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ताना बाना

एशियाई करोड़पति अधिक मालदार

एचएनडब्लूआई - यह न तो किसी संगठन का नाम है, न ही किसी वायरस का. इसका अर्थ है हाई नेट वर्थ इंडिविजुअल - यानी मालदार लोग. एशिया में ऐसे लोगों के पास अपने यूरोपीय भाइयों से ज़्यादा पैसे हैं.

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मेरिल लींच ग्लोबल वेल्थ मैनेजमेंट और कंसलटेंसी फ़र्म कैपजेमिनी की ओर से पेश किए गए एक अध्ययन में कहा गया है कि ऐसे लोगों की संख्या, जो कम से कम दस लाख डॉलर के मालिक हैं, एशिया में चीन और भारत में बढ़ रही हैं और पहली बार यूरोप के करोड़पतियों के मुक़ाबले उनके पास अधिक धन है.

सन 2008 में वित्तीय संकट के चलते एशिया-प्रशांत महासागरीय क्षेत्र में करोड़पतियों की संख्या 14.2 प्रतिशत घटकर सिर्फ़ 24 लाख के बराबर रह गई थी. लेकिन सन 2009 में उनकी संख्या में भारी वृद्धि हुई. अब यहां तीस लाख करोड़पति हैं, जो यूरोपीय करोड़पतियों की आबादी के बराबर है.

संख्या एक जैसी होने के बावजूद यूरोपीय करोड़पतियों के पास सिर्फ़ साढ़े नौ ख़रब डालर हैं, जबकि एशियाई करोड़पतियों की मिल्कियत 9.7 ख़रब डालर के बराबर हो चुकी है.

वैसे सारी दुनिया में सन 2008 में घटने के बाद 2009 में करोड़पतियों की आबादी बढ़ी है. उनकी संख्या फिर से एक करोड़ हो चुकी है. सबसे अधिक करोड़पति अब भी अमेरिका, जापान और जर्मनी में पाए जाते हैं.

एशिया में करोड़पतियों की मिल्कियत बढ़ने का कारण भी हाल के आर्थिक उतार-चढ़ाव में देखा जा सकता है. हालांकि यूरोप में भी थोड़ी आर्थिक वृद्धि हुई है, लेकिन एशियाई क्षेत्र में यह वृद्धि काफ़ी अधिक थी. रिपोर्ट में कहा गया है कि 2008 में भारी कमी के बाद हांगकांग और भारत के करोड़पति आशा की किरण बन चुके हैं.

कैपजेमिनी की वित्तीय सेवाओं के प्रबंध निर्देशक बैर्ट्रां लावेसियेर का कहना है कि आने वाले समय में भी ख़ासकर भारत, चीन और ब्राज़ील के करोड़पति आगे बढ़ते जाएंगे. यही वह क्षेत्र है, जहां सन 2009 के दौरान पूंजी का उल्लेखनीय विस्तार देखने को मिला है.

रिपोर्ट: एजेंसियां/उभ

संपादन: राम यादव

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