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मनोरंजन

"कंफ्यूज हैं भारतीय मर्द"

भारत के पितृसत्तात्मक समाज को समझ पाने में भारतीय मर्द पूरी तरह कामयाब नहीं हो पाते हैं क्योंकि वे कंफ्यूज हैं. यह मानना है बॉलीवुड निर्देशक कानू बहल का, जो कान फिल्म फेस्टिवल में पहुंचे हैं.

पहली बार किसी फिल्म का निर्देशन करने वाले बहल कहते हैं, "हम जिस दौर में रह रहे हैं, वह भारतीय पुरुषों के लिए असमंजस का काल है क्योंकि वह पितृसत्तात्मक समाज में रहने का आदी हो चुका है. वह हमेशा ज्यादा प्रखर रहा है, वही परिवार के लिए रोजी रोटी कमाने वाला है. उसे लगता है कि पत्नी के कुछ सीमित काम होते हैं. और अचानक से उसके आस पास की पूरी दुनिया बदल गई है."

बहल ने तितली फिल्म का निर्देशन किया है, जिसमें एक युवा अपराधी की कहानी है. वह अपने परिवार के दबाव की वजह से घर छोड़ कर भाग जाता है. उसका बड़ा भाई विक्रम एक शॉपिंग मॉल में गार्ड की नौकरी करता है. यह फिल्म कान फिल्म फेस्टिवल में युवा टैलेंटेड फिल्मकारों की फिल्म के साथ दिखाई गई.

उनका कहना है कि फिल्म की कहानी पर दिसंबर, 2012 में दिल्ली बलात्कार कांड का भी असर पड़ा. बहल कहते हैं कि इसके बाद उन्होंने सोचना शुरू किया कि ऐसी हिंसा कहां से शुरू होती है. उन्होंने साथी कहानीकार शरत कटारिया के साथ मिल कर अपनी फिल्म की स्क्रिप्ट तैयार की, जिसमें शॉपिंग मॉल की कहानी भी है. इसे वह 'आग उगलने वाला ड्रैगन' कहते हैं. वह कहते हैं कि यहां काम करने वाला गार्ड दिन के आठ घंटे चमक दमक वाली दुनिया देखता है और उसके बाद अपने झोंपड़े में पहुंच जाता है, "गुस्सा बढ़ता जाता है क्योंकि वह यह सब अपने लिए भी चाहता है."

कान फिल्म फेस्टिवल का भारत के बॉलीवुड से लंबा नाता रहा है. पिछले साल भारतीय फिल्मों की सदी पूरी होने पर अमिताभ बच्चन भी कान पहुंचे थे और उन्होंने उद्घाटन भाषण के दौरान हिन्दी में अपनी बात कही थी. भारतीय अभिनेत्री ऐश्वर्या राय लगातार 13 साल से कान जा रही हैं, जबकि पिछले साल रितेश बत्रा की लंच बॉक्स फिल्म की काफी चर्चा रही थी.

एजेए/एएम (एएफपी)

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