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जर्मन चुनाव

और नहीं टल सकता अयोध्या का फैसला

अयोध्या मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले को टालने की अपील खारिज करने के पीछे अदालत की अपनी मजबूरी भी है. हालांकि अदालत ने समझौते की कोई उम्मीद न देख याचिका खारिज की है.

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इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच ने फैसले को टालने की रमेश चंद्र त्रिपाठी की मांग को न सिर्फ खारिज कर दिया बल्कि व्यर्थ में याचिका दायर करने के एवज में उन पर भारी जुर्माना भी लगाया है. महज आठ मिनट की सुनवाई के बाद तीन जजों की खंडपीठ के इस फैसले से अदालत के सख्त रुख को साफ समझा जा सकता है.

अदालत 60 साल से चल रहे इस मामले को अब टालने के कतई मूड में नहीं है. इलाहाबाद हाईकोर्ट 24 सितंबर को अयोध्या में रामजन्म भूमि और बाबरी मस्जिद में से किसी एक के वजूद को साबित करने वाला फैसला सुनाएगी. इस फैसले को टालने के लिए त्रिपाठी ने लखनऊ बेंच में सीआरपीसी की धारा 89 के तहत याचिका दायर की थी. इसके तहत दोनों पक्षकार आपसी सहमति से विवाद को सुलझाने की अनुमति देने की अदालत से मांग कर सकते हैं.

अदालत ने सभी पक्षकारों को इस पर सहमति कायम करने के लिए तीन दिन का समय दिया. इस पर किसी तरह की आमराय बनते न देख याचिका को आज खारिज कर दिया और कहा कि याचिकाकर्ता सस्ती लोकप्रियता पाने के लिए यह सब कर रहे हैं.

यह तो हुआ याचिका को खारिज करने का कानूनी आधार. इसके अलावा याचिका स्वीकार न करने की अदालत की कुछ प्रक्रियागत मजबूरी भी हैं. इसे स्वीकार करने पर इलाहाबाद हाईकोर्ट का फैसला अनिश्चितकाल के लिए टालना पड़ जाता. लेकिन अदालत के नियमों की वजह से यह मुमकिन नहीं है.

कारण यह है कि खंडपीठ के एक जज न्यायाधीश धर्मवीर शर्मा एक अक्टूबर को सेवानिवृत्त हो रहे हैं. नियमों के मुताबिक फैसला सुनाने वाली खंडपीठ में उन सभी जजों का मौजूद होना जरूरी है जिन्होंने सुनवाई की है. किसी जज के रिटायर होने पर नई खंडपीठ का गठन होता है और रिटायर हो चुके जज द्वारा की गई सुनवाई को दोबारा नए सिरे से करना जरुरी हो जाता.

इसलिए पहले से ही काफी समय बीत जाने के कारण अदालत और समय बर्बाद करने का जोखिम नहीं लेना चाहती. अदालत ने याचिका में इस फैसले के कारण कॉमनवेल्थ खेल और कश्मीर सहित अन्य इलाकों में तनावपूर्ण हालात का हवाला देकर देश भर में कानून व्यवस्था का संकट पैदा हो जाने की दलील को भी खारिज कर दिया.

रिपोर्टः निर्मल यादव

संपादनः ओ सिंह

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