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जर्मन चुनाव

ऑस्ट्रेलिया में चुनावी जोड़तोड़ जारी

ऑस्ट्रेलिया के आम चुनावों में किसी पार्टी को बहुमत मिलता नहीं दिख रहा है. लिहाजा जोड़तोड़ शुरू हो गया है. सरकार बनाने का दारोमदार चंद निर्दलीय सांसदों पर आ गया है. जिधर भी वे जाएंगे उसी की सरकार बनेगी.

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जब चुनावों में किसी को भी स्पष्ट बहुमत नहीं मिलता है तो सब सत्ता के दावेदार होते हैं. इसीलिए ऑस्ट्रेलियाई आम चुनावों में बड़ा नुकसान झेलने वाली प्रधानमंत्री जूलिया गिलार्ड अब गठबंधन सरकार बनाने के लिए जादुई आंकड़ा जुटाने में लगी है तो विपक्षी नेता टोनी अबोट भी सत्ता में आने के लिए कोई कसर नहीं छोड़ना चाहते हैं.

दोनों नेता दावा कर रहे हैं कि सरकार बनाने के लिए जनादेश उनके पक्ष में है लेकिन जानकार कहते हैं कि नई सरकार के लिए हफ्तों तक इंतजार करना पड़ सकता है. लेकिन प्रधानमंत्री गिलार्ड को इसमें शक नहीं कि मुकाबला जोरदार रहा. वह कहती हैं, "स्पष्ट तौर पर मुकाबला बेहद कांटे का रहा. साफ तौर पर किसी भी पार्टी को बहुमत नहीं मिला है. लगता है कि लेबर ने दो पार्टी वोट हासिल कर लिए हैं. इसका मतलब है कि ज्यादातर मतदाताओं को लेबर सरकार पसंद हैं."

150 सदस्यों वाली ऑस्ट्रेलियाई संसद में सत्ताधारी लेबर पार्टी और विपक्षी लिबरल नेशनल गठबंधन को 73-73 सीटें मिलने की उम्मीद की जा रही है जो स्पष्ट बहुमत के लिए जरूरी 76 से तीन कम है. ऐसे में सत्ता का फैसला तीन निर्दलीय सांसद करेंगे जो अतीत में विपक्षी नेता टोनी अबोट के साथ रहे हैं. लेकिन फिलहाल वह अपने पत्ते खोलने से बच रहे हैं. शनिवार को हुए चुनावों की गिनती का काम अब भी जारी हैं. वैसे अबोट जोरदार तरीके से दावेदारी ठोंक रहे हैं. वह कहते हैं, "जब सरकार ने अपना बहुमत खो दिया है तो उसके पास अब वैधता भी नहीं रही है. चुनाव में एक बात साफ तौर पर उभरी है, वह यह कि ऐसे पांच लाख मतदाता और हैं जो लेबर पार्टी की सरकार के बदले गठबंधन सरकार चाहते हैं. बड़ी बात यह है कि ऑस्ट्रेलिया में अगले तीन साल तक एक सक्षम और स्थिर सरकार होगी. अगर चुनाव के बाद कोई लेबर सरकार बनती है तो कुछ भी करने के काबिल नहीं होगी."

उधर आर्थिक जानकारों का कहना है कि अगर चुनावों के बेहद अप्रत्याशित नतीजे सामने आते हैं तो इससे देश की अर्थव्यवस्था को नुकसान उठाना पड़ सकता है. ऑस्ट्रेलियाई डॉलर और शेयर मूल्य, दोनों में गिरावट आ सकती है. इस चुनाव में लेबर पार्टी को 5.4 प्रतिशत वोटों का नुकसान उठाना पड़ा है. वहीं ग्रीन पार्टी ने अब तक का शानदार प्रदर्शन किया. खासकर उसे जलवायु परिवर्तन के मुद्दे पर नेतृत्व के अभाव का फायदा मिला है.

रिपोर्टः एजेंसियां/ए कुमार

संपादनः महेश झा