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दुनिया

एमबीए के बावजूद बेरोजगारी

देश भर में एमबीए की डिग्री बांटने वाले निजी बिजनेस स्कूलों का जाल कुकुरमुत्तों की तरह फैलता जा रहा है. लेकिन इस साल इन स्कूलों से निकले छात्रों को ढंग की नौकरी नहीं मिलने से छात्रों और अभिभावकों की चिंताएं बढ़ने लगी हैं.

लाखों की फीस देकर बच्चे इन बिजनेस स्कूलों में दाखिला लेते हैं और इस बीच वहां से पढ़ कर निकलने के बाद इन छात्रों को महज कुछ हजार की नौकरियों से संतोष करना पड़ रहा है. एक ताजा अध्ययन के मुताबिक इस साल ऐसे स्कूलों के महज 18 फीसदी छात्रों को ही नौकरी मिली है.

सर्वेक्षण

व्यापार संगठन एसोचैम की ओर से कराए गए एक ताजा सर्वेक्षण में कहा गया है कि आर्थिक मंदी, नई परियोजनाओं पर काम ठप होने और आधारभूत ढांचे, होटलों, वित्तीय सेवाओं, रियल्टी और खुदरा जैसे अहम क्षेत्रों के प्रति निवेशकों की दिलचस्पी घटने की वजह से दूसरी कतार के बिजनेस स्कूलों से निकलने वाले छात्रों के लिए रोजगार के मौके बेहद कम हो गए हैं. अब छात्रों और अभिभावकों की सोच भी बदल रही है. उनका सवाल है कि दो साल और लाखों रुपए खर्च करने के बावजूद अगर ढंग का रोजगार नहीं मिले तो ऐसी शिक्षा से क्या फायदा.

इसी का नतीजा है कि कई बिजनेस स्कूल बंद हो गए हैं. एसोचैम के महासचिव डी.एस.रावत कहते हैं, "वर्ष 2013 के दौरान दिल्ली, मुंबई, बंगलोर, अहमदाबाद और कोलकाता जैसे महानगरों में 220 से ज्यादा बिजनेस स्कूल बंद हो गए." यही नहीं, भारतीय प्रबंधन संस्थान (आईआईएम) जैसे प्रतिष्ठित शिक्षण संस्थानों में दाखिले के लिए होने वाली कैट की परीक्षा में भी उम्मीदवारों की तादाद लगातार कम हो रही है. सर्वेक्षण के मुताबिक 2013 में 1.94 लाख उम्मीदवारों ने कैट की परीक्षा दी थी लेकिन 2014 में यह तादाद घट कर 1.85 लाख रह गई.

मोहभंग

बिजनेस स्कूलों में एमबीए की पढ़ाई के लिए सीटों की तादाद में भारी बढ़ोतरी के बावजूद अब इससे छात्रों का मोहभंग हो रहा है. वर्ष 2006-07 के दौरान विभिन्न कालेजों में इसकी 95 हजार सीटें थी जो पिछले साल तक बढ़ कर 4.68 लाख तक पहुंच गई थी. बंगलोर के एक बिजनेस स्कूल से लाखों रुपए खर्च कर एमबीए की डिग्री हासिल करने वाले झारखंड के सुदेश ठाकुर को महज आठ हजार रुपए की नौकरी का ऑफर मिला था. लेकिन उन्होंने वह नौकरी करने की बजाय प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करने को तरजीह दी. ठाकुर कहते हैं, "आठ हजार में तो घर का किराया तक नहीं निकलेगा. दो साल और लाखों रुपए बर्बाद करने के बाद भी यह स्थिति है."

लेकिन आखिर यह स्थिति क्यों है? दरअसल, देश भर में कुकुरमुत्ते की तरह खुलने वाले बिजनेस स्कूलों में लुभावने विज्ञापनों के जरिए छात्रों को तो आकर्षित किया जाता है लेकिन पढ़ाई के स्तर पर खास ध्यान नहीं दिया जाता. एसोचैम की रिपोर्ट में कहा गया है कि ज्यादातर ऐसे स्कूलों में पढ़ाई का स्तर बेहद खराब है. वहां न तो ढंग के शिक्षक हैं और न ही आधारभूत सुविधाएं. ऐसे संस्थान उद्योगों से संपर्क बढ़ाने और शोध पर कोई ध्यान नहीं देते.

मुनाफे का जरिया

उत्तर बंगाल विश्वविद्यालय के एक पूर्व प्रोफेसर अभिजीत सेन कहते हैं, "ऐसे स्कूल अब मुनाफे का जरिया बन गए हैं. छात्रों से एमबीए के नाम पर मोटी फीस वसूल कर उनको महज एक डिग्री थमा दी जाती है. लेकिन ज्ञान के नाम पर ऐसे छात्र शून्य होते हैं. इनको नौकरी भला कैसे मिलेगी?" सेन कहते हैं कि शीर्ष प्रबंधन संस्थानों के छात्रों को अब भी करोड़ों के पैकेज मिल रहे हैं. लेकिन ज्यादातर निजी बिजनेस स्कूलों में छात्रों को ढंग की शिक्षा नहीं दी जाती. नतीजतन कंपनियां उनको इंटरव्यू में ही छांट देती हैं. यही वजह है कि सिर्फ 18 फीसद छात्रों को ही नौकरियां मिली हैं और उनका भी पैकेज बहुत कम है.

रावत कहते हैं कि कुकुरमुत्ते की तरह खुल रहे ऐसे संस्थानों पर अंकुश लगाना जरूरी है. इसके अलावा वहां शिक्षण की क्वालिटी पर निगाह रखने के लिए कोई संस्था होनी चाहिए. यह भी सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि उन संस्थानों में आधारभूत ढांचा ठीक हो और पढ़ाने वाले लोग योग्य हों. ऐसा नहीं होने तक मोटे पैकेज के लालच में छात्र और उनके अभिभावक ऐसे संस्थानों के चंगुल में फंसते रहेंगे और हालत सुधरने की बजाय और बिगड़ेगी.

रिपोर्ट: प्रभाकर, कोलकाता

संपादन: महेश झा

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