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दुनिया

औपनिवेशक विरासत समेटे है कालिम्पोंग

कभी सिक्किम और भूटान के अधीन रहे पश्चिम बंगाल के पर्वतीय शहर कालिम्पोंग को इस सप्ताह जिले का दर्जा मिल गया. लेकिन अब विकास के साथ एक दबे आंदोलन के सुलगने की संभावनाएं भी हैं.

दार्जिलिंग जिले का एक सबडिवीजन रहा कालिम्पोंग संभवतः आजादी के बाद जिले का दर्जा पाने वाले पूर्वी भारत का पहला पहाड़ी शहर है. मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने इसे मंगलवार को राज्य का 21वां जिला बना दिया. लेकिन इससे जहां इलाके में विकास की गति तेज होने की संभावना है वहीं दूसरी ओर इस मुद्दे पर राज्य सरकार और अब पर्वतीय इलाके में निरंकुश शासन करने वाले दार्जिलिंग गोरखा मोर्चा में टकराव बढ़ने के भी आसार हैं.

ममता बनर्जी ने कालिम्पोंग में आयोजित एक समारोह में इसे औपचारिक रूप से जिले का दर्जा देने का एलान किया. इसके साथ ही उन्होंने इलाके की अर्थव्यवस्था की रीढ़ रहे पर्यटन उद्योग को बड़े पैमाने पर बढ़ावा देने के लिए कई परियोजनाओं का भी एलान किया है. यह इलाका चाय और अदरक की खेती के अलावा अपनी औपनिवेशिक विरासतों लिए तो मशहूर है ही, तिब्बत के साथ व्यापार के पुराने सिल्क रूट पर होने और की वजह से इतिहास में इसकी खास जगह है. उस दौर में यह ऊन समेत कई वस्तुओं के कारोबार का अहम केंद्र था. ममता ने अब उन पुराने स्वर्णिम दिनों को वापस लाने का भरोसा दिया है. दूसरी ओर, गोरखालैंड टेरीटोरियल एडमिनिस्ट्रेशन (जीटीए) के जरिए इलाके पर राज करने वाले गोरखा मोर्चा को यह अपने अधिकार क्षेत्र के अतिक्रमण लग रहा है. यही वजह है कि मोर्चा अध्यक्ष विमल गुरुंग ने यहां आयोजित समारोह में शिरकत नहीं की.

समृद्धइतिहास

अब तक यह छोटा-सा पहाड़ी शहर भले ज्यादा मशहूर नहीं हो, लेकिन अपने-आप में एक समृद्ध इतिहास समेटे है. अठारहवीं सदी की शुरूआत तक यह सिक्किम का हिस्सा था. लेकिन वर्ष 1706 में भूटान ने सिक्किम के राजा से युद्ध में यह इलाका छीन लिया और इसका नाम कालिम्पोंग रखा. वर्ष 1864 के ब्रिटिश-भूटान युद्ध के बाद अगले साल हुए सिन्चुला करार के तहत यह ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी का हिस्सा बना. इस शहर को अपना मौजूदा नाम कैसे मिला, इस बारे में कई कहानियां हैं. लेकिन यह तय है कि शुरूआत में इसका नाम कालेनपुंग था जो बाद में धीरे-धीरे कालेबुंग और फिर कालिम्पोंग हो गया.

Häuser in Mungpo (Sirsho Bandopadhyay)

इस घर में रबींद्रनाथ टैगोर कई बार ठहरे

अंग्रेजों ने इस पर कब्जा जमाने के बाद आदर्श भौगोलिक स्थिति की वजह से दार्जिलिंग के वैकल्पिक पर्वतीय पर्यटन केंद्र को तौर पर इसे विकसित किया. नाथुला और जेलप-ला दर्रे से नजदीकी और पुराने सिल्क रूट से सटे होने की वजह से जल्दी ही यह शहर भारत व तिब्बत के बीच फर, ऊन और खाद्यान्नों के एक महत्वपूर्ण व्यापार केंद्र के तौर पर उभरा. कारोबारी गतिविधियां तेज होने की वजह से नेपाल से बड़ी तादाद में लोग आकर यहां बसने लगे. धीरे-धीरे स्कॉटिश मिशनरियां भी यहां पहुंचने लगीं और वर्ष 1870 में इलाके में पहला स्कूल खुला. वर्ष 1886 में स्कॉटिश यूनिवर्सिटी मिशन इंस्टीट्यूशन की स्थापना हुई और धीरे-धीरे यह शहर शिक्षा के अहम केंद्र के तौर पर मशहूर हो गया. पूर्वी व पूर्वोत्तर भारत के तमाम राज्यों से छात्र यहां पहुंचने लगे. यही वजह थी कि वर्ष 1865 में भारत का हिस्सा बनते समय इलाके में जहां महज दो या तीन परिवार थे, वहीं वर्ष 1911 में इस शहर की आबादी बढ़ कर 7,880 तक पहुंच गई.

आजादी के बाद यह पश्चिम बंगाल का हिस्सा बना. वर्ष 1959 में तिब्बत पर चीन के कब्जे के बाद तिब्बत से भाग कर यहां पहुंचने वाले कई बौद्ध भिक्षुओं ने मठों की स्थापना की. वर्ष 1962 के भारत-चीन युद्ध के बाद जेलेप-ला दर्रे के स्थायी तौर पर बंद होने की वजह से सीमा व्यापार ठप हो गया और इलाके की अर्थव्यवस्था कमजोर होने लगी.

