कम नहीं हैं बीरेन सिंह सरकार की चुनौतियां | दुनिया | DW | 15.03.2017
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दुनिया

कम नहीं हैं बीरेन सिंह सरकार की चुनौतियां

देश की सरहद की रक्षा करते हुए फुटबाल के मैदान से पत्रकारिता के सफर के बाद राजनीति के शीर्ष पर पहुंचे मणिपुर के नये मुख्यमंत्री एन. बीरेन सिंह का अब तक का सफर दिलचस्प है.

Indien Straßenblockade (DW/Prabhakar)

नाकेबंदी खत्म करने की चुनौती

बीते साल अक्तूबर में कांग्रेस का साथ छोड़ना एन. बीरेन सिंह के लिये भाग्यशाली साबित हुआ. वर्ष 2012 में इबोबी सिंह मंत्रिमंडल में जगह नहीं बना पाने वाले बीरेन ने बीजेपी का दामन थामने के पांच महीने के भीतर बुधवार को राज्य में बीजेपी की पहली सरकार के मुख्यमंत्री के तौर पर शपथ ली.

बीरेन को इबोबी सिंह सरकार के 15 साल लंबे शासन का मुख्य वास्तुकार माना जाता है. वह बीते साल के आखिर तक इबोबी के दाहिने हाथ थे. सीमा सुरक्षा बल (बीएसएफ) में नौकरी के दौरान फुटबाल का शौक उनको देश के विभिन्न मैदानों में ले जाता रहा. बीरेन राष्ट्रीय स्तर के फुटबाल खिलाड़ी थे. शायद फुटबाल के गुर ने ही उनको राजनीति में कदम रखने के महज 15 साल के भीतर मुख्यमंत्री की कुर्सी तक पहुंचा दिया.

राजनीतिक करियर

बीएसएफ से इस्तीफा देने के बाद उन्होंने पत्रकारिता के क्षेत्र में कदम रखा और एक स्थानीय दैनिक के संपादक बन गये. संपादक रहते एक कथित राष्ट्रविरोधी खबर के प्रकाशन के सिलसिले में उनको जेल तक जाना पड़ा था. लेकिन शुरू से ही महत्वाकांक्षी रहे बीरेन इस पेशे में ज्यादा दिनों तक नहीं टिक सके. वर्ष 2000 में गिरफ्तारी और जेल से लौटने के बाद उन्होंने राजनीति में हाथ आजमाने का फैसला किया. इसके लिए उन्होंने अपना अखबार भी बेच दिया. वर्ष 2002 में वह डेमोक्रेटिक रिवोल्यूशनरी पीपुल्स पार्टी के उम्मीदवार के तौर पर विधानसभा के लिए चुने गये. लेकिन साल भर के भीतर ही कांग्रेस में शामिल हो गये. मई, 2003 में इबोबी सिंह सरकार में उनको मंत्री बना दिया गया. उसके बाद बीरेन में कभी पीछे मुड़ कर नहीं देखा.

बीते साल अक्तूबर में इबोबी सिंह के खिलाफ बगावत का झंडा बुलंद करते हुए उन्होंने कांग्रेस से इस्तीफा देकर बीजेपी का दामन थाम लिया. राज्य में सत्ता की आहट पाने वाली बीजेपी ने उनको अपना प्रवक्ता और चुनाव प्रबंधन समिति का संयोजक बना दिया. हाल में हुए चुनावों में बीजेपी को बहुमत नहीं मिलने के बावजूद बीरेन ने क्षेत्रीय दलों के समर्थन के जरिये बहुमत जुटाने में कामयाबी हासिल की और राज्य में बीजेपी के पहले मुख्यमंत्री होने का रिकार्ड अपने नाम कर लिया. वैसे, वर्ष 2012 में सरकार में शामिल नहीं किए जाने के बाद ही उनके मन में खटास पैदा हो गई थी. लेकिन विकल्प के अभाव में उन्होंने चुप्पी साधे रखी थी. बीजेपी को सरकार बनाने लायक बहुमत हासिल होने के बावजूद मुख्यमंत्री की कुर्सी तक बीरेन की पहुंच आसान नहीं थी. उनको विश्वजीत सिंह से कड़ा मुकाबला करना पड़ा. लेकिन शायद फुटबाल के मैदान में विरोधियों को छकाने की रणनीति उनके काम आई और वह विधायक दल के नेता चुन लिये गये.

