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दुनिया

कट्टरपंथियों से पाकिस्तान की नजदीकी

अमेरिका की स्पेशल फोर्स ने दो साल पहले आतंकवादी सरगना ओसामा बिन लादेन को मारा तो पाकिस्तानी सेना की भारी किरकिरी हुई. पर्यवेक्षकों का मानना है कि पाक सेना ने कट्टरपंथियों के खिलाफ अपना अस्पष्ट रवैया अभी भी छोड़ा नहीं है.

पश्चिम को तालिबान और आतंकवादी नेटवर्क अल कायदा के खिलाफ संघर्ष में पाकिस्तान की गंभीरता पर हमेशा संदेह था. बार बार पाकिस्तानी खुफिया सेवा आईएसआई पर आरोप लगे कि वह उग्रपंथियों को समर्थन दे रहा है. यह संदेह और बढ़ गया जब 2 मई 2011 को ओसामा बिन लादेन उत्तरी पाकिस्तान के छावनी शहर ऐबटाबाद में अमेरिकी कमांडो की कार्रवाई में मारा गया. इस कार्रवाई के बाद पश्चिमी राजनीतिज्ञ और विशेषज्ञ यह सवाल पूछने लगे कि पूरी दुनिया में खोजे जा रहे आतंकवादी के लिए सेना और खुफिया सेवा की मौजूदगी के बीच पांच साल तक पाकिस्तान में छुपकर रहना कैसे संभव हुआ.

अफगान तालिबान का ठिकाना

अफगान विवाद पर हार्वर्ड यूनिवर्सिटी में शोध करने वाले मैट वाल्डमन का कहना है कि इस बात के संकेत हैं कि आईएसआई ने ओसामा बिन लादेन की मौत के बाद भी अपनी नीति नहीं बदली है. "अफगान तालिबान कुछ मायनों में 2009 में अतिरिक्त अमेरिकी सैनिकों के भेजे जाने से पहले के मुकाबले और मजबूत हो गए हैं." अफगान और नाटो टुकड़ियों पर 2012 में हमलों की संख्या 2008 के मुकाबले दोगुनी थी. कट्टरपंथी ऐसा करने की हालत में इसलिए हैं क्योंकि उन्हें पाकिस्तान स्थिति ठिकानों से व्यापक नेटवर्क का समर्थन है. वाल्डमन कहते हैं, "ये ठिकाने हमला, प्रशिक्षण, भर्ती और ट्रांसपोर्ट में मदद करते हैं."

लंदन स्कूल ऑफ इकॉनॉमिक्स के एमरिस शूमेकर इसका समर्थन करते हैं, "सारे संकेत इस बात की ओर इशारा करते हैं कि पाकिस्तानी सेना के कुछ हिस्से अभी भी तालिबान का समर्थन कर रहे हैं. इस लिहाज से पश्चिम के पास संदेह करने के अच्छे कारण हैं." शूमेकर इस बात की ओर भी ध्यान दिलाते हैं कि पाकिस्तानी नेतृत्व में कोई साझा तालिबान नीति नहीं है, बल्कि वहां अलग अलग प्रतिस्पर्धी हित हैं.वहां ऐसे लोग भी हैं जो तालिबान का समर्थन नहीं करना चाहते हैं.

भारत के प्रभाव से डर

मैट वाल्डमन का कहना है कि कुल मिलाकर पाकिस्तान का रवैया क्षेत्रीय शक्ति संतुलन से तय हो रहा है. जब तक वह नहीं बदलता, तालिबान को पाकिस्तान के समर्थन में भी कोई परिवर्तन नहीं होगा. ठोस रूप से पाकिस्तान अफगानिस्तान में भारत के बढ़ते प्रभाव का खतरा महसूस कर रहा है. जर्मनी की हाइडेलबर्ग यूनिवर्सिटी के राजनीतिशास्त्री जिगफ्रीड वोल्फ भी ऐसा ही मानते हैं. वे कहते हैं, "पाकिस्तानी सेना का एक हिस्सा तालिबान को अफगानिस्तान में भारतीय उपस्थिति का सामना करने का रणनीतिक साधन मानता है." लेकिन वोल्फ पाकिस्तान और अफगानिस्तान के बीच रचनात्मक रिश्तों के संकेत भी देखते हैं.

विशेषज्ञों की राय इस पर मिलती है कि अमेरिका और अफगानिस्तान की तालिबान के साथ पाकिस्तान को साथ लिए बिना बात करने की कोशिश पर इस्लामाबाद की कड़ी प्रतिक्रिया हुई है. कराची यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर नईम अहमद का कहना है कि अमेरिका और अफगानिस्तान ने तालिबान के एक हिस्से से पाकिस्तान के बिना बात की है, "यह अमेरिका और पाकिस्तान के रिश्ते में सबसे बड़ी समस्या है और मुख्य वजह है कि पाकिस्तान अपनी पुरानी अफगान नीति पर कायम है."

पाकिस्तान में इलाके के जानकारों का मानना है कि काबुल में पाकिस्तान के समर्थन के बिना कोई सरकार काम नहीं कर सकती. पाकिस्तानी पत्रकार नसीर तुफैल कहते हैं, "जैसा कि हमने अतीत में देखा है, अपना हित पूरा नहीं होने पर पाकिस्तान अफगानिस्तान में विद्रोहियों का समर्थन कर सकता है. यह अफगानिस्तान के लिए अच्छा नहीं है."

रिपोर्टः शामिल शम्स/एमजे

संपादनः निखिल रंजन

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