राजनयिक और कानून का पालन कराने वाले एजेंट जिस नेटवर्क को तोड़ने के लिए काम कर रहे थे उसी को सीआईए मजबूत बना रही थी. नतीजा यह हुआ कि सरकार संगठित अपराध के चंगुल में फंसी रही.

2010 में करजई ने बताया था कि उनके दफ्तर को बैगों में भर कर ईरान से नगद पैसा मिला. हालांकि कहा गया कि वह पैसा मदद का था जो खुलेआम दिया गया और वह राष्ट्रपति भवन के खर्च के लिए था. उस वक्त उन्होंने यह भी कहा था कि अमेरिका ने भी इसी तरह से पैसे दिए थे. न्यूयॉर्क टाइम्स की ताजा रिपोर्ट कहती है कि सीआईए की तरह ही ईरान से आया ज्यादातर पैसा भी राजनेताओं और लड़ाकों को ही दिया गया.

करजई के 11 साल के शासन के दौरान सेना और पुलिस में भ्रष्टाचार पर पहुत कम ध्यान दिया गया है. देश की दो सबसे ताकतवर संस्थाएं अरबों डॉलर की विदेशी मदद हर साल हासिल करने के बाद भी महज सैनिकों को भर्ती करने और एक ताकत बनने के लिए भी संघर्ष कर रही हैं. सेना और पुलिस को लगातार नौकरी छोड़ते लोगों की वजह से पैदा हुई स्थिति से जूझना पड़ रहा है.

एनआर/ओएसजे(रॉयटर्स)

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