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दुनिया

एफडीपी नेता लिंडनर की नजर में जर्मनी की गलतियां

फ्री डेमोक्रैटिक पार्टी के नेता क्रिस्टियान लिंडनर ने डॉयचे वेले के इंटरव्यू में कहा कि जर्मनी को तुर्की के साथ झगड़े में आर्थिक सहयोग रोक देना चाहिए. साथ ही लगाया चांसलर मैर्केल पर शरणार्थी संकट को लंबा खींचने का आरोप.

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अफगानिस्तान में जर्मन सेना की तैनाती उपयुक्त नहीं

जर्मनी की उदारवादी पार्टी एफडीपी के प्रमुख लिंडनर ने चांसलर अंगेला मैर्केल की शरणार्थी नीति पर जम कर हमला किया. डॉयचे वेले से खास बातचीत में लिंडनर ने कहा कि शरण लेने की प्रक्रिया अब भी बहुत लंबी है और इसी के साथ उन्होंने अपने "चार-दरवाजे" वाली आप्रवासन नीति का समर्थन किया.

डॉयचे वेले की मुख्य संपादक इनेस पोल के अफगानिस्तान पर पूछे एक सवाल के जवाब में लिंडनर ने कहा, "मुझे नहीं लगता कि हम लंबे समय तक अफगानिस्तान में सेना को तैनात रख पाएंगे." 24 सितंबर को होने वाले आम चुनाव में पार्टी के टॉप उम्मीदवार ने इसका कारण अफगानिस्तान के लिए तय किये गये लक्ष्यों में मिली नाकामयाबी को बताया. लिंडनर ने कहा कि तय समय सीमा में अफगानिस्तान को पश्चिम जैसा ही, बाजार-आधारित लोकतंत्र बनाने का लक्ष्य सांस्कृतिक और सामाजिक रूप से शायद ज्यादा ही महात्वाकांक्षी था. अमेरिका के नेतृत्व में अंतरराष्ट्रीय सैन्य अभियान अफगानिस्तान में 16 सालों से जारी है.

38 साल के लिंडनर हाल के महीनों में तुर्की से साथ जर्मनी के संबंधों को लेकर कहते हैं, "सभी तरह के आर्थिक सहयोग तुरंत रोक देना चाहिए." उनका मानना है कि ना तो तुर्की को कोई आयात गारंटी मिलनी चाहिए और ना ही आयात ड्यूटी में में किसी तरह की छूट देने की बात होनी चाहिए.

शरणार्थी नीति में बदलाव का प्रस्ताव

मैर्केल की नीति की कड़ी आलोचना करते हुए लिंडनर ने शरण के आवेदन और उस पर फैसले की प्रक्रिया को तेज बनाने के लिए एक नयी श्रेणी का विचार रखा. इस श्रेणी में रखे जाने पर शरण के इच्छुकों को एक अस्थायी मानवतावादी संरक्षण मिल जाएगा. उनका आइडिया है कि एक बार शरणार्थी को रेजिडेंट परमिट मिल जाये तो उसके बाद वह सीधे श्रम बाजार में शामिल हो सकें. "लेकिन जैसे रेजिडेंट परमिट सीमित अवधि के लिए दिये जाते हैं, उसी तरह शांति बहाल होने पर उन लोगों को भी जर्मनी छो़ड़ अपने मूल देश वापस जाना होगा."

अपनी "चार-दरवाजे" वाली आप्रवासन नीति के बारे में समझाते हुए लिंडनर ने कहा, "पहला दरवाजा है शरणस्थान," जो बुनियादी, व्यक्तिगत अधिकार है, जिसमें कोई प्रतिबंध नहीं होना चाहिये. हालाकिं यह बहुत कम लोगों पर लागू होता है, केवल "वे लोग जो वाकई किसी व्यक्तिगत प्रताड़ना के शिकार हों." लिंडनर ने "शरणार्णी" बनने को दूसरा द्वार बताया है. उन लोगों को जो हिंसा और युद्ध से भाग कर आये हैं - किसी व्यक्तिगत प्रताड़ना के कारण नहीं.

तीसरा द्वार कहलाता है ""योग्य आप्रवासन", ऐसे लोग जिन्हें जर्मनी में प्रवेश की अनुमति है. और चौथा दरवाजा असल में एक बंद द्वार है, जिस तरफ वे लोग भेजे जाएं, जिन्हें ना तो शरण दी जा सकती है, ना ही रिफ्यूजी का दर्जा और ना ही वे योग्य आप्रवासियों में ही आते हैं. लिंडनर का मानना है कि ऐसे लोग "जर्मनी नहीं आ सकते. और यहां नहीं रह सकते."

कैसा दिख रहा है भविष्य

सितंबर चुनाव के नतीजों और फिर गठबंधन में शामिल हो रही पार्टियों से पता चलेगा कि लिंडनर के इस "चार-दरवाजे" वाली आप्रवासन नीति का कैसा भविष्य है. एफडीपी इसे तभी लागू करवा पाएगी अगर वह अगली जर्मन सरकार में शामिल हो. फिलहाल चुनाव पूर्व सर्वेक्षण पार्टी को आठ फीसदी समर्थन बता रहे हैं. ग्रीन पार्टी और दक्षिणपंथी एएफडी को भी इतना ही जनसमर्थन है. जर्मन संसद बुंडेसटाग में तीसरे स्थान पर कौन सी पार्टी रहेगी, इस पर रहस्य बना हुआ है.

मैर्केल की क्रिस्चियन डेमोक्रैटिक पार्टी और उसकी बवेरियन सिस्टर पार्टी, सीएसयू के एलायंस के साथ गठबंधन सरकार बनाने लायक समर्थन इस समय किसी और दल को नहीं मिलता दिख रहा. बीते कुछ हफ्तों में लिंडनर कहते रहे हैं कि वे संसद में विपक्ष में प्रमुख विपक्षी नेता के रूप में अपनी अहम भूमिका देखते हैं. वर्तमान संसद में एफडीपी को जगह नहीं मिली है.

(मार्सेल फ्युर्स्टेनाउ/आरपी)

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