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फीडबैक

कभी नहीं भुलाए जा सकते मोहम्मद रफी

मोहम्मद रफी की 30वीं पुण्यतिथि पर श्रोता रवि सेठिया के विचार, आजमगढ़ से पैगाम रेडियो लिस्नर्स की क्लब रिपोर्ट के साथ साथ हमारे कुछ कार्यक्रमों पर अन्य श्रोता क्या लिखते हैं, आइए जाने उन्हीं के शब्दों में.

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कभी नहीं भुलाए जा सकने वाले हजारों सुरों को अपनी दिलकश आवाज की बदौलत अमर बनाने वाले महान गायक मोहम्मद रफी के बारे में जितना कहा जाये कम है. उनकी आवाज का जादू उनके गुजरने के करीब तीन दशक बाद भी लाखों, करोड़ों संगीत प्रेमियों के दिलो दिमाग पर राज कर रहा है. रफी साहब के कई समकालीन गायक-गायिकाएं गुमनामी के अंधेरे में खो गए, लेकिन लोगों के दिलों पर रफी साहब और उनके गीतों का प्रभाव दिनों दिन गहराता गया.

भारतीय संगीत, खास तौर पर फिल्म संगीत में मोहम्मद रफी के महत्व और जनमानस पर उनके गाए गीतों के दीर्घकालिक असर से हर कोई वाकिफ है. पाश्र्व गायन के सरताज मोहम्मद रफी का महत्व आज केवल इसलिये नहीं है कि उन्होंने हजारों की संख्या में हर तरह के गीत गाए और अपने गीतों के जरिये जिन्दगी के विभिन्न पहलुओं को अभिव्यक्ति दी बल्कि इसलिये भी है कि सामाजिक, जातीय एवं धार्मिक संकीर्णताओं के इस दौर में वह इंसानियत, मानवीय मूल्यों, देशप्रेम, धर्मनिरपेक्षता एवं साम्प्रदायिक सद्भाव के एक मजबूत प्रतीक हैं. उनके गाए गीत नैतिक, सामाजिक एवं भावनात्मक अवमूल्यन के आज के दौर में जनमानस को इंसानी रिश्तों, नैतिकता और इंसानियत के लिये प्रेरित कर रहे हैं. रफी के गुजरने के कई साल बाद भी उनकी सुरीली आवाज का जादू लोगों के सिर चढ़ कर बोल रहा है. उनकी आवाज के प्रशंसकों और दीवानों की संख्या लाखों में है और ये केवल भारत में ही नहीं, दुनिया के हर देश में फैले हुए हैं.

हम जैसे लोग जो मोहम्मद रफी और उनके समकालीन गायकों की सुरीली आवाजों के बीच ही पले-बढ़े हैं, आज की पीढ़ी बीते दिनों के अनगिनत सुरीले और मधुर गीतों से कटती जा रही है और अश्लील एवं बेतुके गानों, रीमिक्स, पिश्चमी और पॉप संगीत के जाल में फंसती जा रही है. व्यावसायिकता और मुनाफा कमाने की होड़ में संगीत कम्पनियां आज रीमिक्स की प्रवृत्ति को बढ़ावा देकर भारतीय संगीत के सुरीलेपन को तो नष्ट कर ही रही हैं, नई पीढ़ी को भी असली संगीत के आनन्द से वंचित कर रही हैं.

रवि सेठिया, अलोट, जिला रतलाम, मध्य प्रदेश

लव परेड की घटना पर आपकी विस्तृत रिपोर्टें पढ़ीं, विडियो तस्वीरें भी देखीं. सचमुच आप किसी भी महत्वपूर्ण घटना की सम्पूर्ण जानकारी अपने पाठकों और श्रोताओं को देने में बहुत मेहनत करते हैं. आपकी वेबसाइट को सर्वेत्तम कहें तो अतिशयोक्ति नहीं. लव परेड का हादसा अत्यंत पीड़ादायक था, लेकिन इसी कारण इस आयोजन को रद्द करना बुद्धिमात्तापूर्ण नहीं. भाग लेने वालों को भी बहकना या संयम खो देने से बचना होगा.

विभा मालू, फतेहपुर-शेखावाटी, जिला सीकर, राजस्थान

2 जून को ऊंची तकिया मुबारकपुर, आजमगढ़ में पैगाम रेडियो लिस्नर्स क्लब में महिला जागरूकता गोष्ठी का आयोजन किया गया. महिलायों को दी जाने वाली सहायता पर चर्चा की गई. क्लब के अध्यक्ष का कहना था कि सबसे बड़ा धर्म गरीबों की सेवा करना है. महिला भी एक इंसान है. उन्हें कभी हेय दृष्टि से नहीं देखना चाहिए. महिलो को दी जाने वाली सहायता कभी बेकार नहीं जाती. आज भले ही हम एक आधुनिक समाज में रह रहे हैं. विज्ञान और तकनीक को अपने जीवन के हर पक्ष में प्रयोग कर रहे हैं लेकिन हर कदम पर हमारी कुछ रुढ़िवादी परम्परांएं हैं जो हमारी बेड़ियां बनी हुई हैं. आज भी परिवार में बेटे को वंश चलाने वाला कुलदीपक माना जाता है किन्तु बेटियों को कहीं न कहीं हीनता से देखा जाता है. भले ही बाल विवाह और दहेज़ प्रथा जैसी कुप्रथाओं को रोकने के लिए कानून बना दिए गए हैं किन्तु आज भी हमारे समाज में ये कहीं न कहीं जीवित है. लोगों की मानसिकता आज भी संकीर्ण है. लोग अपनी झूठी शानो शौकत तथा रुढ़िवादी परम्पराओं में बंधकर इंसानियत को भूल रहे हैं. इन्हीं के कारण ही तो समाज में असंतोष और अराजकता को बढावा मिलता है. अगर एक व्यक्ति और समाज के रूप में हमें आगे बढ़ना है तो इन बेड़ियों की जकड़न से मुक्त होने का प्रयास क्यों नहीं कर पा रहे है. हमारी सभ्यता और संस्कृति हमारी धरोहर है.

दिलशाद हुसैन, पैगाम रेडियो लिस्नर्स क्लब, मुबारकपुर, आजमगढ़, उत्तर प्रदेश

आज शाम की सभा में कार्यक्रम हैलो ज़िन्दगी सुना. 15 साल की उम्र से ही कैंडी बिज़नस में उतरे वालेंटीन की जानकारी काफी प्रेरणादायी थी और साथ में टाइम मैनेजमेंट के महत्व के बारे में जानने को मिला. खोज में सर्बिया में लाशों की शिनाख्त के लिए चल रही नई तकनीक की जानकारी और साथ में गुजरात के तट पर समुद्र की गहराई में मंदिर और पुराने शहरों के अवशेषों की खोज के बारे में नई जानकारी सुनने को मिली जो पसंद आई.

संदीप जावले, मार्कोनी डी एक्स क्लब, परली वैजनाथ, महाराष्ट्र

रिपोर्टः विनोद चढ्डा

संपादनः एम गोपालकृष्णन

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