Indien neue Stadtverwaltung Kalimpong (DW/P. Mani Tiwari)

जश्न मनाते स्थानीय लोग

विकासयोजनाएं

इस शहर की ज्यादातर इमारतों पर ब्रिटिश स्थापत्य कला की छाप साफ नजर आती है. ज्यादातर इमारतें उसी दौर की हैं. फिलहाल इलाके की अर्थव्यवस्था काफी हद तक पर्यटन पर निर्भर है. अब जिले का दर्जा मिलने के बाद इलाके में विकास की गति तेज होने की संभावना है. इलाके की बौद्ध आबादी को ध्यान में रखते हुए ममता ने बुद्ध पूर्णिमा पर सरकारी छुट्टी देने का एलान किया है. पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए उन्होंने नई सड़क परियोजनाओं के साथ ही इलाके के लाभा, लोलेगांव, सेलरी और मंगपंग जैसे पर्यटन केंद्रों को विकसित करने का भरोसा दिया है. मुख्यमंत्री ने कालिम्पोंग को पुराने सिल्क रूट के जरिए सिक्किम से जोड़ने के लिए 220 करोड़ की एक सड़क परियोजना का भी एलान किया है. उन्होंने शहर के बीचोबीच स्थित जेल को दूसरी जगह शिफ्ट कर उस इमारत का जीर्णोद्धार कर उसे पर्यटकों के लिए खोलने की योजना बनाई है. ममता कहती हैं, "जेल की यह इमारत शहर के बीचोबीच है जहां से कंचनजंघा पहाड़ियों का बेहतरीन नजारा देखा जा सकता है. यह पर्यटकों में काफी लोकप्रिय होगा." मुख्यमंत्री ने दार्जिलिंग की माल रोड की तर्ज पर कालिम्पोंग में भी एक माल रोड विकसित करने की योजना बनाई है. दार्जिलिंग की माल रोड पर्यटकों में काफी लोकप्रिय है.

नए जिले का दर्जा मिलते ही शहर के लोग खुशी से झूम उठे. उन्होंने नाच-गाकर और होली से पहले ही होली मना कर अपनी खुशियां जताईं. कालिम्पोंग के पूर्व विधायक हरका बहादुर छेत्री कहते हैं, "हमारी दशकों पुरानी मांग पूरी हो गई है. अब इलाके में विकास की गति तेज होने की उम्मीद है."

Häuser in Mungpo (Sirsho Bandopadhyay)

वादियों में आज भी ब्रिटिश काल की कई इमारतें

राजनीतिकटकराव

लेकिन सरकार के इस फैसले से पर्वतीय क्षेत्र में राजनीतिक टकराव तेज होने का अंदेशा है. अलग गोरखालैंड राज्य के गठन की मांग में दार्जिलिंग पर्वतीय क्षेत्र दो-दो बार लंबे आंदोलन का गवाह रह चुका है. अस्सी के दशक में गोरखा नेशनल लिबरेशन फ्रंट (जीएनएलएफ) प्रमुख सुभाष घीसिंग के लंबे आंदोलन के बाद दार्जिलिंग गोरखा पर्वतीय परिषद का गठन किया था. बाद में विमल गुरुंग की अगुवाई वाले गोरखा जनमुक्ति मोर्चा के साथ समझौते के तहत गोरखालैंड टेरीटोरियल एडमिनिस्ट्रेशन (जीटीए) का गठन किया गया.

मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने गोरखालैंड की आवाज को दबाने में काफी हद तक कामयाबी हासिल की है. लेकिन अब दार्जिलिंग से काट कर कालिम्पोंग को जिले का दर्जा देने की स्थिति में मोर्चा प्रमुख विमल गुरुंग एक बार फिर आंदोलन की राह पर उतर सकते हैं. उन्होंने पहले ही जीटीए से सलाह-मशविरा किए बिना नए जिले के गठन के खिलाफ आंदोलन की बात कही है. दार्जिलिंग के गोरखा मोर्चा विधायक अमर सिंह राई कहते हैं, "कालिम्पोंग को अलग जिले का दर्जा देना एक बेहतर कदम है. लेकिन इससे पहले सरकार को जीटीए समेत तमाम संबधित पक्षों से सलाह-मशविरा करना चाहिए था. सरकार ने ऐसा नहीं किया. नतीजतन अब जटिलताएं पैदा हो सकती हैं."

राजनीतिक पर्यवेक्षकों का कहना है कि अब तक सबडिवीजन रहे कालिम्पोंग को नए जिले का दर्जा मिलने के बाद अपने पैरों तले की खिसकती जमीन को बचाने के लिए गोरखा जनमुक्ति मोर्चा अलग गोरखालैंड की मांग में नए सिरे से आंदोलन शुरू कर सकता है. लेकिन फिलहाल तो कालिम्पोंग के लोग इस शहर के सबडिवीजन से जिले में प्रोन्नत होने की खुशियां मनाने में जुटे हैं.

(दुनिया की टॉप 10 चोटियां)

 

 

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