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दुनिया

एलईडी से जलवायु परिवर्तन का मुकाबला

लंबे समय तक चलने और ईको फ्रेंडली होने के कारण भारत सरकार द्वारा प्रायोजित कार्यक्रम में एलईडी लाइटें सब्सिडी पर बांटी जा रही हैं. साधारण बल्ब की जगह इसके इस्तेमाल से जलवायु परिवर्तन से लड़ने में मदद मिलने की उम्मीद है.

भारत सरकार का कार्यक्रम डीईएलपी यानि डोमेस्टिक एफिशिएंट लाइटिंग प्रोग्राम देश के कई राज्यों में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने जनवरी में शुरु किया. इसका उद्देश्य कार्बन फुटप्रिंट घटाना और बिजली की मांग को कम करना था. एलईडी लाइट के लंबे समय तक चलने और ईको फ्रेंडली होने के कारण भारत सरकार द्वारा प्रायोजित कार्यक्रम में इन्हें सब्सिडी पर बांटा जा रहा है.

भारतीय दैनिक टाइम्स ऑफ इंडिया ने सरकारी आंकड़ों के हवाले से लिखा है कि अब तक इस कार्यक्रम के अंतर्गत 2 करोड़ से भी अधिक सब्सिडाइज्ड एलईडी बल्ब बांटे जा चुके हैं. इससे रोजाना करीब 73 लाख यूनिट ऊर्जा की बचत का अनुमान है. इस आंकड़े के मुताबिक भारत सरकार को इससे करीब 1,000 करोड़ रूपए की सालाना बचत होगी. लक्ष्य है कि देश के 77 करोड़ आम बल्ब और 40 करोड़ सीएफएल बदल कर उसकी जगह एलईडी लैंप लगाए जाएं.

तमाम भारतीय राज्यों में चल रहे इस डीईएलपी कार्यक्रम में आंध्र प्रदेश, दिल्ली और उत्तर प्रदेश आगे हैं. महाराष्ट्र जैसे अन्य राज्यों में भी इसे जोर शोर से अपनाने की कई कोशिशें दिख रही हैं.

जाहिर है कि केवल एलईडी लाइटें अपनाना ही जलवायु परिवर्तन से लड़ने के लिए काफी नहीं होगा. भारत समेत कई विकासशील देश अमीर देशों पर उन्हें इस दिशा में और बड़े कदम उठाने के लिए धन मुहैया ना कराने की शिकायत करते आए हैं. 30 नवंबर से 11 दिसंबर के बीच में पेरिस में होने वाले जलवायु सम्मेलन से पहले विशेषज्ञ जर्मन शहर बॉन में मिल रहे हैं.

विकासशील देशों के जी77 ब्लॉक में दुनिया की 80 फीसदी आबादी का प्रतिनिधित्व है. जी77 एक ऐसा समझौता चाहता है जिसमें अमीर देशों पर जलवायु परिवर्तन कम करने और उसके दुष्प्रभावों से निपटने के लिए धन मुहैया कराने की जिम्मेदारी हो. ब्लॉक का आरोप रहा है कि अमीर देश इसे टाल रहे हैं ताकि धन देने का काम यूएन क्लाइमेट तंत्र के बाहर के दानकर्ताओं और कर्जदाताओं के ऊपर आ जाए.

पेरिस सम्मेलन को अंतरराष्ट्रीय समुदाय के सामने अंतिम मौके के तौर पर देखा जा रहा है. अपने कार्यकाल के अंतिम पड़ाव में अमेरिकी राष्ट्रपति ओबामा ने भी क्लीन पावर योजना की घोषणा की है. इसके अंतर्गत पहली बार कार्बन डाई ऑक्साइड को एक प्रदूषक माना गया है और उसके उत्सर्जन से संबंधित राष्ट्रीय नियम बने हैं. इस तरह अमेरिकी पावर प्लांटों से उत्सर्जन के 2005 के स्तर को 2030 तक 30 प्रतिशत घटाने का लक्ष्य रखा गया है. दुनिया के करीब 200 देशों में से 150 देश ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन को कम करने की कोई ना कोई योजना पेश कर चुके हैं. तेल उत्पादक ओपेक देशों ईरान, सऊदी अरब, नाइजीरिया और बाहर के देशों पाकिस्तान और मिस्र ने भी पेरिस सम्मेलन से पहले अपनी योजना पेश करने की बात कही है.

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