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ब्लॉग

और सघन हुए अभिव्यक्ति की आजादी पर मंडराते खतरे

तमिलनाडु के मुख्यमंत्री का कार्टून बनाने पर कार्टूनिस्ट जी बाला के खिलाफ कानूनी कार्रवाई हुई. कुछ दिनों बाद उन्हें जमानत मिल गई लेकिन इसने अभिव्यक्ति की आजादी पर बढ़ते खतरों का संकेत तो दिया ही है.

यह खतरा सिर्फ सरकारों की ओर से ही नहीं है. कुछ दिनों पहले पीएम की मिमिक्री करने वाले एक हास्य कलाकार की प्रस्तुति ही रोक दी गई थी. अभिव्यक्ति की आजादी के अधिकार पर अब नई टकराहटें सामने आ रही हैं. कांचा इलैया जैसे दलित लेखक हों या कमल हासन जैसे कलाकार, बोलने पर खतरा बढ़ता ही जा रहा है.

भारतीय संविधान के निर्माण के दौरान संविधान सभा में हुई बहसों में ‘विचार और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को नागरिक स्वतंत्रताओं की आधार रेखा' कहा गया है. संविधान की धारा 19(1) जिन छह मौलिक अधिकारों का प्रावधान करती है उनमें विचार और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का पहला स्थान है. अन्य मौलिक अधिकारों की ही तरह विचार और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता भी आत्यांतिक और अनियंत्रित नहीं है. विचार और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर युक्तियुक्त सीमाएं इन बातों के आधार पर लगायी जा सकती हैं- 1)मानहानि, 2)न्यायालय की अवमानना, 3)शिष्टाचार या सदाचार, 4)राज्य की सुरक्षा, 5)दूसरे देशों के साथ मैत्रीपूर्ण संबंधों, 6)अपराध के लिये उकसावा, 7)सार्वजनिक व्यवस्था, नैतिकता और 8) भारत की संप्रभुता और अखंडता.

सुप्रीम कोर्ट ने विचार और अभिव्यक्ति के इस मूल अधिकार को ‘लोकतंत्र के राजीनामे का मेहराब' कहा है क्योंकि लोकतंत्र की नींव ही असहमति के साहस और सहमति के विवेक पर निर्भर है. लेकिन आजादी के इन सत्तर वर्षों में विचार और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, युक्तियुक्त निर्बन्धनों और राजद्रोह और मानहानि आदि को लेकर विवाद होते रहे और नागरिकों, विधायिका और कार्यपालिका के साथ लेकर निरंतर एक टकराव की स्थिति बनी रहती है. 2012 में, कार्टूनिस्ट असीम त्रिवेदी की गिरफ्तारी से लेकर 2016 में जेएनयू में कथित रूप से भारत विरोधी नारे लगाने के आरोप में छात्र नेता कन्हैया कुमार की गिरफ्तारी तक अभिव्यक्ति की आजादी के दमन की कई घटनाएं हो चुकी हैं. राजद्रोह के अलावा मानहानि के मामलों को लेकर भी विवाद रहा है. बिल्कुल हाल के दिनों में वेब पत्रिका द वायर की कुछ खबरों पर राजनीति और उद्योग जगत के लोगों की ओर से न सिर्फ एतराज उठाए गए बल्कि मानहानि के भारीभरकम मुकदमे तक ठोक दिए गए.

Indien Festnahme Zeichner Aseem Trivedi (AP)

