कभी नहीं होगा कैंसर का खात्मा | विज्ञान | DW | 01.07.2014
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विज्ञान

कभी नहीं होगा कैंसर का खात्मा

कैंसर दुनिया भर में होने वाली मौत के मुख्य कारणों में शामिल है. 2012 में कैंसर से 82 लाख लोग मरे. यह बहुत ही पुरानी बीमारी है और अब अंतरराष्ट्रीय रिसर्चरों का कहना है कि यह तब तक रहेगा जब तक जीवन है.

जर्मनी के कील यूनिवर्सिटी में क्रमिक विकास विज्ञान के प्रोफेसर थोमस बॉश के नेतृत्व में एक टीम ने हाइड्रा की दो प्रजातियों में स्वाभाविक रूप से होने वाले ट्यूमर का पता लगाया. हाइड्रा छोटे सांप जैसे बहुत मुंह वाले जानवर होते हैं जिनके शरीर की दीवार में कोशिकाओं की दो परतें होती हैं. क्रमिक विकास के हिसाब से वे बहुत ही पुराने जीव हैं और ताजा पानी में होने वाले कोरल या समुद्री जेलीफिश के रिश्तेदार हैं.

रिसर्चरों का कहना है कि कैंसर पृथ्वी पर बहुकोशिका वाली जिंदगी जितना ही पुराना है और संभवतः उसे कभी भी समाप्त नहीं किया जा सकेगा. थोमस बॉश लंदन से प्रकाशित होने वाली विज्ञान पत्रिका नेचर में प्रकाशित अपनी टीम के शोध परिणामों के बारे में कहा है. सेल के अंदर डीएनए में होने वाले बदलाव की वजह से पैदा होने वाले कैंसर में कोशिकाओं में अनियंत्रित वृद्धि होती है. इसके परिणामस्वरूप ट्यूमर पैदा होता है, जिसमें शरीर के सामान्य ऊत्तक में घुसने और उसे नष्ट करने की क्षमता होती है.

Symbolbild Belgien Sterbehilfe Kinder

कैंसर को लेकर दुखद अध्ययन

रिसर्चरों का कहना है कि ट्यूमर वाले हाइड्रा में फिटनेस का अत्यंत अभाव था और स्वस्थ हाइड्रा में ट्यूमर सेल डालने से वहां भी ट्यूमर के विकास को बढ़ावा देता है. थोमस बॉश ने इसका नतीजा निकाला, "कैंसर की कोशिकाओं का आक्रमणकारी चरित्र भी पुराना विकासवादी गुण है." कील के रिसर्चरों का मानना है कि हाइड्रा जैसे आदिकालीन जानवरों के अध्ययन से इंसानों में कैंसर वाले ट्यूमर के विकास की प्रक्रिया के बारे में काफी जानकारी मिल सकती है.

विश्व स्वास्थ्य संगठन डब्ल्यूएचओ के अनुसार हर साल कैंसर से होने वाली मौतों में फेफड़े, लीवर, पेट और स्तन के कैंसर से होती है. महिलाओं और पुरुषों में आम तौर पर होने वाले कैंसरों के प्रकार अलग अलग होते हैं. कैंसर मात्र एक सेल से पैदा होता है. एक सामान्य सेल के कैंसर वाले सेल में बदलने की प्रक्रिया कई स्तरों में होती है. यह बदलाव इंसान के जेनेटिक कारकों और बाहरी एजेंटों के बीच टकराव से होता है. बाहरी एजेंटों में शरीर के कैंसर वाले तत्व, एस्बेस्टोस या सिगरेट के धुएं के तत्व या वायरस जैसे जैविक त्तव शामिल हैं.

एमजे/एजेए (डीपीए)

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