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मंथन

ओजोन से पड़ रहा है चावल पर दाग

एशिया के कई देशों में जीवाश्म ईंधन के इस्तेमाल से वायु प्रदूषण की समस्या बढ़ती जा रही है, खास कर ओज़ोन की. भारत और चीन में ओजोन की समस्या से चावल की पैदावार पर असर पड़ रहा है.

बॉन यूनिवर्सिटी में कृषि वैज्ञानिक चावल की सैकड़ों किस्मों पर टेस्ट कर रहे हैं. इस अनोखे टेस्ट के जरिए वे देखना चाहते हैं कि चावल की कौन सी किस्म ओजोन को कितना बर्दाश्त कर सकती है. बॉन यूनिवर्सिटी के कृषि विज्ञानी प्रोफेसर मिषाएल फ्राय अपनी टीम के साथ पिछले एक साल में बड़े पैमाने पर प्रशिक्षण कर रहे हैं. वे बताते हैं, "हमने दुनिया भर की चावल की 328 किस्मों पर टेस्ट किए और ओजोन के प्रति सहनशीलता में कई फर्क पाए. कुछ किस्में ऐसी हैं, जिन्हें ओजोन से जरा भी फर्क नहीं पड़ा, जबकि कई ऐसी भी हैं जिनकी उपज पर पचास फीसदी तक असर पड़ा."

कैसे असर करती है ओजोन

ओजोन एक रंगहीन, जल्द रिएक्ट करने वाली गैस है. गाड़ियों के धुंए से भी यह उठती है. ऑक्सीजन के तीन एटम से बना यह मॉलिक्यूल इंसान, जानवरों और पौधों के लिए काफी नुकसानदेह है. प्रोफेसर फ्राय बताते हैं कि ओजोन पौधे के टिशू में मौजूद रैडिकल से रिएक्ट करता है और उसे सड़ाने लगता है. रैडिकल ऐसे मॉलिक्यूल हैं, जिनमें एक इलेक्ट्रॉन कम होता है. वो दूसरे मॉलिक्यूल से इलेक्ट्रॉन ले लेते हैं और इस तरह से प्रोटीन और डीएनए के टिशू खराब हो जाते हैं. पौधे के अणुओं को इससे ऐसा नुकसान पहुंचता है जिसकी वह भरपाई नहीं कर पाता.

टेस्ट के लिए बॉन में पौधों को ग्रीन हाउस में वैसी ही परिस्थितियों दे कर उगाया जा रहा है, जैसी उन्हें एशिया के देशों में आम तौर पर मिलती हैं. धान की खेती के लिए ऊंचे तापमान और नमी की जरूरत होती है. ओजोन की मात्रा को यहां नियंत्रित किया जा सकता है. क्योंकि ओजोन गैस हवा से भारी होती है, इसलिए टेस्ट बॉक्स को ऊपर से खुला छोड़ा जा सकता है. जिन पौधों पर असर हुआ, उनमें कुछ खास लक्षण देखने को मिलते हैं, जैसे कि पत्तों के रंग का फीका पड़ना. इसे क्लोरोसिस कहा जाता है.

चावल पर दाग

प्रोफेसर फ्राय बताते हैं कि ऐसा इसलिए होता है क्योंकि ओजोन के कारण क्लोरोफिल खत्म होने लगता है. क्लोरोफिल ही पत्तों को हरा रंग देता है. क्लोरोसिस पौधों के लिए बुरा है क्योंकि फोटोसिंथेसिस के लिए उन्हें क्लोरोफिल की जरुरत होती है, "तभी तो वह ऊर्जा बना पाएगा. पौधे के लिए इसका मतलब हुआ कम ऊर्जा, इससे वह कार्बन डाय ऑक्साइड को कारबोहाइड्रेट में ठीक तरह नहीं बदल पाएगा." ओजोन का असर ना केवल धान की उपज, बल्कि उसकी गुणवत्ता पर भी देखने को मिलता है. कारबोहाइड्रेट की कमी चावल के दानों में साफ देखी जा सकती है. उन पर सफेद दाग पड़ जाते हैं.

रिसर्चरों ने चावल के जैविक ढांचे पर ध्यान दिया और ऐसे जीन तलाशे जो ओजोन के असर को सकारात्मक रूप से बदल सकें. इस तरह के जीन को फिर उन पौधों में डाला गया, जो ओजोन के प्रति संवेदनशील हैं. जीन की इस क्रॉसब्रीडिंग का नतीजा बेहतर, सेहतमंद पौधों के रूप में सामने आया. इस किस्म से फसल को होने वाले नुकसान को आधा किया जा सकता है. हालांकि वैज्ञानिकों के लिए यह नई किस्म दूसरे विकल्प के रूप में ही बनी रहेगी. असली समाधान प्रदूषण को कम कर के ही निकलेगा. हवा में ओजोन की मात्रा का कम होना एशियाई देशों में लोगों के स्वास्थ्य के लिए बेहद जरूरी है.

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