कार्टूनिस्ट असीम त्रिवेदी

भारत की एक चर्चित समाचार वेबसाइट और मीडिया वॉचडॉग द हूट ने अपनी 2017 की सालाना रिपोर्ट में पाया है कि 2016 से लेकर 2017 की पहली तिमाही तक 50 से ज्यादा पत्रकारों पर हमले की घटनाओं का उल्लेख किया है. द हूट के मुताबिक 2016 में 31 बार इंटरनेट बंद किया गया और 2017 के पहले छह महीनों में 14 बार. 2016 में अदालतें अभिव्यक्ति की आजादी के सवालों पर माथापच्ची को लेकर लगातार व्यस्त रहीं. राजद्रोह, मानहानि और फिल्म और अन्य कलाओं की सेंसरशिप के मामलों में पिछले साल रिकॉर्ड बढोतरी देखी गई. रिपोर्टर्स विदाउट बॉर्डर्स नाम की संस्था द्वारा प्रकाशित द वर्ल्ड प्रेस फ्रीडम इंडेक्स में भारत पूरी दुनिया मे 136वें स्थान पर है. ये सूचकांक तो प्रेस पर बढ़ते हमलों को लेकर है, अगर इसमें अन्य रचनात्मक गतिविधियों जैसे कार्टून, चित्र, कला, साहित्य, नृत्य आदि को भी जोड़ दिया जाए तो भारत में अभिव्यक्ति के दमन का ग्राफ चिंताजनक ही नजर आता है. और ये सिलसिला बढ़ता ही जाता है. चाहे वो कोई खबर हो या कोई कार्टून या कोई चित्र या कोई टिप्पणी. प्रख्यात अभिनेता कमल हासन की हिंदू आतंकवाद को लेकर की गई टिप्पणी पर कानूनी कार्रवाई तो छोड़ ही दीजिए उन्हें तो सीधे सीधे मार डालने का फतवा देने वाले स्वर भी पुरजोर हो चले हैं. ये एक भयावह स्थिति है.

अगर वैचारिक असहिष्णुता पर अंकुश नहीं लगाया गया तो इसका अंजाम सेल्फ सेंसरशिप होगा जो कि बहुत ही दुर्भाग्यपूर्ण है. विचार और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के ऐसे अतिक्रमण के दूरगामी दुष्परिणाम हो सकते हैं. इस बुनियादी फर्क पर ध्यान देना जरूरी है कि विचार और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता भारत की आजादी के बाद बना संवैधानिक प्रावधान है और उसे संविधान का संरक्षण प्राप्त है. मानवाधिकार संगठन ह्यूमन राइट्स वॉच ने भारत सरकार के लिये इस संबंध में कुछ सुझाव और सिफारिशें दी हैं. ऐसे भारतीय कानून जिनका उपयोग करके शांतिपूर्ण अभिव्यक्ति को भी अपराध ठहराया जाता है वे सरकार के अंतरराष्ट्रीय कानूनी उत्तरदायित्वों के विरुद्ध हैं. और चूंकि अभिव्यक्ति की आजादी दूसरे अधिकारों की बुनियाद है इसलिये ये मानवाधिकारों की रक्षा में भी बाधक हैं. सरकार को चाहिए कि वो इन कानूनों को रद्द करने या उनमें अपेक्षित संशोधन करने के लिए प्रयास करे और अगर संशोधन किया जाता है तो इसके लिए नागरिक संगठनों के साथ पारदर्शी और सार्वजनिक विचार-विमर्श किया जाए. उन सभी मुकदमों को वापस लिया जाए और सभी जांचों पर रोक लगा दी जाए जो शांतिपूर्ण अभिव्यक्ति या शांतिपूर्ण संगठन से जुड़े हैं.

पुलिस को इस बात के लिये जरूरी प्रशिक्षण दिया जाए कि अदालतों में अनुचित मामले दर्ज नहीं किये जाएं. जजों को खासतौर पर निचली अदालतों के जजों को शांतिपूर्ण अभिव्यक्तियों और उनके कथित हनन को लेकर लगी धाराओं से संबद्ध फर्क बताया जाए और प्रशिक्षित किया जाए ताकि वे ऐसे मामले खारिज कर दें जो विचार और अभिव्यक्ति के मौलिक अधिकार के विरुद्ध हों. राजनीतिक दलो और उनके आनुषंगिक संगठनों को संवेदनशीलता और सहिष्णुता बरतने की हिदायत दी जाए. राजनीतिक दल अपने भीतर इस तरह के प्रोग्राम विकसित करें और अपने कैडर को अनुशासित बनाएं. विकास के लिए समाज में बहस का माहौल बनाया जाना हर हाल में जरूरी है लेकिन ये अतिरंजना का शिकार न हो.

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