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दुनिया

ऑपरेशन ब्लू स्टार के 30 साल

सुखदीप सिंह स्वर्ण मंदिर गए, तो 30 साल पुरानी घटना याद करके दुखी हो गए. ऑपरेशन ब्लू स्टार के नाम से जानी गई उस घटना के तहत स्वर्ण मंदिर में छिपे आतंकवादियों का सफाया किया गया था.

वह संघर्ष खालिस्तान के नाम पर हुआ. यानि सिखों का अलग राष्ट्र. 30 साल बाद मांग भी ठंडी पड़ गई है क्योंकि नई पीढ़ी अलग खालिस्तान से ज्यादा रोजगार और विकास चाहती है. लेकिन सुखदीप सिंह के लिए यह घटना मायूसी लेकर आती है, "मैं 1984 कांड पर अफसोस करता हूं." 31 साल के सुखदीप ऑस्ट्रेलिया के मेलबर्न शहर में रहते हैं. उनका कहना है, "लोग ऐसी हिंसा फिर नहीं चाहते."

कट्टरवादी सिख नेताओं ने 1970 के दशक में अलग खालिस्तान की मांग की, जिसे भारत और पाकिस्तान के बीच पंजाब में बनाने की योजना थी. इसी क्रम में स्वर्ण मंदिर को हिंसा का सामना करना पड़ा क्योंकि आतंकवादी उसमें छिप गए. सिंह का कहना है, "मुझे लगता है कि हम भारत के साथ ज्यादा खुश हैं."

युवाओं का सहयोग नहीं

स्वर्ण मंदिर में छिपे आतंकवादियों पर हमले के लिए 1984 में हिंसक ऑपरेशन किया गया, जिसमें सदियों पुरानी इमारत को भी नुकसान पहुंचा. बाद में उसी साल भारत की प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की कट्टर सिख अंगरक्षकों ने हत्या कर दी. फिर पूरे भारत में सिख विरोधी दंगे हुए और जिसमें 3000 से ज्यादा लोगों की मौत हो गई.

Sikhs in New York USA

अमेरिका में सिखों का आंदोलन

1990 के दशक में खालिस्तान की मांग कमजोर पड़ती गई. हालांकि ऑपरेशन ब्लू स्टार की तारीख पर आज भी हर साल पंजाब में विरोध प्रदर्शन होता है. खालिस्तान का विरोध करने वाले प्रमुख सिख नेता सुखदेव संधू का कहना है, "पहले खालिस्तान मूवमेंट काफी फला फूला क्योंकि उन्हें युवा वर्ग का सहयोग था. लेकिन आज के युवा की प्राथमिकताएं बदल गई हैं."

हालांकि ब्रिटेन, कनाडा और अमेरिका में रह रहे सिख समुदायों में अभी भी अलग खलिस्तान को लेकर मांग उठती रही है. समझा जाता है कि भारत से बाहर दो से तीन करोड़ सिख रहे हैं. उनमें से ज्यादातर का भारतीय पंजाब में कोई न कोई जुड़ाव है.

अभी भी है आंदोलन

विदेशों में रहने वाले सिख अभी भी अपने आंदोलन के लिए सहयोग हासिल करने की कोशिश करते हैं. वे इसके लिए अलग से पैसे भी इकट्ठा करते हैं. ऑपरेशन ब्लू स्टार को लेकर उनकी याद इतनी जबरदस्त है कि इसकी अगुवाई करने वाले कमांडर कुलदीप सिंह ब्रार पर लंदन की सड़कों पर 2012 में हमला किया गया. हालांकि इसमें कमांडर ब्रार बच गए.

खालिस्तान समर्थक संगठन के प्रवक्ता कंवर पाल सिंह का कहना है, "सिख देश की चाहत रखने वाले संगठन की अपेक्षा बहुत मजबूत है. उनका कहना है कि इतिहास ने सिखों के साथ न्याय नहीं किया. हिन्दुओं को भारत मिला, मुस्लिमों को पाकिस्तान, लेकिन सिखों को कुछ नहीं."

खालिस्तान मूवमेंट में जरनैल सिंह भिंडरांवाले की अहम भूमिका थी, जो स्वर्ण मंदिर के अंदर से हिंसक आंदोलन की अगुवाई कर रहा था. भारतीय सेना के ऑपरेशन में उसकी जान चली गई. भिंडरांवाले की मौत ने सिख समुदाय के अंदर खासा गुस्सा भड़का दिया और इसका बदला लेने के लिए कनाडा से भारत आ रहे विमान को 1985 में मार गिराया गया. इसमें 329 लोग मारे गए.

पंजाब को स्वायत्तता संभव नहीं

विश्लेषकों का कहना है कि पंजाब की भौगोलिक स्थिति बहुत पेचीदा है. वह एक तरफ पाकिस्तान और दूसरी तरफ कश्मीर से जुड़ा है और ऐसे में उसे स्वायत्तता देने का विचार भी नहीं किया जा सकता. अमृतसर के गुरु नानक देव यूनिवर्सिटी में इतिहासकार प्रोफेसर बीयरगुड गिल का कहना है, "इसके अलावा सिख अच्छी तरह से हिन्दुओं से घुल मिल गए हैं और अब उनके खिलाफ किसी तरह का भेदभाव भी नहीं है."

पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की मिसाल देते हुए वह कहती हैं, "हमारे सामने 10 साल तक एक सिख प्रधानमंत्री रहा. इसके अलावा हम कई लोगों को इस बेकार की लड़ाई में गंवा चुके हैं. अब हम एक और पीढ़ी की बलि नहीं चढ़ा सकते." गिल का कहना है कि उनके 20 साल के करियर में उनके एक भी छात्र ने अलग खालिस्तान की बात नहीं कही है.

उधर, संधू का कहना है कि पंजाब में अलग राष्ट्र का समर्थन करने वाले उग्रवादियों के बारे में लोगों की भावना भी बदली, "लोगों ने पुलिस को उनके बारे में बताना शुरू कर दिया क्योंकि उन्होंने देखा कि वे लोग पड़ोसियों की हत्या कर रहे थे. इसके साथ ही खालिस्तान मूवमेंट समाप्ति की राह पर चल पड़ा. अब सिर्फ सांकेतिक आंदोलन बाकी है."

एजेए/एमजे (एएफपी)

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