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दुनिया

औलाद की उम्मीद बांधता कोलकाता

पश्चिम बंगाल की राजधानी कोलकाता भारत ही नहीं बल्कि विदेशों में भी टेस्ट ट्यूब बेबी के सबसे प्रमुख केंद्र के तौर पर उभर रहा है. उसकी वजह यह है कि यह महानगर टेस्ट ट्यूब तकनीक का अगुवा रहा है.

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70 के दशक के आखिर में डॉ.सुभाष मुखर्जी ने यहां इस तकनीक पर काम शुरू किया था. उनके निधन के बाद उनके दो सहयोगियों डॉ.सुदर्शन घोष दस्तीदार और डॉ. बीएन चक्रवर्ती ने इस शोध को आगे बढ़ाया. ब्रिटेन में जब 1978 में पहली बार टेस्ट ट्यूब बेबी का जन्म हुआ तो 1986 में कोलकाता में भी ऐसे ही प्रयोग से पैदा शिशु की किलकारियां गूंज उठीं.

अभिशाप नहीं बीमारी

देश के कई इलाकों में संतान नहीं होने को अब भी अभिशाप समझा जाता है और इसके लिए महिलाओं को ही दोषी ठहराया जाता है. डॉ. सुभाष मुखर्जी के सहयोगी और महानगर स्थित घोष दस्तीदार इंस्टीट्यूट फॉर फर्टिलिटी रिसर्च के निदेशक डॉ. सुदर्शन घोष दस्तीदार कहते हैं कि बांझपन के लिए सिर्फ महिलाएं ही जिम्मेदार नहीं हैं. यह बीमारी पुरुषों को भी हो सकती है. और यह कोई अभिशाप नहीं, बल्कि एक बीमारी है जिसका इलाज संभव है.

Retortenbaby Louise Brown

दुनिया का पहला टेस्ट ट्यूब बेबी

देश विदेश से

डॉ.घोष दस्तीदार कृत्रिम गर्भाधान पर केंद्र सरकार की विशेषज्ञ समिति के अलावा यूरोपियन सोसायटी फॉर ह्यूमन रिप्रोडक्शन की ओर से गठित कार्यबल के भी सदस्य हैं. वे बताते हैं कि विदेशों में कई जगह सरोगेट मदर को कानूनी मान्यता नहीं मिलने की वजह से वहां से काफी तादाद में लोग यहां आते हैं. इसके अलावा यहां कृत्रिम गर्भाधान की दर दूसरे देशों और भारत के दूसरे शहरों के मुकाबले ज्यादा है. दूसरी जगहों के मुकाबले कोलकाता में इलाज भी सस्ता है.

महानगर के विशेषज्ञों की राय में अब आईवीएफ (इन विट्रो फर्टिलाइजेशन) यानी टेस्ट ट्यूब तकनीक से बच्चे पैदा करने के लिए भी काफी तादाद में विकसित देशों के लोग कोलकाता आ रहे हैं. यह हेल्थ टूरिज्म यानी स्वास्थ्य पर्यटन का नया पहलू है.भारतीय व खासकर कोलकाता के चिकित्सकों और उनकी काबिलियत के प्रति विदेशियों में विश्वास बढ़ा है. इसके अलावा विदेशों के मुकाबले यह तकनीक यहां बेहद सस्ती है.

कोलकाता सस्ता

विदेशों में जहां आईवीएफ के जरिए कृत्रिम गर्भाधान में दस हजार डालर का खर्च आता है, वहीं कोलकाता में यह खर्च सिर्फ 1800 डालर है. यानी पांचवें हिस्से से भी कम. श्रावणी बसु ने शादी के बाद अमेरिका तक में अपना इलाज कराया था. लेकिन उनको कामयाबी नहीं मिली. अब वे घर में नन्हें कदमों का इंतज़ार कर रही हां. वे कहती हैं कि मैं बेहद खुश हूं. जो विदेश में नहीं मिला वह कोलकाता ने मुझे दे दिया.

परेशान लोग

मरीजों की काउंसिलिंग करने वाले डॉ. विश्वनाथ बताते हैं कि कोलकाता टेस्ट ट्यूब तकनीक का अगुवा है. इलाज के लिए यहां आने वाले लोग सामाजिक मान्यताओं के चलते बेहद निराश और हताश रहते हैं. वे हर हाल में बच्चा चाहते हैं. कई मरीज तो गहरे मानसिक अवसाद की हालत में होते हैं.

झरखंड में पलामू से आए रामदेव साहू कहते हैं कि यहां इलाज बढ़िया है. हमें पहली ही बार में कामयाबी मिल गई है. बिहार के गया जिले से आने वाली बसंती देवी शादी के दस साल बाद पहली बार मां बनने वाली हैं. उनकी बातों से ही खुशी झलकती है.

कोलकाता में बच्चों का सपना लिए आने वाले देशी विदेशी मरीजों की तादाद लगातार बढ़ती ही जा रही है. डॉ. घोष दस्तीदार ने बताया कि अब विश्व बैंक समेत कई संगठन विकासशील देशों में कम खर्च में आईवीएफ तकनीक को बढ़ावा देने वाली योजनाओं को सहायता देने में दिलचस्पी ले रहे हैं. उनका प्रस्ताव है कि धनी लोगों से तो पूरी रकम ली जाए. लेकिन गरीबों के लिए संबंधित उपकरणों के आयात में तमाम करों में छूट दी जाए.

कुछ तथ्य

भारत में करीब तीन से चार करोड़ दंपत्ति संतानहीन हैं.

देश के दूसरे शहरों के मुकाबले यहां आईवीएफ समेत दूसरे तरीकों से होने वाले कृत्रिम गर्भाधान की कामयाबी दर बेहतर. 50 से 70 फीसदी तक. विदेशों में यह 30 से 40 फीसदी.

कोलकाता में खाना-पीना और रहना दूसरे शहरों के मुकाबले सस्ता है.यह महानगर पूरे दक्षिण एशिया का हब है.

रिपोर्टः प्रभाकर मणि तिवारी, कोलकाता, (संपादनः आभा एम)

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