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दुनिया

और ज्यादा किसान आत्महत्या करने लगे हैं

मोदी सरकार के राज में किसानों की आत्महत्या रुकने की बजाय और बढ़ गयी है. पांच साल में किसानों की आय दोगुनी करने के दावों के बीच किसानों की बदहाली की एक बेहद चिंताजनक तस्वीर सामने आयी है.

राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो यानी एनसीआरबी की ताजा रिपोर्ट के अनुसार किसानों में आत्महत्या की प्रवृत्ति बढ़ी है. एनसीआरबी ने खुलासा किया है कि वर्ष 2015 में 12,602 किसानों और कृषि मजदूरों ने आत्महत्या की. किसानों की आत्महत्या में लगभग 42 प्रतिशत की चिंताजनक वृद्धि हुई है.

आत्महत्या की बढ़ती प्रवृत्ति

‘एक्सीडेंटल डेथ एंड सुसाइड इन इंडिया' शीर्षक से प्रकाशित एनसीआरबी की इस रिपोर्ट के अनुसार 2014 में जहां आत्महत्या करने वाले किसानों की संख्या 5,650 और कृषि मजदूरों की संख्या 6,710 थी, वहीं 2015 में 8,007 किसानों ने जबकि चार 4 हजार 595 कृषि मजदूरों ने मौत को गले लगा लिया. किसान आत्महत्या के मामले में एक साल में 42 प्रतिशत की चिंताजनक वृद्धि हुई है. वैसे, मजदूरों की आत्महत्या की दर में लगभग 31 फीसदी की गिरावट दर्ज की गई है. विदर्भ जन आन्दोलन समिति के किशोर तिवारी का कहना है कि आत्महत्या के आंकड़े इसलिए बढ़े हुए दिख रहे हैं क्योंकि कुछ राज्य पहले इसकी रिपोर्ट ही नहीं करते थे.

सर्वाधिक मामले महाराष्ट्र में

हर रोज देश के लगभग 35 किसान आत्महत्या करते हैं. इस मामले में महाराष्ट्र सबसे आगे है, यहां से आत्महत्या के सर्वाधिक मामले दर्ज किए गए. 2015 में 3,030 किसानों ने आत्महत्या की. इसके बाद तेलंगाना में 1,358 और कर्नाटक में 1,197 किसानों ने खुदकुशी की. छत्तीसगढ़ जैसे राज्य में भी 854 किसानों ने जिंदगी के बदले मौत को चुना. मध्यप्रदेश और आंध्र प्रदेश से भी कई किसानों ने आत्महत्या का रास्ता चुना. खेतिहर मजदूरों के आत्महत्या के मामले में भी महाराष्ट्र सबसे आगे हैं यहाँ 1261 लोगों ने आत्महत्या की.

जम्मू-कश्मीर, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, बिहार, झारखंड और पश्चिम बंगाल, मिजोरम, नागालैंड और गोवा उन राज्यों में शामिल हैं जहां किसान आत्महत्या का एक भी मामला दर्ज नहीं किया गया.

कर्ज के बोझ से दबे किसान 

किसानों की आत्महत्या का विश्लेषण करते हुए एनसीआरबी रिपोर्ट में आत्महत्या के कारणों का ब्यौरा दिया गया है. रिपोर्ट में किसानों की आत्महत्या के लिए बैंकों और माइक्रो फाइनेंस को जिम्मेदार माना गया हैं. देशभर में 3000 से अधिक किसानों, लगभग 80 फीसदी ने कर्ज की वजह से आत्महत्या की. यह आंकड़ा इसलिए भी महतवपूर्ण है क्योंकि अब तक यही माना जाता था कि किसान महाजनों से लिए कर्ज और उनके उत्पीड़न के चलते आत्महत्या करता है. किसान नेता किशोर तिवारी के अनुसार अधिकतर किसानों की आत्महत्या के पीछे मूल रूप से ऋणग्रस्तता ही कारण रहा है.

कृषि संबंधित मामले जैसे फसलों की उपज में कमी भी आत्महत्या के लिए जिम्मेदार कारक के रूप में सामने आया है. रिपोर्ट के अनुसार खेती करने वाले मजदूरों में आत्महत्या के लिए बीमारी और पारिवारिक समस्या भी प्रमुख कारण के रूप में सामने आये हैं.

छोटे किसानों पर मार

ताजा आंकड़े इशारा करते हैं कि आत्महत्या करने वाले कुल किसानों में से 70 प्रतिशत से अधिक संख्या उन गरीब किसानों की है, जिनके पास दो हेक्टेयर से भी कम जमीन है. लगातार बढ़ती महंगाई, कर्ज का बढ़ता बोझ, और फसल की अनिश्चितता इन किसानों के लिए दुख का कारण बनता जा रहा है. लातूर जिले के निलंगा के नागनाथ पाटिल कहते हैं कि उनके क्षेत्र में फसल बर्बाद होने के चलते दो किसानों ने आत्महत्या कर ली. पेशे से खुद किसान नागनाथ कहते हैं, "कभी सूखा और बारिश से फसल की बर्बादी होती है और गरीब किसानों के पास आत्महत्या जैसा कदम उठाने के आलावा कोई चारा नहीं बचता.”

आमदनी बढ़ाने पर हो जोर

लातूर जिले के शिरूर पंचायत समिति के सदस्य और पेशे से किसान भीमराव सांगवे का कहना है कि अगर छोटे और मझोले किसानों की फसल को सरकार 50 फीसदी लाभ देकर खरीद ले तो आत्महत्या की समस्या समाप्त हो सकती है. जलगांव के यशानंद पाटिल कहते हैं कि किसानों की आमदनी बढ़ नहीं पा रही है जिससे छोटे किसान परेशान हैं. उनका कहना है कि आत्महत्या की तात्कालिक वजह कुछ भी हो लेकिन गरीबी ही मूल वजह है. जानकार भी मानते हैं कि सरकार की किसान कल्याण की तमाम योजनाओं का उचित लाभ छोटे किसानों को नहीं मिल पाता. बेहतर कृषि प्रबंधन के ज़रिये सरकार ऐसी योजनाओं को लागू करा कर आत्महत्याओं को रोक सकती है.


 

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