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ब्लॉग

कब करेंगे सांसद बहुमत का प्रतिनिधित्व

लोकसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी ने अपने बलबूते पर स्पष्ट बहुमत प्राप्त करके इस धारणा को गलत सिद्ध कर दिया है कि अब केंद्र में एक पार्टी की सरकार बनने के दिन लद गए हैं. लेकिन नतीजों से चुनाव की प्रणाली पर सवाल उठे.

भारतीय जनता पार्टी ने लंबे समय से चली आ रही इस धारणा को भी गलत सिद्ध कर दिया है कि केंद्र में मिलीजुली सरकारों का युग लंबे समय तक चलेगा. यूं यह कहा जा सकता है कि क्योंकि 1984 से लेकर 2014 तक यानि तीन दशकों तक केंद्र में किसी एक पार्टी को स्पष्ट बहुमत नहीं मिला और इसलिए यह युग काफी लंबा ही चला, लेकिन यह एकाएक इस तरह समाप्त हो जाएगा इसकी कल्पना स्वयं भारतीय जनता पार्टी को भी नहीं थी. यह अलग बात है कि उसने स्पष्ट बहुमत पाने के बावजूद केंद्र में मिलीजुली सरकार बनाने का ही फैसला लिया है ताकि राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन के अपने सहयोगी दलों को भी वह उसमें शामिल कर सके, ठीक उसी तरह जैसे 1977 में पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में स्पष्ट बहुमत पाने के बावजूद मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी ने अन्य वामदलों के साथ मिलकर वाम मोर्चे की सरकार बनाने का निर्णय लिया था.

स्पष्ट बहुमत का अर्थ है सदन की कुल सीटों में से आधी से एक सीट अधिक हासिल करना. लोकसभा की सदस्य संख्या 543 है. इसलिए जिस राजनीतिक दल को 272 सीटें हासिल होंगी, उसके पास स्पष्ट बहुमत होगा. हमारी चुनाव प्रणाली भी इसी तरह की है. इसे फर्स्ट-पास्ट-द-पोस्ट प्रणाली कहा जाता है. इसमें जिस उम्मीदवार को भी सबसे अधिक वोट मिलते हैं, उसे विजयी घोषित किया जाता है, भले ही उसे हारने वाले उम्मीदवार से केवल एक वोट ही ज्यादा क्यों न मिला हो. इसका नतीजा अक्सर यह निकलता है कि जीतने वाले उम्मीदवार के पक्ष में वोट देने वालों की संख्या उसे वोट न देने वालों की तुलना में बहुत कम होती है. यानि अधिकांश मतदाता उसके पक्ष में नहीं होने पर भी उसे सभी मतदाताओं का प्रतिनिधि मान लिया जाता है. जो बात उम्मीदवार के लिए सही है, वही राजनीतिक दलों पर लागू होती है. इसलिए आज तक किसी भी चुनाव में किसी भी दल को पचास प्रतिशत या उससे अधिक वोट नहीं मिले.

Indien Parlamentswahl 2014 Modi im Parlament 20.05.2014

संसद की सीढ़ियों पर मत्था टेकते मोदी

इस बार के चुनाव में यह सचाई और भी अधिक स्पष्ट रूप से उजागर हुई. भारतीय जनता पार्टी को 282 सीटें मिली हैं जबकि उसे कुल डाले गए वोटों के केवल 31 प्रतिशत वोट ही मिले हैं. विसंगति यह है कि जहां भाजपा को प्रति एक प्रतिशत वोट पर 1.67 सीट हासिल हुई है, वहीं कांग्रेस को प्रति एक प्रतिशत वोट पर केवल 0.42 सीट ही मिली है, यानि उतने ही वोट पाकर अगर भाजपा को चार सीटें मिलीं तो कांग्रेस को केवल एक. उत्तर भारत की क्षेत्रीय पार्टियों का भी यही हाल है. उन्हें वोट तो मिले लेकिन सीट नहीं. इस स्थिति से लोकतंत्र के भविष्य से सरोकार रखने वाले सभी नागरिक चिंतित हैं, क्योंकि वर्तमान चुनाव प्रणाली लोकतंत्र की पहली शर्त यानि प्रतिनिधित्व की वैधता को ही पूरा नहीं करती.

ऐसा नहीं कि इस विषय पर पहले विचार नहीं किया गया. 11 जनवरी, 1987 के अंग्रेजी साप्ताहिक ‘द संडे ऑब्जर्वर' में प्रकाशित इंटरव्यू में वरिष्ठ भाजपा नेता लालकृष्ण आडवाणी ने मुझसे कहा था कि यूरोप के सभी लोकतंत्रों ने इस प्रणाली को छोड़ दिया है और प्रातिनिधिक प्रणाली को अपनाया है. वहां या तो सूची प्रणाली है या फिर पश्चिम जर्मनी जैसी मिश्रित प्रणाली है. भारत के मुख्य निर्वाचन आयुक्त एस एल शकधर ने भी मिश्रित प्रणाली के पक्ष में विचार व्यक्त किए थे. आडवाणी ने इस इंटरव्यू में याद दिलाया कि जयप्रकाश नारायण द्वारा नियुक्त जस्टिस वी एम तारकुंडे समिति ने भी मिश्रित प्रणाली को उपयुक्त माना था. लेकिन हुआ कुछ नहीं, और आज भी वही व्यवस्था लागू है जिसके कारण लोकतंत्र विकृत होता है.

यहां यह उल्लेख किया जाना जरूरी है कि यूरोप के सभी देशों में सूची प्रणाली या मिश्रित प्रणाली लागू नहीं है. ब्रिटेन में भारत जैसी प्रणाली ही है. क्योंकि भारत में चुनाव ब्रिटिश शासन के दौरान ही शुरू हो गए थे, इसलिए यहां भी वही व्यवस्था लागू की गई और आजादी के बाद भी इसी को जारी रखा गया. ब्रिटेन के चुनावों में भी अक्सर भारत जैसी विसंगतियां देखने में आती हैं. अनेक लोगों की राय है कि इस समस्या का समाधान सानुपातिक प्रतिनिधित्व की प्रणाली अपना कर किया जा सकता है. दरअसल 1928 में मोतीलाल नेहरू की अध्यक्षता में गठित एक समिति ने ऐसी व्यवस्था अपनाए जाने की सिफारिश की भी थी, लेकिन औपनिवेशिक शासन ने उसे यह कहकर ठुकरा दिया कि भारतीयों के लिए यह बेहद जटिल प्रणाली है.

हमारे देश में राज्यसभा और राष्ट्रपति के चुनाव में सानुपातिक प्रतिनिधित्व की प्रणाली का पालन किया जाता है. कोई कारण नहीं कि लोकसभा और राज्य विधानमंडलों के चुनावों के लिए इसी तरह की प्रणाली की रूपरेखा तैयार न की जा सके. लेकिन इसके लिए सभी राजनीतिक दलों में, विशेषकर सत्तारूढ़ दल में, अपेक्षित इच्छाशक्ति का होना जरूरी है.

ब्लॉग: कुलदीप कुमार

संपादन: महेश झा

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