कड़ी चुनौती

बीरेन सिंह का अब तक का सफर भले आसान व दिलचस्प रहा हो, उनके लिए आगे की राह आसान नहीं है. विधानसभा की महज साठ सीटों वाला यह राज्य लंबे अरसे से कई जटिल समस्याओं से जूझ रहा है. इनमें सबसे प्रमुख है आर्थिक नाकेबंदी. अलग जिलों के गठन के विरोध में नगा संगठन यूनाइटेड नगा काउंसिल (यूएनसी) ने बीते साल एक नवंबर से ही राज्य की जीवनरेखा कही जाने वाली दोनों प्रमुख सड़कों पर आर्थिक नाकेबंदी लागू कर रखी है. राज्य को देश के बाकी हिस्सों से जोड़ने वाली सड़कों, नेशनल हाइवे-2 और 37 पर वाहनों की आवाजाही ठप है. यह पर्वतीय राज्य सब्जियों और खाने-पीने की दूसरी चीजों के लिए दूसरे राज्यों पर निर्भर है. लेकिन वाहनों की आवाजाही ठप होने की वजह से आवश्यक वस्तुएं बाजार से गायब हैं. इससे आम जनजीवन ठहर-सा गया है.

अब सत्ता में आने वाली नई सरकार के सामने सबसे बड़ी और प्रमुख चुनौती इस आर्थिक नाकेबंदी को खत्म करना है. वैसे, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमित शाह बीजेपी के सत्ता में आने के बाद राज्य को बंद और नाकेबंदी-मुक्त करने का वादा कर चुके हैं. लेकिन यह काम अगर इतना ही आसान होता तो शायद यह नाकेबंदी अबकी इतनी लंबी नहीं खिंचती. मुख्यमंत्री बीरेन सिंह का कहना है कि राज्य में महीनों से जारी नाकेबंदी खत्म करना सरकार की पहली प्राथमिकता होगी. वह कहते हैं, "राज्य के लोग सुशासन चाहते हैं. हमारी सरकार की प्राथमिकता आर्थिक नाकेबंदी को खत्म कर कानून व व्यवस्था की स्थिति को सुधारना है." उन्होंने राज्य के विकास के प्रति बीजेपी का कृतसंकल्प दोहराया है.

इसके अलावा नगा उग्रवादी संगठन नेशनल सोशलिस्ट काउंसिल आफ नगालैंड (एनएससीएन) के इसाक-मुइवा गुट और केंद्र सरकार के बीच हुई शांति समझौते को लेकर भी राज्य के बहुसंख्यक मैतेयी तबके में संशय है. यही वजह है कि कांग्रेस ने अपने चुनाव अभियान के दौरान भाजपा के खिलाफ इस समझौते का इस्तेमाल तुरुप के पत्ते की तरह किया. इस समझौते के तहत राज्य के नगा-बहुल इलाकों को ग्रेटर नगालैंड में शामिल करने जैसे प्रावधान होने के संदेह में यह राज्य हिंसा का लंबा दौर झेल चुका है. अब नई सरकार के लिए क्षेत्रीय अखंडता को बरकरार रखते हुए इस मुद्दे पर घाटी और पर्वतीय इलाके के लोगों के बीच बढ़ती दूरियों को कम करने की चुनौती होगी. दरअसल मणिपुर घाटी और पर्वतीय इलाकों में बंटा है. घाटी में मैतेयी जनजाति की बहुलता है तो पर्वतीय इलाकों में नगा जनजातियों की. इन दोनों के बीच अक्सर टकराव होता रहा है. सशस्त्र बल विशेषाधिकार अधिनियम को राज्य से खत्म करने का मुद्दा वैसे तो काफी पुराना है. लेकिन नई सरकार के सामने इस मुद्दे से निपटने की भी कड़ी चुनौती होगी.

मणिपुर में विकास की गति ठप होने और व्यापक स्तर पर भ्रष्टाचार के भी आरोप लगते रहे हैं. नई सरकार के सामने अपने कामकाज में पारदर्शिता बरतते हुए राज्य में विकास की गति तेज करने की अहम चुनौती होगी. इबोबी सिंह सरकार के खाते में कम से कम यह कामयाबी तो दर्ज है ही कि तमाम प्रतिकूल परिस्थितियों के बावजूद उन्होंने अस्थिरता के लिए मशहूर पूर्वोत्तर इलाके के इस राज्य में लंबे समय तक एक स्थिर सरकार मुहैया कराई थी. राज्य की संवेदनशील परिस्थिति को ध्यान में रखते हुए नई सरकार के लिए राज्य को राजनीतिक स्थिरता देना भी किसी चुनौती से कम नहीं होगा.

रिपोर्टः प्रभाकर

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