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मंथन

कचरे से ऊर्जा

हर साल सीवेज और कागज के अलावा खेती, औद्योगिक उत्पादन और फूड इंडस्ट्री का करोड़ों टन कचरा बाहर आता है. इसे ठिकाने लगाना आसान नहीं, इसमें काफी ऊर्जा खर्च होती है. जर्मन वैज्ञानिकों ने इसका उपाय निकाला है.

फ्राउनहोफर इंस्टीट्यूट फॉर क्लाइमेट, सिक्योरिटी और एनर्जी टेक्नीक के वैज्ञानिक एक बायोएनर्जी प्लांट के जरिए इसका हल खोज रहे हैं. वो पौधों और जानवरों के मल से ऊर्जा बना रहे हैं. नई तकनीक थर्मल केमिकल कनवर्जन पर आधारित है, ये बायो कचरे को ऊर्जा और ऊष्मा में बदलती है. हर तरह के ठोस और तरल कचरे को कच्चे माल की तरह इस्तेमाल किया जा सकता है. अगर वो दाने की शक्ल में हो तो ढुलाई भी आसान होगी.

फ्राउनहोफर इंस्टीट्यूट के आंद्रेयास हॉरनुंग कहते हैं, "महत्वपूर्ण है कि हम बहुत बड़े आकार वाले जैविक मैटीरियल का इस्तेमाल नहीं करते जिसे इसके लिए खासकर उपजाया जाए. हम सीवेज प्लांट और बायो गैस प्लांट में बचे कचरे और गाय या सुअर के मल का इस्तेमाल करते हैं. और इसे खेती के बाद बचे भूसे या झाड़ में मिला दिया जाता है." प्लांट सब कुछ निगल सकता है. आम कचरे से मोटर फ्रेंडली ऑयल, ज्वलनशील गैस, बायोकोल बनता है, इसका इस्तेमाल बिजली और ईंधन के रूप में किया जा सकता है.

हॉरनुंग के मुताबिक ऑयल को मोटर में इस्तेमाल किया जा सकता है, गैस को दहन इंजिनों में. इससे आप हाइड्रोजन भी निकाल सकते हैं, हाइड्रेट के रूप में, केमिकल उद्योग के लिए. और कोयले को ईंधन के रूप में इस्तेमाल किया जा सकता है, स्टोर किया जा सकता है, इसका खेती में इस्तेमाल हो सकता है.

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जैविक कचरा लॉक के जरिए एक स्क्रू रिएक्टर में जाता है, वहां 500 डिग्री सेल्सियस पर वह बिना ऑक्सीजन के जलता है, इससे भाप और बायोकोल बनता है. अगले चरण में बायोकोल और भाप को रिफाइन किया जाता है. ठंडी होने पर भाप बायो ऑयल, प्रोसेस्ड पानी और बायो गैस में बदलती है. बायोकोल में पौधों के लिए जरूरी पोषक तत्व कार्बन होता है, ये फॉस्फेट, नाइट्रोजन और पोटेशियम जितना ही जरूरी है. यानी बढ़िया खाद. इसका खेती में कई तरह से इस्तेमाल किया जा सकता है.

हॉरनुंग बताते हैं कि इस कोक का इस्तेमाल मिट्टी की क्वालिटी बेहतर करने के लिए भी किया जा सकता है. हमारे कोक के भारत में हुए शुरुआती परीक्षणों में देखा गया है कि इससे प्याज और शिमला मिर्ज की पैदावार बढ़ा सकते हैं. लेकिन इन देशों में ज्यादा पैदावार के बदले कम उतने ही फसल के लिए कम पानी का इस्तेमाल अहम है.

नई बायो एनर्जी तकनीक ऊर्जा के लिए भूखे देशों के काफी काम आ सकती है. बायोमास का इकोफ्रेंडली इस्तेमाल. प्लांट का थर्मल कनर्वजन प्रोसेस शोर और बायो कचरे से निपटने का कारगर तरीका हो सकता है. हॉरनुंग कहते हैं, "सिर्फ उत्तर भारत में ही पूरे जर्मनी के मुकाबले दो फसलों के दरम्यान ज्यादा बायो वेस्ट मिलता है. यह एक संभावना है. हम भारत, ब्राजील और अफ्रीका में बड़ी संभावना देखते हैं कि कम से कम 30 किलोवॉट बिजली बनाने वाली इस तकनीक का इस्तेमाल किया जा सकता है, छोटे मोहल्लों के 10 से 30 घरों से लेकर छोटे गांवों या शहरों में बिजली देने के लिए."

प्लांट उच्च क्षमता वाला ऑयल और गैस भी बनाता है, जेनरेटर के जरिए इनका इस्तेमाल बिजली बनाने और घर के हीटिंग सिस्टम के लिए किया जा सकता है. कॉम्पैक्ट डिजाइन के चलते ये एक छोटी सी जगह में भी बिजली बना सकता है. नई तकनीक पर्यावरण को नुकसान पहुंचाए बिना बिजली बनाती है. सौर और पवन ऊर्जा के वोल्टेज में आने वाले उतार-चढ़ाव को भी बायो वेस्ट से बनी बिजली से संतुलित किया जा सकता है.

रिपोर्ट: मार्टिन रीबे/ओएसजे

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