एशिया में फैलता दवा रोधी मलेरिया | विज्ञान | DW | 03.08.2014
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विज्ञान

एशिया में फैलता दवा रोधी मलेरिया

वैज्ञानिकों ने चेतावनी दी है कि दक्षिण पूर्वी एशिया में दवा प्रतिरोधी मलेरिया फैल रहा है. यह मलेरिया का ऐसा बुखार है, जिस पर इस बीमारी के लिए बनाई गई किसी दवा का असर नहीं होता.

यह शोध माहिडोल ऑक्सफोर्ड ट्रॉपिकल मेडिसिन रिसर्च यूनिट ने किया था और इसे न्यू इंग्लैंड चिकित्सा जर्नल में छापा गया. एशिया के दस देशों में 1,241 मरीजों की जांच के नतीजों के आधार पर यह रिपोर्ट लिखी गई.

इसमें पता चला कि मलेरिया परजीवी का सबसे खतरनाक फॉर्म प्लाज्मोडियम फाल्सिपेरम अब थाईलैंड, कंबोडिया, म्यांमार और लाओस के कई हिस्सों में सामान्य हो गया है. इस परजीवी पर मलेरिया की सबसे प्रचलित दवाई आर्टेमिसिनिन का असर नहीं होता जबकि मलेरिया के इलाज में इसी कंपाउंड वाली दवा का इलाज अब तक सबसे सफल रहा है. पत्रिका के संपादकीय में लिखा गया है, "दक्षिण पूर्वी एशिया में ऐसे प्लाज्मोडियम फाल्सिपेरम परजीवी का बनना जिस पर आर्टेमिसिनिन असर नहीं करे, ये बहुत चिंता का विषय है." वहीं ब्रिटेन के वेलकम ट्रस्ट के निदेशक जेरेमी फेरर के मुताबिक, "अगर ये प्रतिरोध एशिया और अफ्रीका में फैल जाएगा तो मलेरिया से होने वाली मौतों की कमी पर जो प्रगति हुई है वह बिलकुल उलट जाएगी. ये कोई भविष्य का डर नहीं है, यह आज की सच्चाई है."

आंकड़े बताते हैं कि हर साल दुनिया में मलेरिया से छह लाख लोग मर जाते हैं. इनमें से अधिकतर पांच साल से कम उम्र वाले बच्चे हैं और ये अफ्रीका में रहते हैं.

मलेरिया पर 34 साल से रिसर्च कर रहे निकोलास व्हाइट इस स्टडी के प्रमुख लेखक हैं. उन्होंने चेतावनी दी है कि ये महामलेरिया लाखों की जान ले सकता है. व्हाइट ने कहा, "परजीवी से इंसान को होने वाली बीमारियों में मलेरिया सबसे बड़ी है. हर दिन दो हजार लोगों की इस बीमारी से मौत हो जाती है."

साथ ही वह कहते हैं, "मलेरिया की दवा में आर्टेमिसिनिन पहला केमिकल होता है. मलेरिया के खिलाफ लड़ाई में आगे बढ़ने के लिए इनकी बहुत जरूरत है. वैश्विक नजर से देखें तो हम जानते हैं कि दक्षिण पूर्वी एशिया के साथ यह प्रतिरोधी परजीवी भारत और अफ्रीका बढ़ गए हैं. ऐसा पहले भी दो बार हुआ है." वह चेतावनी देते हैं. "अगर ये प्रतिरोधी मलेरिया भारत पहुंच जाता है तो मौतें रोकना आसान नहीं होगा, हजारों लोग मारे जाएंगे. यह समय के साथ लड़ाई है और हम हार रहे हैं."

व्हाइट और अन्य रिसर्चरों के लिए ये लड़ाई खासी मुश्किल है क्योंकि वह दूरदराज के गांवों में काम कर रहे होते हैं और कई बार इस मुश्किल से दो चार होने में राजनीतिक इच्छाशक्ति भी कम पड़ जाती है. वह कहते हैं, "राजनीतिक नेतृत्व और सहयोग की कमी है. हमें अंतरराष्ट्रीय नजर से चीजों को देखना होगा. ये परजीवी अफ्रीका में हजारों लोगों को मार सकता है लेकिन बिना राजनीतिक मदद के हमारी कोशिशें टिकाऊ नहीं हैं. हमें दुनिया के लिए सही कदम उठाना होगा."

हालांकि वो ये भी मानते हैं कि पहले की तुलना में स्थिति बेहतर हुई है क्योंकि पहले हर दिन मलेरिया से मरने वाले लोगों की संख्या करीब तीन हजार होती थी. जो अब कम हो कर दो हजार हो गई है.

एएम/एमजी (डीपीए)

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