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मंथन

ऐसे बनते हैं जहाज को चलाने वाले प्रोपेलर

पानी में डूबे प्रोपेलर पानी के विशाल जहाजों को गति देते हैं. एक प्रोपेलर को बनाने में कई महीने लगते हैं. इस दौरान सबसे अहम काम घिसाई को होता है, जो कोई मशीन, सान से बेहतर नहीं कर सकती.

जर्मनी में दुनिया के सबसे बड़े जहाज का प्रोपेलर बनाया जा रहा है. प्रोपेलर 11 मीटर तक बड़े होते हैं और 130 टन तक भारी. अंत में सधे हाथों से उन्हें तराशा जाता है.

प्रोपेलर को हाथ से तराशने वालों को ग्राइंडर कहा जाता है. शिप इंजीनियर गैर्ड थीमन के मुताबिक, "ग्राइंडर आखिरी निर्णायक काम करता है. पहले जो कुछ भी किया गया है, जो कुछ भी हुआ है, अगर गलत तरीके से तराशा गया तो सब बेकार हो जाएगा. इसलिए इन कारीगरों की फीलिंग और हाथ की कारीगरी अत्यंत महत्वपूर्ण होती है."

रेडीमेड प्रोपेलर बाजार में नहीं मिलता. हर प्रोपेलर ऑर्डर से तैयार किया जाता है. उसे जहाज या कार्गो कंपनी के मुताबिक बनाया जाता है. नया प्रोपेलर बनाने में कई महीने लगते हैं. सबसे पहले भट्ठी में कई धातुओं को करीब 24 घंटे तक गलाकर घोल बनाया जाता हैं. तांबे, एल्युमिनियम और लोहे का सही अनुपात सालों के अनुभव का नतीजा है. प्रोपेलर की कास्टिंग में सिर्फ 15 मिनट लगते हैं, लेकिन यह काम सही तरीके से न किया जाए तो महीनों की मेहनत बर्बाद हो सकती है.

Türkei Istanbul Containerschiff (Imago/OceanPhoto)

लगातार बढ़ता जा रहा है जहाजों का आकार

थीमन कहते हैं, "यदि कास्टिंग की प्रक्रिया में कुछ गलत हो जाए तो प्रोपेलर काम के लायक नहीं रहेगा और उसे फिर से कास्ट करना होगा. ऐसा कोई नहीं चाहता. इसलिए कास्टिंग से पहले उसे कंप्यूटर पर सिमुलेट किया जाता है, ताकि पता चल सके कि यह प्रक्रिया कैसी रहेगी."

तरल कांसे को 1000 डिग्री तक गर्म किया जाता है. कारखाने का तापमान ऐसा होता है जैसे कोई ज्वालामुखी हो. तरल धातु के करीब सिर्फ सुरक्षा पोशाक पहन कर ही जाया जा सकता है. कुल 150 टन तरल कांसा गर्म किया जा रहा है. विश्व का सबसे बड़ा इंडक्शन फरनेस भी इसे संभाल नहीं सकता. इसलिए कई सारे फरनेस का इस्तेमाल किया जा रहा है.

उसके बाद कास्टिंग शुरू होती है. कामगारों के लिए यह काम बहुत तनावपूर्ण होता है. तरल धातु को उड़ेलने में किसी तरह की रुकावट नहीं आनी चाहिए. कई बर्तनों से होकर खौलता कांसा पहले से तैयार कास्ट में पहुंचता है.

जहाज परिवहन लगातार तेज और ऊर्जा बचाने वाला होता जा रहा है. प्रोपेलरों को जहाजों के हॉर्स पॉवर के अनुरूप बनाया जाता है. इंजन पावर 1,00,000 पीएस से ज्यादा  हो तो सिर्फ पर्फेक्ट प्रोपेलर ही काम आता है.

दो हफ्ते में ये विशाल प्रोपेलर सूखकर ठंडा हो जाता है. कास्ट से निकले प्रोपेलर को तराश कर सही रूप दिया जाता है. सब कुछ किसी साइंस फिक्शन फिल्म जैसा लगता है. ग्राइंडिंग टूल्स को कामगार जॉयस्टिक की मदद से चलाते हैं. उन्हें सावधान रहना पड़ता है. जरूरत से ज्यादा घिसाई हुई कि प्रोपेलर बर्बाद हुआ. प्रोपेलर की आखिरी घिसाई हाथ से होती है. प्रोपेलर पर बने घिसाई के निशान ग्राइंडर की पहचान होते हैं. अंत में प्रोपेलर को एकदम मिलीमीटर के हिसाब से हर जगह फिट होना चाहिए.

शिप इंजीनियर थीमन के मुताबिक यह काम सिर्फ इंसानी अहसास के जरिये होता है, "किनारों की आखिरी घिसाई बहुत ही संवेदनशील है, जो एक मशीन नहीं कर सकती.  इसके लिए जिस संवेदना की जरूरत होती है, उसे मशीन में डालना संभव नहीं. इसे सालों के काम और अनुभव से सीखा जाता है."

काम खत्म होने के बाद बाद यही प्रोपेलर समंदर में विशाल जहाजों को यात्रा कराएंगे.

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