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ब्लॉग

कब टूटेगा अफसर और नेताओं का गठबंधन

अनिल गोस्वामी को अपने करियर के शिखर पर पहुंचने के बाद बर्खास्तगी की शर्मिंदगी इसलिए उठानी पड़ी क्योंकि उन्होंने बहुचर्चित सारदा चिट फंड घोटाले के आरोपी पूर्व केंद्रीय मंत्री मतंग सिंह को गिरफ्तारी से बचाने का प्रयास किया.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार ने अनिल गोस्वामी के खिलाफ कार्रवाई करने में जो चुस्ती-फुर्ती दिखाई है, वह प्रशंसनीय है. केन्द्रीय गृह सचिव के रूप में अनिल गोस्वामी ने निश्चय ही सीबीआई के अधिकारियों पर मतंग सिंह को गिरफ्तार न करने के लिए दबाव डालकर स्वयं को अपराध और भ्रष्टाचार के पक्ष में खड़ा कर दिया था. एक नौकरशाह के रूप में गोस्वामी का आचरण पूरी तरह से निष्पक्ष होना चाहिए था. नौकरशाही को लोकतांत्रिक व्यवस्था में फौलादी ढांचा कहा जाता है जिस पर यह पूरी सरकारी मशीनरी टिकी होती है. नौकरशाहों से यह अपेक्षा की जाती है कि वे मंत्रियों के गैरकानूनी या अनुचित आदेशों का पालन नहीं करेंगे और उन्हें हर मुद्दे पर कानूनसम्मत और उचित सलाह देंगे. लेकिन हकीकत इसके बिलकुल उलट है.

इस प्रकरण से यह सवाल तो उठता ही है कि क्या हमारे देश में नौकरशाही स्वतंत्र और निष्पक्ष है या वह राजनीतिक नेताओं के दबाव में, और सच कहा जाये तो अक्सर उनके एजेंट के रूप में काम करती है? कुछेक अपवादों को छोड़ दें तो अधिकांश नौकरशाह इस या उस नेता अथवा इस या उस राजनीतिक पार्टी के गुर्गे के तरह काम कर करते हैं. केंद्र या राज्यों में किसी भी पार्टी की सरकार हो, कुछ ही समय में सभी को यह पता चल जाता है कि कौन-सा अफसर प्रधानमंत्री या मुख्यमंत्री के सबसे नजदीक है, किस मंत्री से संपर्क करने के लिए किस अफसर को साधना होगा और कौन-सा काम कराने के लिए किस नौकरशाह के दरवाजे पर माथा टेकना होगा.

यह स्पष्ट है कि भ्रष्टाचार के लिए नेता-अफसर सांठगांठ पूरी तरह से जिम्मेदार है. जब कोई नेता पहली बार मंत्री बनता है, तो उसे सरकारी प्रक्रियाओं के बारे में कुछ भी पता नहीं होता और न ही यह जानकारी होती है कि कहां से और किस तरह पैसा बनाया जा सकता है. उसे इसके रास्ते अफसर ही बताते हैं और मंत्री के साथ-साथ खुद भी पैसा बनाते हैं. इसीलिए जब भी कोई नई सरकार सत्ता में आती है, उसका सबसे पहला काम अफसरों का बड़े पैमाने पर तबादला करना होता है. अपने कार्यकाल के दौरान भी अक्सर मंत्री उन अफसरों का तबादला कर देते हैं जो उनके मन मुआफिक काम नहीं करते. इसलिए कई बार परेशानी से बचने के लिए नेक और ईमानदार अफसरों को भी मन मार कर ऐसे काम करने पड़ जाते हैं जो वे करना नहीं चाहते.

ऐसे में अनिल गोस्वामी को बर्खास्त करने के कदम की प्रशंसा की जानी चाहिए और सरकार के यह उम्मीद की जानी चाहिए कि वह भविष्य में भी इसी तरह से नौकरशाही पर अंकुश रखेगी और उसे संविधानसम्मत आजादी से काम करने देगी. लेकिन दुर्भाग्य से यह उम्मीद कुछ ज्यादा ही लगती है. प्रधानमंत्री बनते ही नरेंद्र मोदी अपने चहेते नौकरशाह नृपेन मिश्र को अपना प्रमुख सचिव बनाने के लिए अध्यादेश जारी करने की हद तक चले गए. उन्होंने अपनी मंत्रिपरिषद के सदस्यों को आदेश दिया कि जो भी अफसर पुरानी सरकार के मंत्रियों के स्टाफ पर था, उसका तबादला किया जाए. यानि, नौकरशाही में अपने और पराए नौकरशाह के बीच भेद करने की नीति जारी रही.

एक सवाल यह भी उठता है कि यदि सारदा घोटाले का संबंध तृणमूल कांग्रेस के नेताओं से न होता तो भी क्या केंद्र सरकार मतंग सिंह को बचाने के प्रयास पर क्रुद्ध होकर गृह सचिव के खिलाफ कार्रवाई करने में इतनी ही फुर्ती दिखाती? और, यदि भविष्य में कोई राजनीतिक नेता, विधायक, सांसद या मंत्री किसी जांच में दखल देता पाया गया, तो भी क्या मोदी सरकार और भाजपा की राज्य सरकारें ऐसी ही सख्त कार्रवाई करेंगी? यदि करेंगी तो यह सिद्ध हो जाएगा कि मोदी सरकार सरकारी कामकाज में पारदर्शिता लाने के प्रति वाकई गंभीर है.

ब्लॉग: कुलदीप कुमार

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